बुधवार, 14 अप्रैल 2021

कैपसिकम ( CAPSICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

कैपसिकम ( CAPSICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विश्लेषण -

  • मोटा , थुलथुला शरीर और नाक व गाल  की नोक पर लालिमा 
  • जल्दी घर जाने की उत्कृष्ट इच्छा 
  • पुराने जुकाम में किसी भी औषधि का असर न करना 
  • मिर्च की तरह जलन होना 
  • सल्फर की तरह धातुगत औषधि 
  • आत्मघात का लगातार विचार आना
  • ज्वर में दोनों कंधों के बीच ठंड शुरु होकर जिस्म में फैलना

" कैपसिकम की प्रकृति "

गर्मों से व दिन के समय को आराम मिलता हैं । जबकि ठंड से, खुली हवा से , शरीर पर कपड़ा न होने पर, खाने - पीने से और आधी रात में रोगी की तकलीफे बढ़ जाती हैं । 

" मोटा , थुलथुला शरीर और नाक - गाल  की नोक पर लालिमा " 

जिन पदार्थों को स्वाद के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं , वे कई पीढ़ियों बाद हमारे शरीर में ऐसे लक्षण उत्पन्न कर देते हैं, जो किसी प्रकार के रोग होते हैं । ऐसे रोगों व लक्षणों को दूर करने के लिए इन्ही पदार्थों से बनी होम्योपैथिक औषधियों का प्रयोग किया जाता हैं । जैसे लाल मिर्च से बनी होम्योपैथिक औषधि कैपसिकम हैं । इसका रोगी कैलकेरिया कार्ब की तरह मोटा व थुलथुला होता हैं । जिस प्रकार लाल मिर्च का रंग लाल होता हैं , उसी प्रकार रोगी की  नाक व गाल की नोक लालिमा युक्त होती हैं । चेहरे पर रुधिर की बारीक रक्त वाहिनियां फैली हुई दिखाई देती हैं । इसके रोगी का शरीर सुस्त होता हैं , जिस कारण दवाए असर नहीं करती । इस प्रकार के शरीर में किसी भी रोग पर कैपसिकम प्रयोग की जा सकती हैं । यह शरीर की जीवनी शक्ति को क्रियाशील बना देती हैं, अर्थात सुस्त पड़े शरीर को जागृत कर देती हैं । 

" जल्दी घर जाने की उत्कृष्ट इच्छा "

बच्चों को घर के बाहर किसी बोर्डिंग हाउस में भर्ती कराया जाता हैं, तब उनका मन नहीं लगता , वह निरन्तर रोता रहता हैं , खेलने के स्थान में एक कोने में जा बैठता हैं और माँ - बाप को याद करते रहते हैं । इस प्रकार के बच्चों को कैपसिकम की एक - दो बूंद देने से वे सब कुछ भूल जाते हैं और अन्य बच्चों के साथ खेलने लगते हैं । 

" पुराने जुकाम में किसी भी औषधि का असर न करना "

कैपसिकम की शारीरिक रचना धीमी व सुस्त होती हैं । जिन्हें पुराना जुकाम रहता हो, किसी दवा से लाभ नहीं हो रहा हो , चाहे अच्छी से अच्छी दवा दी जा रहीं हो । उस पर दवा इसलिए असर नहीं करती, क्योंकि उसकी जीवनी शक्ति क्रियाशील नहीं होती । कैपसिकम जीवन शक्ति को क्रियाशील कर देती हैं । रोगी कुछ पढ़ - लिख नहीं सकता और शारीरिक या मानसिक परिश्रम करता हैं तो पसीना आने लगता हैं, वह सर्दी बर्दाश्त नहीं कर पाता । इन लक्षणों में उसकी जीवनी शक्ति को चेतन बनाने के लिए कैपसिकम देने पर या तो वह ठीक हो जाता है , या कुछ देर बाद साइलीशिया या कैलि बाईक्रोम आदि औषधियाँ , जो पहले काम नहीं कर रही थी , वे अब  काम करने लगती हैं और रोगी ठीक हो जाता हैं ।  

