बुधवार, 31 मार्च 2021

कैलकेरिया फ्लोरिका ( CALCAREA FLUORICA ) के व्यापक लक्षाण, मुख्य रोग व फायदें

कैलकेरिया फ्लोरिका ( CALCAREA FLUORICA ) के व्यापक लक्षाण, मुख्य रोग व फायदों का विश्लेषण-

  • गिल्टियों की गाठों में फायदेमंद  
  • ट्यूमर में लाभप्रद 
  • मोतियाबिंद में लाभप्रद  
  • टांसिल , एडेनॉयड , हड्डी के बढ़ने , गलने - सड़ने आदि में फायदेमंद 

गिल्टियों की गांठों में फायदेमंद - इस औषधि का विशेष गुण यह है कि कहीं पर भी कड़ापन, गांठ बन जाना या हड्डी उभर आती हैं तो यह आश्चर्यजनक परिणाम देती हैं । जब स्त्रियों के स्तनों में गांठे पड़ जाती हैं , तो उन्हें यह ठीक कर देती हैं । 

ट्यूमर में लाभप्रद - यह औषधि ट्यूमर को ठीक करने में कारगर हैं । इस औषधि का बायोकैमिक तथा होम्योपैथिक दोनों दृष्टियों से ट्यूमर के इलाज के लिए किया जाता हैं । जब साइलीशिया से फायदा नहीं होता तब इससे लाभ हो जाता हैं । 

मोतियाबिंद में लाभप्रद - जब मोतियाबिंद में अंदर का लैंस अपारदर्शी हो जाता हैं । यह भी एक तरह का लेन्स का कड़ा पड़ जाना हैं । कई बार इस औषधि से मोतियाबिन्द ठीक हो जाता हैं । 

टांसिल , एडेनॉयड , हड्डी के बढ़ने , गलने - सड़ने आदि में फायदेमंद - जब टांसिल सख्त हो जाए या एडेनॉयड हो जाए तो इस सख्ती को दूर करने में यह औषधि लाभकारी होती हैं । प्राय: देखा जाता हैं कि जब बैराइटा कार्ब टॉन्सिल और एडेनॉयड को ठीक नहीं कर पाती तो यह ठीक कर देती हैं । दांतों में अगर एनैमल की कमी हो तो यह दांतों पर एनैमल चढा देती हैं । कई हड्डी रोगों को ठीक करती हैं ।  जब किसी स्थान की हड्डी के बढ़ जाने या उसके गलने - सड़ने पर यह औषधि लाभप करती हैं । जब किसी स्त्री के नीचे के जबड़े की हड्डी सड़ जाती हैं और किसी अन्य औषधि से ठीक नहीं हो तो  कैलकेरिया फ्लोरिका 6x शक्ति को कुछ दिन लगातार लेने से फायदा हो जाता हैं । 

कैलकेरिया फ्लोरिका की शक्ति तथा प्रकृति - यह  बायोकैमिक दृष्टि से 3x , 6x , 12x में  और होम्योपैथिक  30 , 200 शक्ति में उपलब्ध है । यह शीत प्रकृति की औषधि हैं ।


कैलकेरिया फॉसफोरिका ( CALCAREA PHOS ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

कैलकेरिया फॉसफोरिका ( CALCAREA PHOS ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन-

  • बच्चों का सम्पूर्ण विकास   
  • बढ़ते बच्चों की टांगों में दर्द 
  • बच्चो को ऐंठन  
  • मानसिक दुख व निराशा
  • प्रथम मासिक धर्म  की तकलीफें 
  • कैलकेरिया कार्ब तथा कैलकेरिया फॉस की तुलना 

बच्चों का सम्पूर्ण विकास - इस औषधि में कैल्शियम और फॉसफोरस का मिश्रण होता हैं । दोषपूर्ण शारीरिक विकास के लिए यह महाऔषधि हैं । इसका बच्चों के शारीरिक विकास के लिए विशेष उपयोग होता हैं । जिन बच्चों के गिल्टिया बन जाती हैं , दांत ठीक समय पर नहीं निकलते , जिनकी अस्थियों का पूर्ण विकास नहीं होता ,  अच्छा खाने - पीने पर भी भोजन का नहीं लगना , कद नहीं बढ़ना , पेट बढ़ जाना, सिर की खोपड़ी  पिलपिली होना, हड्डियाँ का नही जुड़ना और इतनी पतली गर्दन जो सिर को नहीं थाम पाती, ऐसे बच्चों के लिए यह औषधि संजीवनी बूटी का काम करती हैं । उनके शरीर के अणुओं में नई शक्ति का संचार कर उन्हें स्वास्थ्य प्रदान करती हैं । यदि बच्चे की बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक व मानसिक विकास नहीं होता हैं, तो यह औषधि रामबाण हैं ।  इस प्रकार का बच्चा पतला व चपटा होता हैं, जिसकी छाती की हड्डियों को गिना जा सकता हैं । 

बढ़ते बच्चों की टांगों में दर्द - बढ़ती आयु के बच्चों की टांगों या किसी अन्य अस्थि में जब दर्द होता हैं, तो कैलकेरिया फॉसफोरिका उसे शांत कर देती हैं । 

बच्चो को ऐंठन - बच्चों को अगर ऐंठन पड़ने लगे तो इस औषधि के प्रयोग से बेहतर लाभ होता हैं । परन्तु इस औषधि का उपयोग ऐंठन शांत हो जाने के बाद करे । 

मानसिक दुख व निराशा - प्रेम वियोग से, किसी दुखद समाचार से या किसी अन्य प्रकार की निराशा के कारण उत्पन्न रोगों में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 

प्रथम मासिक धर्म की तकलीफें - युवतियों के लिए कैलकेरिया फॉसफोरिका अति उत्तम औषधि हैं । जब नवयुवतियाँ यौवन में प्रवेश करती हैं, तब उनका मासिक धर्म ठीक समय पर शुरु नहीं होता हैं, तो यह औषधि सब ठीक कर देती हैं । कई लडकिया प्रथम मासिक धर्म में ठंड खा जाती हैं, जिससे उन्हें मासिक धर्म काल में पीड़ा होती हैं । अगर इस हालत को ठीक समय पर न सुधारा जाए , तो यह कष्ट उम्र भर रह सकता हैं । इस औषधि से इस कष्ट शुरु में ही ठीक किया जा सकता हैं । यदि किसी माता को दो - तीन ऐसे बच्चे हो चुके हैं, जिनका शरीर कैलकेरिया फॉसफोरिका का हैं । अगर ऐसी माता को गर्भावस्था में ही कैलकेरिया फॉसफोरिका दे दिया जाए, तो उसका बच्चा रोग मुक्त व स्वस्थ पैदा होगा । 

कैलकेरिया फॉसफोरिका की शक्ति तथा प्रकृति - बायोकैमिक में 1x से 3x व होम्योपैथिक में उच्च शक्ति अधिक लाभप्रद होती हैं । यह शीत प्रधान औषधि हैं ।


मंगलवार, 30 मार्च 2021

कैलकेरिया कार्बोनिका ( CALCAREA CARB ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदें

कैलकेरिया कार्बोनिका ( CALCAREA CARB ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदों का विश्लेषण -

  • थुलथुलापन, दुर्बलता, थोड़े श्रम से थक जाना, अस्थियों का अपूर्ण विकास 
  • पेट व सिर बड़ा और गर्दन व टांगे पतली 
  • शरीर व पांव ठंडा परन्तु सिर पर अधिक पसीना  
  • शरीर व स्रावों से खट्टी बदबू 
  • शारीरिक व मानसिक दुर्बलता 
  • मासिक धर्म की अनियमितता 
  • रोगी शीत प्रधान व आराम पसन्द
  • बच्चों के दाँत निकलते समय के रोग 
  • रोगी को कण्ठमाला की प्रकृति

कैलकेरिया कार्बोनिका की प्रकृति - गर्म हवा रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि ठंड , ठंडी हवा से, शारीरिक श्रम से, मानसिक श्रम से बढ़ना चढ़ाई में चढ़ने से व बच्चों के दांत निकलने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

थुलथुलापन, दुर्बलता, थोड़े श्रम से थक जाना, अस्थियों का अपूर्ण विकास - बच्चा के जब दांत निकल रहे होते हैं, तभी उन्हें देखकर पहचाना जा सकता हैं कि बड़ा होकर उसके शरीर की रचना कैसी होगी । अगर उसका शरीर भोजन तत्वों से लाइम समीकरण नहीं कर रहा , तो उसकी हड्डियों का विकास ठीक नहीं हो पाएगा । हड्डियों की रचना से कहा जा सकता है कि उनका नियमित विकास नहीं हो रहा । किसी अंग में हड्डियां पतली , तो किसी में टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देती हैं ।  टाँगें पतली , मेरुदण्ड टेढ़ा , कमजोर हड्डियां की ऐसी हालत होती है उस बच्चे विकास ठीक नहीं हो पाता ।  बच्चें की जीवनी शक्ति में कोई निर्बलता होती हैं, जिसे दूर किए बिना बच्चे का विकास हो पाता ।  इस प्रकार के स्थूल , थुलथुल , कमजोर , अस्थियों के टेढ़े - मेढ़े व्यक्ति या बच्चा हो , वह बचपन से इन लक्षणों को लेकर बड़ा  हुआ हो तो कैलकेरिया कार्बोनिका उसे ठीक कर उसकी शरीर की रचना को बदल देती हैं । आजकल लड़के लड़कियां पतला होने की कोशिश करते हैं । क्योंकि इसमे वे सुन्दरता और मोटापे के रोगों देखते हैं ।  अगर उसके शरीर की रचना कैलकेरिया की है , तो उचित शक्ति की कैलकेरिया कार्बोनिका देने से उनकी मनोकामना पूरी जाती हैं । यदि कैलकेरिया कार्बोनिका माता को गर्भावस्था में दी जाए , तो बच्चों में होने वाली इन परेशानियों से बचा सकता हैं और सुदृड़ पैदा होगा । 

पेट व सिर बड़ा और गर्दन व टांगे पतली - ऊपर जो कुछ भी कहा गया हैं, उससे स्पष्ट होता हैं कि जिस व्यक्ति के विकास में अस्थियों और मांसपेशियों का पूर्ण विकास नहीं होगा तो उसकी क्या स्थिति होगी । उस बालक या युवा का स्थिति - बड़ा सिर , बड़ा पेट, पतली गर्दन और पतली टांगे जिससे उन्हें चलने - फिरने में दिक्कत होती हैं। 

शरीर व पांव ठंडा परन्तु सिर पर अधिक पसीना - इसके रोगी का विशेष लक्षण यह है कि उसे अत्यंत सर्दी लगती हैं , शरीर ठंडा रहता है , लेकिन सोते समय पसीना अधिक आता हैं । पसीने की मात्रा सिर पर अधिक होती हैं।  साथ ही कैलकेरिया का विलक्षण लक्षण यह भी हैं कि इसके रोगी को ठंडे कमरे में भी उसे पसीना आता हैं और पांव बर्फ जैसे ठंडे होते हैं । कैलकेरिया से शरीर की जीवनी शक्ति का सुधार तो होता ही हैं, और इसके साथ ही जिन रोगों का हमें पता नही , वह भी ठीक हो जाते हैं । कैलकेरिया के रोगी के शरीर में ठंड कभी सिर में, कभी पाँव में, कभी पेट में और कभी जांघों में महसूस होती हैं और भिन्न - भिन्न अंगों में पसीना भी आता हैं ।  

शरीर व स्रावों से खट्टी बदबू - कैलकेरिया के रोगी के शरीर व स्त्रावों से खट्टी बदबू आती हैं । उसके पसीने , कय तथा दस्त में खट्टी बदबू आती हैं । कई बार किसी मोटे थुलथुले व्यक्ति में पसीने से खट्टी बदबू आती रहती हैं, तो वह कैलकेरिया का रोगी हैं । 

शारीरिक व मानसिक दुर्बलता - जिस प्रकार रोगी का शरीर दुर्बल होता हैं , उसी प्रकार उसका मन भी दुर्बल होता हैं । देर तक मानसिक श्रम नहीं कर सकता । शारीरिक श्रम से भी वह तुरन्त थक जाता हैं और पसीने से भीगा रहता हैं । अत्यधिक चिन्ता, व्यापारिक कार्यों में व्यस्तता तथा मानसिक उत्तेजना से जो रोग उत्पन्न होते हैं, उनमें यह औषधि लाभप्रद होती हैं ।  कैलकेरिया में निम्न मानसिक  लक्षणों पर भी ध्यान देना आवश्यक हैं- 

>> मानसिक ह्रास - रोगी समझता हैं कि उसका मानसिक ह्रास हो रहा हैं । वह सोचता है , कि वह पागलपन की तरफ बढ़ रहा हैं । वह मानने लगता है कि लोग भी उसके बारे में ऐसा ही सोचते हैं । लोग उसकी तरफ इसी सन्देह से देखते हैं और वह भी उनकी तरफ इसी संदेह से देखता हैं। वह सोचता हैं कि लोग इसके बारे उससे कह क्यो नही देते । यह विचार हर समय दिन - रात उसके मन में रहता हैं, और जिसके कारण वह सो नहीं पाता । 

>> छोटे - छोटे विचार आना - कैलकेरिया के रोगी के मन में छोटे - छोटे विचार आते रहते हैं । उसका मन छोटी - छोटी बातों से इतना जकड़ जाता हैं, कि उनसे छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता हैं।  उसका मानसिक स्तर बिगड़ चुका होता है । वह बुद्धि के स्थान पर मनोभाव से काम लेता है । बहुत कोशिश करके अगर वह अपने मन को उन छोटे - छोटे विचारों से अलग कर सोने की कोशिश करता हैं , आंखें बंद करने की कोशिश करता हैं , लेकिन आंखें बंद नहीं हो पाती , वह एकदम उत्तेजित अवस्था में आ जाता हैं और ये विचार उसे इतना परेशान कर देते हैं कि वह सो नहीं पाता ।

>> दौड़ने और चिल्लाने की इच्छा - जिन लोगों का मस्तिष्क चिन्ता की अति तक पहुँच जाता हैं , जो गृहस्थी में किसी दुखद घटना से अत्यन्त पीड़ित होते हैं, उनका हृदय टूट जाता हैं । इस प्रकार की चिन्ता व्यापारिक भी हो सकती है । रोगी घर में आगे - पीछे चलता - फिरता हैं , उसे शान्ति नही मिलती । मन करता हैं कि खिडकी से कूदकर प्राण दे दे । यह एक प्रकार का हिस्टीरिया हैं, जिसे कैलकेरिया ठीक कर देता है ।

>> सब कामकाज छोड़कर बैठ जाना - कैलकेरिया का रोगी अपनी मानसिक दुर्बलता के कारण अपना सब काम धंधा छोड़ कर बैठ जाता हैं । कितना ही अच्छा व्यापार क्यों न हो , उसे अपने काम में रुचि नहीं होतहोना

मासिक धर्म की अनियमितता - मासिक धर्म की  अनियमितता में तीन बातों को ध्यान में रखना होता हैं । जैसे- समय से पहले, अधिक खून, और ज्यादा दिनों तक होना । मासिक धर्म  प्राय: हर तीसरे सप्ताह शुरू होती है , रुधिर की मात्रा बहुत अधिक होती है , और समाप्त होते हुए भी एक सप्ताह ले लेती हैं । परंतु मासिक धर्म में इन लक्षणों के साथ कैलकेरिया के अन्य लक्षण भी होना जरूरी हैं ।  

रोगी शीत प्रधान व आराम पसन्द - कैलकेरिया का रोगी शीत प्रधान होता हैं । उसे ठंडी हवा पसंद नहीं आती । आंधी - तूफान , सर्दी का मौसम उसके रोग को बढ़ा देते हैं । वह शरीर को गर्म रखने के लिए कपड़े लपेट कर रखता हैं और दरवाजे - खिड़कियां बंद रखना चाहता हैं ।  ठंडा पन और कमजोरी उसका चरित्रगत लक्षण हैं । वह शीत प्रधान होने के साथ-साथ आराम पसंद होता हैं । देखने को वह मोटा ताजा,  थुलथुला, फूला हुआ चेहरा होता हैं, परन्तु शारीरिक श्रम नहीं कर पाता है । अगर थोडा - सा भी परिश्रम करता हैं , तो सिर दर्द , बुखार हो जाता हैं । ज्यादा चलना-फिरना , मेहनत करना व बोझ उठाना रोगों को आमंत्रण देना हैं ।  