" मिर्च की तरह जलन होना " 

मिर्च में लाली और जलन इसकी मुख्य बातें हैं । श्लैष्मिक झिल्ली में जहां भी जलन का लक्षण पाया जाता हैं , वहां यह औषधि फायदेमंद होती हैं । यह जलन मिर्च लगने जैसी होती हैं। इस प्रकार की जलन - जीभ , मुँह , पेट , आंत , मूत्र द्वार , मलद्वार , छाती , फेफड़े व त्वचा आदि पर कहीं भी हो सकती हैं। श्लैष्मिक झिल्ली पर मिर्ची के लगने जैसी जलन में इस औषधि का प्रयोग लाभप्रद होता हैं । 

" सल्फर की तरह धातुगत औषधि "

कई रोगी ऐसे होते हैं जिन्हें सर्दी लग जाती है , परन्तु उनके रोग ' नवीन रोगों ' पर असर करने वाली दवाओं से ठीक हो जाता हैं । जैसे - एकोनाइट , ब्रायोनिया , हिपर आदि औषधियाँ ठंड से उत्पन्न होने वाले रोगों को ठीक करती हैं । परन्तु कभी - कभी यह नवीन रोग ' पुराना ' हो जाता हैं । जैसे - जुकाम एकोनाइट आदि से ठीक होकर बार - बार लौट आती हैं । अर्थात जीवनी शक्ति अपने पूर्ण रूप से नहीं जागी हैं । ठंड से होने वाले रोगों का हठधर्मी होकर बैठ जाना , रोगी को न छोडना , गठिया आदि पुराने रोगों को जड़ से ठीक करने के लिए ' धातुगत औषधि '  की आवश्यकता होती हैं । इसी तरह कैपसिकम भी सल्फर तरह धातुगत औषधि है । 

" आत्मघात का लगातार विचार आना "

आत्मघात संबंधी विचार में व्यक्ति आत्मघात की बात सोचता हैं, परन्तु आत्मघात करना नहीं चाहता । ये विचार उस पर हावी होने का प्रयत्न करते हैं परन्तु वह इन विचारों को निजात पाने का प्रयत्न करता रहता हैं। 


" ज्वर में दोनों कंधों के बीच ठंड शुरु होकर जिस्म में फैलना " 

कैपसिकम के ज्वर में विशिष्ट लक्षण यह होता हैं, कि इसमें दोनों कन्धों के बीच में ठंड लगना शुरु होती हैं , और वह पूरे जिस्म में फैल जाती हैं । ज्वर में सर्दी लगने से पहले प्यास लगती हैं, परन्तु पानी पीते ही शरीर में कपकपी होने लगती हैं । 

" कैपसिकम के अन्य लक्षण " 

>> खांसने पर दूरवर्ती अंगों में दर्द इसका एक अद्भुत लक्षण हैं । जैसे खांसने पर टांगो में , घुटने में , मूत्राशय में या अन्य किसी दूरवर्ती अंगों में दर्द का अनुभव होता हैं । 

>> मुंह में छाले पड़ जाते हैं, जो भीतर जलन पैदा करते हैं । 

>> कानों के पीछे की शोथ -  कान के पीछे की हड्डी का प्रदाह भी इसका लक्षण हैं । 

>> खोपड़ी फूट जाने जैसा सिरदर्द, ज़रा सी हरकत से भयंकर सिरदर्द होता हैं। इसलिये रोगी चलता - फिरता नहीं हैं , खांसी को भी रोकने की कोशिश करता हैं, क्योंकि  खांसने से भी सिरदर्द बढ़ जाता हैं , और सिर पकड़ कर बैठे रहता हैं ताकि कोई हरकत न हो । 

" कैपसिकम की शक्ति तथा प्रकृति "

यह औषधि 6, 30, 200 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । कैपसिकम शीत प्रकृति की औषधि हैं ।


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