बच्चों के दाँत निकलते समय के रोग - कैलकेरिया के लक्षणों में बच्चे की शिकायतों को नहीं भूला जा सकता । बच्चों के दांत निकलते समय अधिक कष्ट से गुजरता हैं । दांत निकलते समय वह दूध हज़म नही कर सकता और जमे हुए दही की तरह उल्टी कर देता हैं , जिसमें से खट्टी बदबू आती हैं । दांत निकलते समय बच्चों को दस्त होने लगते हैं , जो फटे हुए दूध की तरह होता हैं और उसमें भी खट्टी बदबू आती हैं । दांत निकलते समय बच्चों को खांसी की शिकायत भी होती हैं।  इन तीनो शिकायतों में अगर बच्चे को सोते समय सिर पर पसीना आता हो , तो कैलकेरिया से ये रोग ठीक हो जाते हैं । 

रोगी को कण्ठमाला की प्रकृति - कैलकेरिया के रोगी की गर्दन के चारों ओर गिल्टियाँ फूली होती हैं । ये गिल्टियाँ शरीर के अन्य अंगों मे भी होती हैं । गिल्टियों पर इस औषधि का असर कारगर होता है । पेट की गिल्टियों सख्त होना टी ० बी ० का लक्षण हो सकता हैं । कभी - कभी इन गिल्टियों का आकार मुर्गी के अंडे जितना हो जाता हैं । किसी भी अंग में गिल्टियों के साथ कैलकेरिया के अन्य लक्षणों का होना आवश्यक हैं ।

कैलकेरिया कार्बोनिका औषधि के अन्य लक्षण-

>> कैंसर - यदि रोगी में कैलकेरिया के लक्षण हैं और वह कैंसर से पीड़ित हैं। यदि कैंसर का रोगी सवा साल जी सकता हैं , तो कैलकेरिया देने से वह पांच साल तक जी सकता हैं ।  

>> गहरे घाव - यदि शरीर के किसी भी अंग में गहरा घाव हो और कैलकेरिया के लक्षण हो , तो वह घाव में पस पड़ जाने पर भी कैलकेरिया से ठीक हो जाएगा । 

>> अंडा खाने की इच्छा और दूध से अरुचि - कैलकेरिया में अंडा खाने की प्रबल इच्छा होती हैं , जबकि दूध पीने से नफरत करता हैं । 

>> बच्चे द्वारा स्तनपान करने पर मासिक धर्म होना - कैलकेरिया का एक विचित्र लक्षण यह है कि जब बच्चा मां का स्तनपान करने लगता है , तब मासिक धर्म जारी हो जाता है । थोड़ी सी मानसिक उत्तेजना में यह मासिक स्राव जारी होने लगता हैं ।

>> गठिया या वात रोग - ठंड लगने पर जोड़ों का दर्द बढ़ जाना इस औषधि लक्षण हैं । पांव ठंडे होते हैं , जैसे गीली जुराब पहनी हो । सोते समय पैरों पर अधिक गर्म कपड़ा डालना पड़ता हैं । जब पैर गर्म हो जाते हैं , तब उसमें जलन होने लगती हैं और रोगी उन्हें बिस्तर से बाहर निकाल देता हैं ।  

कैलकेरिया कार्बोनिका की शक्ति तथा प्रकृति - कैलकेरिया कार्बोनिका अनेक रोग साधक और दीर्घकालिक औषधि हैं । यह 6, 12, 30 , 200 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । यह शीत प्रधान औषधि हैं ।


गुरुवार, 25 मार्च 2021

कैलेडियम ( CALADIUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदें

कैलेडियम ( CALADIUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदों का विश्लेषण -

  • अत्यन्त भुलक्कड़ 
  • नपुंसकता में भी सहवास की तीव्र इच्छा 
  • स्त्री जननांग में असहनीय खुजली
  • मीठा पसीना, पसीने के बाद अच्छा लगना
  • धूम्रपान की आदत से मुक्ति

अत्यन्त भुलक्कड़ - इसका रोगी अत्यन्त भुलक्कड़ होता हैं, जो काम कर चुका हैं, सोचने लगता हैं, कि उसमे वह किया हैं या नहीं। जिस चीज़ पर निश्चय करना हो उसे बार - बार जाकर , देखकर , हाथ लगाकर निश्चय करता हैं, और वापस लौटने पर फिर अनिश्चित हो जाता हैं । ऐसा तो तब होता है , जब सब कुछ उसने स्वय किया हैं । कैलेडियम इस प्रकार की मन की अनिश्चित अवस्था व भुलक्कड़पन में लाभप्रद होती हैं । इस प्रकार की अवस्था पागलपन तक भी पहुंच सकती हैं । रोगी का ऐसी हालत में पहुँच जाने पर वह पूरे दिन यही सोचता रहता हैं, कि जो काम वह कर चुका हैं या जो हो जाने चाहिए थे , वे उसने किए या नहीं किए , वे हुए या नहीं हुए ।  जितना ही वह किसी विषय पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता हैं, लेकिन उतना ही उस पर केन्द्रित नहीं हो पाता हैं। 

नपुंसकता में भी सहवास की तीव्र इच्छा - मन की इस प्रकार की दुर्बलता प्राय: व्यभिचारियों और हस्तमैथुन करने वालों में भी पायी जाती हैं । रोगी की स्त्री प्रसंग की उत्कृष्ट इच्छा होती हैं, परन्तु वह मैथुन में असमर्थ होता हैं । स्त्री का आलिंगन करने पर भी उसमें उत्तेजना नहीं आती। ऐसे दुर्व्यसनी लोग आती - जाती महिलाओं की ओर ताकते हैं, और उनका वीर्य रिसता रहता हैं। ऐसे रोगियों का इलाज न करना ही ठीक होता हैं, क्योंकि जब तक वे स्वयं इस रोग से मुक्त न होना चाहें तब तक वह ठीक नहीं हो सकता। ऐसे दुर्व्यसनी, व्यभिचारी विचारों से ग्रस्त लोग रात भर उलटा पलटा करते हैं। अर्ध - निंद्रमुक्ति्था में उत्तेजना रहती है , परन्तु जागते ही इन्द्रिय शिथिल हो जाती हैं। पुरुषों की जननेन्द्रिय शिथिलता को कैलेडियम, पिकरिक ऐसिड, सिलेनियम और थूजा ठीक कर देती हैं । 

स्त्री जननांग में असहनीय खुजली - इस औषधि का एक विशेष लक्षण स्त्री के जननांगों की खुजली हैं । प्राय गर्भावस्था के दौरान ऐसा होता हैं । इतनी खुजली होती है, कि वह सो नहीं सकती । इस खुजली के कारण उसकी काम चेष्टा बढ़ जाती हैं , तथा वह शरीर व मन से कमजोर हो जाती हैं । 

मीठा पसीना, पसीने के बाद अच्छा लगना - रोगी को मीठा पसीना आता है । यहाँ तक कि मक्खियां उस पर मिठास के लिये उसकी तरफ खिंची आती हैं । पसीना आने से के बाद रोगी को आराम मिल जाता हैं । 

धूम्रपान की आदत से मुक्ति - कैलेडियम दवा उन लोगों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि यह धूम्रपान की इच्छा के प्रति अरुचि पैदा कर देती हैं , तम्बाकू खाने की आदत को भी दूर कर देती है ।  

कैलेडियम की शक्ति - यह 6 , 30 , 200 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । सेवन में दवा की शक्ति का प्रयोग चिकित्सक की सलाह से ही करे ।


कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस ( CACTUS GRANDIFLORUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस ( CACTUS GRANDIFLORUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक विश्लेषण -

  • ऐसा अनुभव जैसे हृदय को मुट्ठी से जल्दी - जल्दी दबाया और छोड़ा जा रहा हैं   
  • किसी भी अंग में जकड़न का अनुभव 
  • वात रोग या गठिया में जकड़न का अनुभव 
  • बायीं बाह का सुन्न हो जाना 
  • रक्त संचय के कारण विभिन्न अंगों से खून आना  
  • पेट, आंतो, हाथों, टांगों व सिर में स्पन्दन

कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस की प्रकृति - खुली हवा से रोग में लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि प्रातः दोपहर तथा सायं काल में, बायीं करवट लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

ऐसा अनुभव जैसे हृदय को मुट्ठी से जल्दी - जल्दी दबाया और छोड़ा जा रहा हैं - कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस हृदय रोग की प्रधान दवा हैं । रोगी को अनुभव होता हैं, कि उसका हृदय मुट्ठी में दबाया हुआ हैं, और जल्दी - जल्दी उसे दबाया और छोड़ा जा रहा हैं । हृदय में ऐसा दर्द होता हैं, कि वह समझता है कि उसका रोग असाध्य हैं । उसे मृत्यु डर लगने लगता हैं । रोगी उदास, अकेला व चुपचाप बैठा रहता हैं और किसी से बात नहीं करता । कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस में हृदय रोगी प्राय: रोया करता हैं और घुटन महसूस करता हैं । दिल के इस प्रकार के कष्ट में कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस औषधि उपयुक्त हैं। 

किसी भी अंग में जकड़न का अनुभव - जकड़न का अनुभव सिर्फ हृदय तक सीमित नहीं रहता हैं । रोगी किसी भी अंग में जकड़न अनुभव करे, तो कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस ही उत्तम दवा हैं । रोगी को अनुभव होता हैं, कि उसकी छाती लोहे की जंजीर से जकड़ी हुई है और सिर पर भारी बोझ रखा हो । यह जकड़न हृदय और छाती के अतिरिक्त मूत्राशय , गुदा , जरायु और योनि आदि किसी भी अंग में हो सकती हैं । हृदय की जकड़न , सिर का बंधे होने का अनुभव , छाती में वजन जिससे सांस लेने में कठिनाई , गले में जकड़न व ऐंठन तथा जरायु में ऐसी जकड़न कि मैथुन न कर सके।  इन सभी अंगों के जकड़न में कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस  उपयोगी औषधि हैं । 

वात रोग या गठिया में जकड़न का अनुभव - वात रोगों में रोगी को जोड़ों में ऐसे अनुभव होता हैं , मानो की पट्टी बंधी हुई हैं । इस प्रकार के अनुभव में जकड़न और दबाव महसूस होता हैं और दर्द की अनुभूति होती हैं । इस प्रकार के जोड़ों के जकड़न में कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस लाभप्रद होती हैं।

बायीं बांह का सुन्न हो जाना -  हृदय के रोगों से बायीं बांह में ऐंठन और सुन्नपन आ जाता हैं । जो लोग गठिया या हिस्टीरिया से ग्रसित होते हैं, उनमें भी बायीं बांह में सुन्नपन के लक्षण पाए जाते हैं । बायीं बांह के सुन्नपन में कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस उपयोगी दवा हैं । 

रक्त संचय के कारण विभिन्न अंगों से खून आना - हृदय के रोगों से रक्त संचार विघटित हो जाता हैं। इस प्रकार अधिक रक्त संचय के कारण भिन्न - भिन्न अंगों से रक्त बहने लगता हैं । सिर में रक्त का संचय इतना हो जाता हैं, कि नाक से नकसीर और खांसने पर गले से खून आ जाता हैं । इनके अलावा जरायु व मूत्राशय से पेशाब में भी खून आ जाता हैं । बवासीर में भी मस्से खून से भर कर बड़े हो जाते हैं, इसलिये कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस खूनी बवासीर की भी महत्वपूर्ण दवा हैं । 

पेट, आंतो, हाथों, टांगों व सिर में स्पन्दन - पेट में , आंतों में, हाथों में , टांगों में और सिर में हृदय की नाड़ी का स्पन्दन अनुभव होना कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस औषधि का विचित्र लक्षण हैं । 

कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस औषधि के अन्य लक्षण - 

>> ग्यारह बजे रोग में वृद्धि -  प्रातः या सायं व दोपहर ग्यारह बजे रोगी के लक्षण बढ़ जाते हैं । छाती पर वजन की शिकायत होती हैं, ज्वर आता हैं या सुबह - शाम  ठंड सताने लगती हैं । 

>> मूत्र अवरोध - मूत्राशय में ऐसा संकुचन होता हैं, कि पेशाब नहीं निकलता हैं । कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस  में रक्त के थक्के आसानी से बन जाते हैं । शरीर में रक्त का संचार इतने जल्दी थक्कों में जम जाता हैं, कि रक्त संचार रूक जाता हैं । यदि मूत्राशय में रक्तस्राव हो जाए , तो उसके थक्के जम कर मूत्र मार्ग को रोक देते हैं, जिससे रोगी का मूत्र रूक जाता हैं ।

>> मासिक धर्म का कष्ट - मासिक धर्म के समय तंदुरुस्त व हृष्ट पुष्ट स्त्री का जरायु मार्ग इन रक्त के थक्कों से रुक जाता हैं और इन्हे बाहर धकेलने के लिए जरायु में ऐंठन पैदा हो जाती हैं , जो प्रजनन के समय के कष्ट के समान होती हैं । रोगिणी दर्द से चिल्लाती हैं और जब तक रक्त के थक्के बाहर निकल नहीं जाते तब तक उसे चैन नहीं पड़ता । अगर यह अवस्था गठिये के रोगी में हो तो कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस ही इस तकलीफ को दूर कर सकती हैं । ध्यान रखे कि कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस मुख्य तौर पर हृदय रोग की औषधि हैं और इसलिए रक्त से संबंधित रोगों में लक्षणों के अनुसार इसका प्रयोग होता हैं । 

कैक्टस ग्रैन्डीफ्लोरस की शक्ति तथा प्रकृति - सह औषधि 6 , 30 , 200 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । यह ऊष्ण प्रधान औषधि हैं ।


बुधवार, 24 मार्च 2021

ब्रायोनिया ( BRYONIA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

ब्रायोनिया ( BRYONIA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक विश्लेषण-

  • जुकाम , खांसी , ज्वर आदि रोगों में 
  • हरकत से रोग में वृद्धि और विश्राम से रोग में कमी 
  • दर्द की तरफ लेटने से आराम  
  • श्लैष्मिक झिल्ली का खुश्क होना और थोड़ी- थोड़ी देर में पानी पीना 
  • मासिक धर्म बंद होने पर नाक या मुंह से खून आना और सिर दर्द होना 
  • सूर्योदय के समय सिर दर्द और सूर्यास्त के समय बंद हो जाना 
  • क्रोध व मानसिक लक्षणों से रोग उत्पत्ति
  • गठिये में गर्मी और हरकत से आराम

ब्रायोनिया की प्रकृति - दर्द वाली जगह को दबाने से, ठंडी हवा से, आराम करने से, गठिये में सूजन पर गर्म सेक करने से और हरकत से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं । जबकि हरकत से रोग बढ़ भी जाता हैं, गर्मी से ठंड में जाने से, खाने के बाद, क्रोध से और स्राव के दब जाने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

जुकाम , खांसी , ज्वर आदि रोगों में - प्राय: रोगी को जुकाम , खांसी व ज्वर आदि रोगों में एकोनाइट या बेलाडोना दी जाती हैं । परन्तु रोग के आने और जाने की गति का लक्षण होता हैं । इस गति को ध्यान में रखते हुए ही औषधि का निर्वाचन होता हैं । इससे रोग के कुछ लक्षण दूर हो सकते है , लेकिन रोग नहीं । उदाहरणार्थ से समझते हैं- एकोनाइट का रोगी हृष्ट - पुष्ट होता हैं, लेकिन ठंड में जाने से उसे तेज जुकाम , खांसी या बुखार हो जाता हैं । और शाम को सैर पर निकलने से रात को तेज बुखार आ जाता हैं । बेलाडोना में भी ऐसा ही पाया जाता हैं , परन्तु उसमें सिर दर्द जैसे मस्तिष्क के लक्षण विशेष होते हैं । जबकि ब्रायोनिया में ऐसा नहीं होता । यदि रोगी ठंड में चला जाता हैं, तो उसमें लक्षण धीरे - धीरे प्रकट होते हैं । पहले दिन छींके आती हैं , दूसरे दिन नाक बहने लगता हैं , और तीसरे दिन बुखार आता हैं । बुखार जिस तरह धीरे - धीरे आता हैं, वैसे ही धीरे - धीरे ही जाएगा । इसीलिये टाइफॉयड़ में एकोनाइट या बेलाडोना नहीं दी जाती । औषधि देते हुए औषधि की गति और प्रकृति को समझना ज़रूरी होता हैं । रोग के लक्षणों और औषधि की गति तथा प्रकृति के लक्षणों में साम्य होना जरूरी हैं , तभी औषधि कारगर होगी । 

हरकत से रोग में वृद्धि - दर्द होने स्थिति में हरकत से रोग बढ़ता हैं । अगर रोगी लेटा हुआ है , तो आँख खोलने या आवाज़ सुनने तक से रोगी को कष्ट अनुभव होता हैं । वात रोग , गठिया , सूजन , गिर जाने से दर्द आदि में हरकत होने से रोग में वृद्धि होने पर ब्रायोनिया लाभ करती हैं । 

जब तक रोगी रात को लेटा रहता हैं तो दस्त नहीं आता , परन्तु सवेरे बिस्तर से हिलते ही उसे बाथरूम में जाना पड़ता हैं ।  टट्टी जाने को एकदम हाजत होती हैं । अधिक दस्त आते हैं और कई बार आते हैं । जब रोगी इस काम से फ्री हो जाता है तब वह शक्तिहीन होकर मृत प्राय पड़ा रहता हैं, थकावट से शरीर पर पसीना आ जाता हैं । जरा सी हरकत से रोग में वृद्धि होने पर उन्हें यह दवा ठीक कर देती है ।  

दर्द की तरफ लेटने से आराम - जिस तरफ भी दर्द होता हैं, उस तरफ का हिस्सा दबा होने से वहां हरकत नहीं होती इसलिये दर्द में रोगी को आराम मिलता हैं । जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटने से आराम में ब्रायोनिया लाभदायक होती हैं।  

श्लैष्मिक झिल्ली का खुश्क होना और थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीना - खुश्की के कारण रोगी के होंठ सूख जाते हैं और खून निकलने लगते हैं। होंठ और नाक की खुश्की इस कदर बढ़ जाती हैं, कि रोगी उन्हें नोचता कर खून तक निकाल लेता हैं । ब्रायोनिया में इसी खुश्की के कारण उसे प्यास बहुत लगती हैं । वह थोड़ी थोड़ी देर में अधिक मात्रा में ठंडा पानी पी जाता हैं। 

श्लैष्मिक झिल्ली की खुश्की और कब्ज - श्लैष्मिक झिल्ली की खुश्की का असर आंतो पर भी पड़ता हैं, जिससे रोगी को कब्ज़ रहती हैं । सूखा व सख्त  मल आता हैं और बहुत दिनों में टट्टी जाता हैं ।  भयंकर कब्ज को ब्रायोनिया ठीक कर देती हैं । 

श्लैष्मिक झिल्ली की खुश्की और खुश्क खांसी - श्लैष्मिक झिल्ली की खुश्की का असर फेफड़ों पर भी पड़ता हैं । खासते - खासते गला फटने लगता हैं , लेकिन कफ बाहर नहीं निकलता । ठंड से गरम कमरे में जाने से खांसी बढ़ने में ब्रायोनिया उत्तम औषधि हैं।  

मासिक धर्म बंद होने पर नाक या मुंह से खून आना और सिर दर्द होना - यह ब्रायोनिया का विलक्षण लक्षण हैं । अगर रोगिणी नाक या मुंह से खून निकलने की शिकायत करे , तो उसे यह पूछना चाहिए कि उसका मासिक धर्म तो बंद नहीं हो गया और इसके साथ ही सिर दर्द होने लगता हैं । तो वह ब्रायोनिया का रोगी हैं।

सूर्योदय के समय सिर दर्द और सूर्यास्त के समय बंद हो जाना - इसमें सिर दर्द सूर्योदय के साथ शुरू होता हैं और सूर्यास्त के बाद रूक जाता हैं । इसके साथ ब्रायोनिया के अन्य लक्षण भी हो सकते हैं ।  

क्रोध व मानसिक लक्षणों से रोग उत्पत्ति - ब्रायोनिया में अनेक मानसिक लक्षण होते हैं । बच्चा क्रोध करता हैं, जो वस्तु मिल नहीं सकती उसके लिए जिद करने लगता हैं। और दे दी जाए तो लेने से इंकार करता हैं । ऐसी चीजों की मांग करता जो मिल नहीं सकती और मिलती है, तो फेंक देता हैं।

गठिये में गर्मी और हरकत से आराम - ब्रायोनिया का उपयोग गठिये में भी किया जाता हैं । ब्रायोनिया का रोगी ठंडी हवा पसन्द करता हैं और ठंडा कपड़ा ओढ़ना चाहता हैं । जबकि गठिये के दर्द मे अपनी प्रकृति के विरुद्ध उसे गर्मी से आराम मिलता हैं और रोगी आराम से लेटे रहना चाहता हैं।  गठिये के रोग में रोगी चलने - फिरने से ठीक रहता हैं, क्योंकि इस प्रकार उसके दर्द भरे अंगों को गति से गर्मी मिलती हैं । 

ब्रायोनिया औषधि के अन्य लक्षण- 

>> नौ बजे रोग में वृद्धि - ब्रायोनिया में ज्वर के लक्षण शाम को नौ बजे बढ़ता हैं । ज्वर आकर सर्दी लगना शुरु हो जाता हैं । 

>> रोगी खुली हवा चाहता हैं - ब्रायोनिया का रोगी कमरे के दरवाजे - खिड़कियां खुली रखना पसन्द करता हैं । क्योंकि बंद कमरा उसकी सांस फूलने लगती हैं और तकलीफें बढ़ जाती हैं ।  

>> सोने के बाद रोग वृद्धि - सोने के बाद रोग बढ़ जाना इसका व्यापक लक्षण हैं । क्योंकि खाना खाने के बाद उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती हैं । 

>> दांत के दर्द में दबाने और ठंडे पानी से लाभ - दांत के दर्द में मुह में ठंडे पानी से लाभ होता हैं क्योंकि ब्रायोनिया ठंड पसंद करने वाली दवा हैं । जिधर दर्द हो उधर लेटने या  दबाने से आराम मिलता हैं । 

>> गर्म शरीर में ठंड से रोग में वृद्धि - शरीर गर्म हो जाने पर ठंडा पानी पीने या स्नान कर लेने से रोग बढ़ जाता हैं । जबकि ब्रायोनिया के रोगी को ठंड पसंद हैं ,  परन्तु अगर वह गर्मी से आ रहा हो और शरीर गर्म हो, तब ठंडा पानी पीने या ठंडे स्नान से रोग में वृद्धि हो जाती हैं । 

>> दायीं फलक में दर्द - दायीं छाती से पीट की तरफ दायें कन्धे की फलक में दर्द हो , तो ब्रायोनिया और चैलीडोनियम से लाभ होता हैं । दाएं फलक के नीचे के कोने के दर्द में चैलीडोनियम विशेष औषधि हैं ।   

ब्रायोनिया की शक्ति तथा प्रकृति - ब्रायोनिया की  6, 30 व 200 की शक्ति उपलब्ध हैं । यह औषधि  ऊष्ण प्रकृति की हैं।


कैलकेरिया आर्सेनिका ( CALCAREA ARSENICA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

कैलकेरिया आर्सेनिका ( CALCAREA ARSENICA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार से वर्णन -

  • गहरी व दीर्घकालिक औषधि 
  • हृदय से उठने वाले ऑरा के बाद मृगी का दौर 
  • रोगी जिस तरफ लेटता हैं, सिर दर्द दूसरी तरफ चला जाता है

कैलकेरिया आर्सेनिका की प्रकृति - गर्मी से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि सर्दी से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

गहरी व दीर्घकालिक औषधि - यह औषधि दो दवाए कैलकेरिया तथा आर्सेनिक के मिश्रण से बनी हैं । दोनों औषधियों की क्रिया गहरी और दीर्घकाल तक रहने वाली होती है । इस प्रकृति के कारण यह औषधि गहरी बीमारी को भी ठीक कर देती हैं । इन गहरी बीमारियों में मृगी तथा सिरदर्द विशेष हैं । 

हृदय से उठने वाले ऑरा के बाद मृगी का दौर - इस औषधि से मृगी के पुराने रोगी , जो किसी दूसरी दवा से ठीक नहीं हुए हो , वे इस औषधि बिलकुल ठीक हो जाते हैं । इसमें मृगी का दौरा पड़ने से पहले रोगी के हृदय में ऑरा उठता हैं । ऑरा एक प्रकार का संवेदन हैं, जो मृगी का रोगी महसूस करता हैं । उसे लगता हैं कि मृगी का दौर पड़ते समय उसके हृदय से वायु की एक लहर उठ रही है । इस लहर के उठने के बाद दौर पड़ जाता हैं ।  

रोगी जिस तरफ लेटता हैं, सिर दर्द दूसरी तरफ चला जाता हैं - इस औषधि का यह एक विलक्षण लक्षण हैं, कि सिर दर्द में रोगी जिस तरफ लेटता हैं , दर्द उसके दूसरी तरफ चला जाता हैं । इसमें  कैलकेरिया आर्सेनिका लाभप्रद होती हैं।

कैलकेरिया आर्सेनिका की शक्ति तथा प्रकृति - यह 6 , 30, 200 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । यह शीत प्रधान औषधि हैं ।


रविवार, 21 मार्च 2021

बोरेक्स ( BORAX ) औषधि के व्यापक लक्षण , मुख्य रोग व फायदें

बोरेक्स ( BORAX ) औषधि के व्यापक लक्षण , मुख्य रोग व फायदों का वर्णन -

  • ऊपर से नीचे की ओर गति से भय  
  • बच्चे का सोते हुए अचानक चौंक जाना 
  • बालों का उलझ कर चिपक जाना 
  • पलकों के बाल अन्दर की ओर मुड़ जाना 
  • युवा स्त्रियों की नाक की चमकदार लालिमा 
  • मुंह का आना 
  • बच्चे का पेशाब से पहले चीख उठना 
  • श्वेत प्रदर का गर्म पानी की तरह होना 
  • श्लैष्मिक झिल्ली के कारण मासिक धर्म का कष्ट 
  • बाँझपन

बोरेक्स की प्रकृति - दोपहर के 11 बजे तथा शाम को ठंड में रोग के लक्षणों में कमी आती हैं, और दबाने से आराम होता हैं। जबकि नीचे की ओर गति से भय लगने से, अचानक चौंकने से, शीत या नमी से तथा मासिक धर्म के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं। 

ऊपर से नीचे की ओर गति से भय - बोरेक्स विशेषकर बच्चों की औषधि हैं । जब कोई शिशु को गोद से पालने में डालने के लिए झुकता हैं , तो नीचे की गति के कारण वह भय से जाग जाता हैं, शिशु माता को दोनो हाथों से पकड़ लेता हैं और चिल्लाता हैं । झूले से , सीढ़ियों व पहाड़ से नीचे उतरने में जो डर होता हैं, वह इस औषधि का मुख्य लक्षण हैं । यदि इस लक्षण साथ बच्चे में अतिसार का रोग, वयस्कों में गठिया रोग तथा स्त्रियों में मासिक धर्म का कष्ट आदि रोगों में यह औषधि रामबाण हैं । 

बच्चे का सोते हुए अचानक चौंक जाना - बच्चा बहुत अधिक स्नायविक होता हैं , किसी भी प्रकार की थोड़ी सी आवाज में ही चौंक जाता हैं । ज्यादातर ऐसा बच्चे के सोते समय होता हैं, और पलंग को जकड़कर पकड़ लेता हैं । सामान्यता ये लक्षण सभी बच्चों में पाए जाते हैं, परन्तु ये लक्षण अधिक मात्रा में हो , तो बोरेक्स देने से आराम मिलता हैं ।

बालों का उलझ कर चिपक जाना - बालों का उलझ कर चिपक जाना इसका एक विशेष लक्षण हैं । बाल जटाए बन जाती हैं , कंधी करना मुश्किल होता हैं, बाल एक दूसरे में उलझे रहते हैं । इन बालों काट देने के बाद, जब नये बाल उगते हैं, वे भी इसी प्रकार उलझे रहते हैं । 

पलकों के बाल अन्दर की ओर मुड़ जाना - जिस तरह सिर के बाल उलझे रहते हैं , वैसे आंख की पलकों के बाल भी उलझ कर अन्दर की ओर मुड़ जाते हैं, जिसे ' परवाल ' कहा जाता है । परवाल की उत्तम औषधि बोरेक्स हैं । 

युवा स्त्रियों की नाक की चमकदार लालिमा - अगर युवा स्त्रियों की नाक का आगे का भाग चमकदार व लालिमा युक्त हो , तो स्त्रियों के अन्य रोगों को बोरेक्स दूर करने के लिये एक विशेष औषधि हैं । 

मुंह का आना - मुंह आ जाने पर घरेलू दवाई के तौर  सुहागे का प्रयोग करते हैं । बच्चों के मुंह आ जाने पर यह उत्तम औषधि हैं । मुंह के अन्दर , होठों में , जीभ में , गाल के भीतरी भाग में छाले हो जाते हैं । ये छाले गले के भीतर , पेट में , यहां तक कि मलद्वार तक पहुँच जाते हैं । इन सब मे बोरेक्स लाभप्रद दवा हैं । मुंह के छाले मर्क्यूरियस मे भी होते है , परन्तु इसके छालों में लार बहुत बहती हैं । ब्रायोनिया में भी मुँह में छाले रहते हैं , परन्तु  वे खुश्की कारण होते हैं ।  

बच्चे का पेशाब से पहले चीख उठना - बच्चों का जब मुंह आ जाता हैं , भीतर के अंगों में छाले पड़ जाते हैं , तब श्लैष्मिक झिल्ली की इस शोथ में पेशाब में भी जलन होने लगती हैं । जब बच्चे को पेशाब आता हैं , तब बच्चा चीख उठता हैं । और उसकी माता को पता चल जाता हैं, कि वह पेशाब के लिए चीख रहा हैं । इस लक्षण में बोरेक्स पेशाब की जलन को दूर कर देती हैं । 

श्वेत प्रदर का गर्म पानी की तरह होना - बोरक्स श्वेत प्रदर की अति उत्तम औषधि हैं । प्रदर अंडे की सफेदी की तरह का गाढा होता हैं । रोगिणी को यह प्रदर बहते हुए गर्म पानी की धार की तरह लगता हैं । 

श्लैष्मिक झिल्ली के कारण मासिक धर्म का कष्ट - मासिक धर्म में श्लैष्मिक झिल्ली के कुछ टुकड़े निकलते हैं । यह झिल्ली रुधिर के प्रवाह को रोकती हैं, इसलिये इसे बाहर धकेलने के लिए भीतर के अंगों में प्रसव पीड़ा के समान दर्द उठता है ,  जैसे की जरायु बाहर निकल जाएगा । जब तक श्लैष्मिक झिल्ली के ये टुकडे बाहर नहीं निकल जाते तब तक यह दर्द बना रहता हैं । ऐसे रोगी ऊपर से नीचे की गति से घबराती हैं । ऐसे में बोरेक्स उचित औषधि हैं । 

बांझपन - श्लैष्मिक झिल्ली के कारण ज्यादातर बांझपन होता हैं । बोरेक्स श्लैष्मिक झिल्ली के इस कष्ट को दूर कर गर्भ धारण करने में मदद करती हैं ।  

बोरेक्स औषधि के अन्य लक्षण- 

>> 11 बजे तक घबराहट - इस औषधि का एक विचित्र लक्षण यह हैं, कि दोपहर 11 बजे तक घबराहट रहती हैं , और बाद में घबराहट समाप्त हो जाती हैं । 

>> मुंह पर मकड़ी का जाला महसूस करना हैं इसका विलक्षण हैं , और रोगी उसे बार - बार हटाने के लिए चेहरे पर हाथ फेरता रहता हैं । 

>> नीचे की गति से चक्कर - रोगी जब नीचे जाने की गति में होता हैं- झुकने, लिफ्ट से नीचे जाने और सीढ़ियों से उतरने से रोगी को चक्कर आ जाता हैं । 

>> मानसिक कार्य से घबराहट - रोगी जब किसी भी प्रकार का मानसिक कार्य करता हैं, तो कुछ देर बाद जी घबराने लगता हैं । रोगी कुछ देर लेट कर आराम करता हैं, तो उसकी तबीयत ठीक हो जाती हैं । इसके बाद वह फिर मानसिक कार्य करने लग जाता हैं, और फिर जी घबराने लगता है । अगर इस लक्षण के साथ बोरेक्स के अन्य लक्षण मिले तो यह औषधि लाभप्रद हैं । 

बोरेक्स की शक्ति तथा प्रकृति - यह औषधि 1 , 3, 30 व 200 की शक्ति में उपलब्ध हैं ।  यह  शीत प्रकृति की औषधि हैं।


बरबेरिस वलगैरिस ( BERBERIS VULGARIS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग फायदें

बरबेरिस वलगैरिस ( BERBERIS VULGARIS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग फायदों का विश्लेषण -

  • दर्द का केन्द्र स्थल से चारो तरफ फैलना 
  • गुर्दे का दर्द  
  • पित्त पथरी का दर्द  
  • गठिये का चलता - फिरता दर्द 
  • कमर का दर्द

बरबेरिस वलगैरिस की प्रकृति - पेशाब करते समय , थकावट से , हरकत से रोग का बढ़ना बैठ कर उठने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

दर्द का केन्द्र स्थल से चारो तरफ फैलना - यह इस दवा का मुख्य लक्षण हैं । गठिया का दर्द, पथरी का दर्द, गुर्दे का दर्द, यह दर्द विशेषकर बांये गुर्दे से होकर मूत्राशय व मूत्रनली तक फैल जाता हैं । गठिये मे किसी एक जोड़ में दर्द होगा परन्तु वह उसके चारों तरफ फैल रहा होगा । बरबेरिस वलगैरिस पथरी तथा गठिये की दवा इस लक्षण पर हैं, क्योंकि पथरी में गुर्दे से दर्द चारों तरफ फैल जाता हैं ।  

गुर्दे का दर्द  - गुर्दे में छोटी - छोटी पथरिया बन जाती हैं, और उनमे से कोई छोटी पथरी , गुर्दे से मूत्र प्रणालिका से होती हुई , मूत्राशय तक पहुँच जाती हैं । पथरी इस प्रणालिका से गुजरती हुई, बहुत दर्द करती हैं । उस समय गुर्दे से दर्द होकर चारों तरफ फैल जाता हैं । यह दर्द एक ओर गुर्दे की तरफ और दूसरी तरफ मूत्राशय , मूत्रनली की ओर जाता हैं और अण्डकोश तक पहुँच जाता हैं । ऐसी अवस्था में बरबेरिस वलगैरिस पथरी को निकाल कर दर्द को शांत कर देती हैं । इस दर्द का लक्षण हैं- पथरी के केन्द्र स्थल से उठकर दर्द का चारों तरफ फैल जाता हैं ।  

पित्त पथरी का दर्द - पित्त पथरी में भी बरबेरिस वलगैरिस इस प्रकार के दर्द का शांत कर देती हैं । यह दर्द भी पीठ में किसी एक स्थान को केन्द्र बना कर चारों तरफ फैल जाता हैं । 

गठिये का चलता - फिरता दर्द - गठिये के रोग में दर्द गुर्दे , लीवर और हृदय तक पहुँचा जाता हैं । जहां तक गुर्दे का संबंध हैं , गठिये की शिकायत में पेशाब कभी कम कभी ज्यादा आता हैं । यह पेशाब हल्का या भारी रंगदार हो सकता हैं । ऐसी अवस्था बैनजोइक ऐसिड औषधि में भी होती हैं । बरबेरिस वलगैरिस में शरीर के किसी भी हिस्से में काटने का दर्द हो सकता हैं , और यह दर्द स्थान बदलता रहता हैं । जब इसका रोगी बैठने लगता हैं, तब कमर में दर्द हो जाता हैं। कुछ देर बाद घुटने में दर्द हो जाता हैं , उसके बाद  कभी दर्द यहां - कभी वहां,  पूरे शरीर में दर्द घूमता रहता हैं । 

कमर का दर्द - कमर का दर्द बरबेरिस वलगैरिस औषधि की विशेषता है । बैठी हुई हालत से उठने पर उसे विशेष दर्द होता हैं । रोगी को ऐसा लगता है कि कमर अकड़ गई हैं और सुन्न हो गई हैं । 

बरबेरिस वलगैरिस औषधि के अन्य लक्षण 

>> सिर में सुन्नपन - यह इसका विलक्षण हैं, रोगी अनुभव करता हैं कि सिर बड़ा हो गया हैं । रोगी सिर पर ऐसे हाथ फेरता हैं, मानो सिर पर टोपी नहीं होते हुए भी टोपी उतार रहा हो । कई रोगी  सिर में सुन्नपन अनुभव होता हैं । सुन्नपन या सिर से टोपी उतारना ये दोनों बरबेरिस वलगैरिस के लक्षण हैं । 

>> फिस्टुला के ऑपरेशन के बाद रोग होना - कभी - कभी फिस्टुला के ऑपरेशन के बाद गुर्दे , लीवर या हृदय के रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं । अगर इस समय चलते - फिरते दर्द उत्पन्न हो, तो रोग किसी भी अंग का हो बरबेरिस वलगैरिस से ठीक हो जाता हैं । 

>> आंख का दर्द का विभिन्न दिशाओं में जाना - कभी - कभी आंख पर भी गठिये का दर्द हो जाता हैं । और दर्द भिन्न - भिन्न दिशाओं में जाता हैं । 

बरबेरिस वलगैरिस की शक्ति - बरबेरिस वलगैरिस मूल अर्क , 3 , 6 , 30 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं ।


शुक्रवार, 19 मार्च 2021

बेनजोइक ऐसिड ( BENZOIC ACID ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, तथा फायदें

बेनजोइक ऐसिड ( BENZOIC ACID ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, तथा फायदों का विस्तार पूर्वक विश्लेषण

  • मूत्र में घोड़े के पेशाब की गंध 
  • गठिया या वात रोग 
  • बच्चों का सोते हुए पेशाब कर देना 
  • प्रगाढ निद्रा तथा उन्निद्रता का एक - दूसरे के बाद आना 
  • गठिया रोग का स्थानान्तरण 
  • सफेद रंग का मल

बेनजोइक ऐसिड की प्रकृति - गर्मी से, अधिक मात्रा में मूत्र आने से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि सर्दी , खुली हवा से , बदलते मौसम से रोग लक्षणों में वृद्धि होती हैं। 

मूत्र में घोड़े के पेशाब की गंध - बेनजोइक ऐसिड के रोगी का पेशाब इतना बदबूदार होता है कि पेशाब करते समय तो बदबू आती ही हैं , परन्तु उसके बाद भी बहुत देर तक बनी रहती हैं । पेशाब में इस प्रकार की उग्र अमोनिया सदृश गंध , गठिया , ज्वर के साथ टांसिल , शोथ , पतले दस्त , सिर दर्द तथा अन्य अनेक शिकायतें बेनजोइक ऐसिड से ठीक हो जाती हैं । नाइट्रिक ऐसिड तथा सीपिया में भी ऐसी बदबू होती है ।  

गठिया या वात रोग - गठिये का रोग, जोडो में दर्द, अर्थात ' वात प्रकृति '  इस औषधि में पायी जाती हैं । जब पेशाब खुल कर आता हैं, तब गठिये का दर्द कम हो जाता हैं । और जब पेशाब कम आता हैं, तब दर्द बढ़ जाता हैं । रोगी में इन दोनों दशाओं के लक्षण होते रहते हैं । यह दर्द जोड़ों में , पीठ में, कहीं पर भी हो सकता हैं । जब पेशाब अधिक से यूरिक एसिड निकल जाता हैं, तो दर्द कम हो जाता हैं। जब यूरिक एसिड शरीर में जमा हो जाता हैं , तब दर्द बढ़ जाता हैं । इन लक्षणों यह रामबाण औषधि हैं ।

बच्चों का सोते हुए पेशाब कर देना - इस औषधि से बच्चा रात को बिस्तर गीला करना बंद कर देता हैं । बच्चे का पेशाब अत्यंत बदबूदार होता हैं,  यह बदबू इस बच्चे में रहने लगती हैं । 

प्रगाढ़ निद्रा तथा उन्निद्रता का एक - दूसरे के बाद आना - प्रगाढ़ निद्रा तथा उन्निद्रता का पर्याय क्रम से आना इस औषधि का एक विशेष लक्षण हैं । रोगी कई दिन तक प्रगाढ़ निद्रा में सोता हैं , और बाद में उन्निद्रता रोग से पीड़ित हो जाता हैं । इस मानसिक स्थिति में मूत्र का विशेष संबंध होता हैं । अत: इस औषधि के रोगों का केन्द्र मूत्र प्रणाली तथा गुर्दे से हैं । मूत्र में यूरिक एसिड को कम कर देने से इस औषधि का गठिया रोग पर विशेष प्रभाव पड़ता हैं । 

गठिया रोग का स्थानान्तरण - गठिया गरीर के भिन्न - भिन्न अंगों में स्थान बदलता रहता हैं । जब हाथ - पैर में गठिये का दर्द ठीक हो जाता हैं , तो उसकी जगह हृदय या किसी ओर अंग में यह दर्द होने लगता हैं ।  तब बेनजोइक ऐसिड देना उचित होगा । 

सफेद रंग का मल - सफेद रंग का मल इस औषधि का विशिष्ट लक्षण हैं । अगर गठिये का रोग न हो , परन्तु मल का रंग सफेद हो तो किसी भी रोग में बेनजोइक ऐसिड से लाभ होता हैं । 

बेनजोइक ऐसिड की शक्ति तथा प्रकृति - यह 3 , 6 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । यह शीत प्रकृति की औषधि हैं। 


बेल्लिस पेरैन्निस ( BELLIS PERENNIS ) औषधि के लक्षण, रोग व फायदें

बेल्लिस पेरैन्निस ( BELLIS PERENNIS ) औषधि के लक्षण, रोग व फायदों का वर्णन -

  • गरम - सर्द हो जाना
  • आर्निका की तरह कुचले जाने की अनुभूति
  • वेरीकोज वेन्ज

गरम - सर्द हो जाना -  बेल्लिस पेरैन्निस का सबसे बड़ा चरित्रगत लक्षण हैं - गर्म परिस्थिति में ठंड लग जाना । जो लोग कड़ी मेहनत करने वाले होते हैं , जो खेतो में काम करते हैं , वे काम करते हुए तप जाते हैं , इस हालत में वे ठंडा पानी पी लेते हैं या ठंडे पानी से स्नान कर लेते हैं । इस प्रकार पेट दर्द , दस्त आदि शिकायतें हो जाती हैं, तो  बेल्लिस पेरैन्निस महान औषधि हैं । गर्म पेट या गर्म त्वचा को एकदम ठंडे पानी से कोई भी रोग हो सकता हैं । 

आर्निका की तरह कुचले जाने की अनुभूति - इस औषधि में आर्निका की तरह मांसपेशियों के कुचले जाने का अनुभव होता हैं । यह अनुभव मांसपेशियों के अंदरूनी हिस्से में हो न की बाहरी हिस्से में ।  

वेरीकोज वेन्ज - गर्भावस्था के अन्तिम दिनों में वेरीकोज वेन्ज का शोथ हो जाया करता हैं । नितम्बों में असहिष्णुता हो जाती हैं, और चलना - फिरना कठिन हो जाता हैं । इस औषधि से असहिष्णुता दूर हो जाती हैं, और चलना - फिरना आसान हो जाता है । 

बेल्लिस पेरैन्निस की शक्ति - यह मूल अर्क , 3x , 6 , 30 शक्ति में उपलब्ध हैं ।


बेलाडोना ( BELLADONNA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

बेलाडोना ( BELLADONNA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन-

  • शोथ तथा ज्वर में भयंकर गर्मी , लालिमा तथा तेज जलन  
  • रक्त संचय की अधिकता, सिर दर्द , प्रलाप तथा पागलपन 
  • दर्द का एकाएक आना और एकाएक चला जाना 
  • रोग का एकाएक आना तथा प्रचंडता
  • रोशनी , शोर व स्पर्श सहन न कर पाना 
  • मूत्राशय की उत्तेजित अवस्था  
  • जरायु से रक्तस्राव 
  • दाईं तरफ असरकारक औषधि  
  • दोपहर 3 बजे से रात तक रोग में वृद्धि

बेलाडोना की प्रकृति - शरीर को ढकने से, बिस्तर पर आराम करने से और गरम कमरे मे रहने से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि छूने से , गंध से , शब्द से, वायु के झोंके से,  हिलने - डुलने से , दिन के 3 बजे से रात तक, सूर्य की गर्मी से और बाल कटवाने से रोग लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

शोथ तथा ज्वर में भयंकर गर्मी , लालिमा तथा तेज जलन - बेलाडोना के शोथ में गर्मी , रक्तिमा तथा तेज जलन इसके विशिष्ट लक्षण हैं । इन्हें विस्तार से जानते हैं - 

>> भयंकर गर्मी - फेफड़े , मस्तिष्क , जिगर , आंत्र तथा किसी अन्य अंग के शोथ में भयंकर उत्ताप होता हैं । इसके रोगी की त्वचा को छुआ जाए तो वह एकदम अपने को हटा लेता हैं, क्योंकि त्वचा में भयंकर गर्मी होती हैं । इतनी भयंकर कि हाथ हटा लेने के बाद भी कुछ समय तक गर्मी बनी रहती हैं । रोगी के किसी भी अंग में भी शोथ क्यों न हो , उसे छूने से भयंकर उत्ताप का अनुभव होता हैं । 

>> टाइफॉयड़ के उत्ताप में बेलाडोना देना उचित नहीं - टाइफॉयड में अगर इस प्रकार की गर्मी हो , तो बेलाडोना कभी नहीं देना चाहिए । क्योंकि औषधि की गति तथा रोग की गति में समरसता होना आवश्यक हैं । बेलाडोना के लक्षण एकाएक व बड़े वेग से आते हैं और एकाएक चले भी जाते हैं । टाइफॉयड़  धीरे - धीरे आता हैं, और धीरे - धीरे ही जाता हैं । बेलाडोना की गति और टाइफॉयड़ की गति में समरसता नही होती , इसलिए इसमें बेलाडोना देने से रोग बढ़ सकता हैं ।  

>> लालिमा - बेलाडोना का दूसरा मुख्य लक्षण लालिमा हैं । शरीर के जिस अंग में शोथ हुआ हैं , वह बेहद लाल हो जाता हैं । लालिमा के बाद इसका रंग हल्का या कुछ काला पड़ सकता हैं । शरीर की गांठों में शोथ होगी तो वह भी लाल रंग की होगी, गला पकेगा तो लाल रंग जैसा होगा । 

>> बेहद जलन - बेलाडोना का तीसरा मुख्य लक्षण बेहद जलन हैं । शोथ में , ज्वर , रक्त संचय तथा टॉन्सिल में बेहद जलन होती हैं । इतना ही नही कि यह जलन हाथ से छूने से अनुभव की जाय , रोगी को अपने आप भी जलन महसूस होती है ।  

>> सूजन जिसमें गर्मी , लालिमा और जलन हो - यदि शरीर के किसी अंग में सूजन हो , और सूजन को छुआ न जाए अर्थात असहिष्णुता इस औषधि का चरित्रगत लक्षण हैं। ऐसा अनुभव हो कि सूजन का स्थान फूट पड़ेगा , और साथ ही उस स्थान में गर्मी , लालिमा और जलन हो , तो बेलाडोना उचित औषधि हैं । यदि सूजन पकने लगे तो बेलाडोना लाभ नहीं करती । 

>> आंख का दर्द जिसमें गर्मी , लालिमा और जलन हो - आँख में गर्मी , लालिमा और जलन जो बेलाडोना के लक्षण हैं बेलाडोना लाभप्रद होती हैं । आंख से पानी आना , रोशनी में आंख न खोल पाना , आँखों में गर्मी , लालिमा और जलन हो तो उसे बेलाडोना ठीक कर देती हैं । 

>> बवासीर जिसमें गर्मी , लालिमा और जलन हो - ऐसी बवासीर जिसमें तेज दर्द हो , मस्से बेहद लाल हो , सूज गए हो , छू ना सके , जलन हो और रोगी टांगें पसार कर ही लेट पाए। ऐसी बवासीर में बेलाडोना उत्तम लाभ पहुँचाती हैं । 

>> गठिया जिसमे गर्मी , लालिमा और जलन हो -  गठिए के रोग में जब सभी जोड़ सूज जाते हैं, तब इन जोड़ों में गर्मी , लालिमा और जलन होती हैं ।  इसके साथ रोगी ' असहिष्णु ' होता है और जोड़ों को छूने नही देता । जरा - सा छू देने से दर्द होता हैं । वह बिस्तर पर बिना हिले - जुले पड़ा रहना पसंद करता हैं । जोड़ों में दर्द के साथ तेज बुखार में वह शांत पड़ा रहना चाहता हैं । बेलाडोना का रोगी सर्दी को बर्दाश्त नहीं कर पाता , कपड़े से लिपटा रहता हैं , हवा के झोंके से तकलीफ होती हैं और गर्मी से उसे राहत मिलती हैं । 

रक्त संचय की अधिकता, सिर दर्द , प्रलाप तथा पागलपन - अभी हमने गर्मी , लालिमा तथा जलन का उल्लेख किया हैं । इसका कारण रक्त का किसी जगह पर संचय हो जाना हैं ।  रक्त के किसी अंग में संचित हो जाने पर बेलाडोना सभी औषधियों मे उत्तम हैं । यह रक्त संचय सिर , छाती , जरायु , जोड़ों में या त्वचा पर कहीं भी हो सकता हैं । इस प्रकार के रक्त संचय का विशेष लक्षण यह हैं कि यह बड़े वेग से और एकाएक आता हैं । बेलाडोना के रोग वेग से आते हैं और एकदम चले जाते हैं। इन्हीं लक्षणों के कारण यह हाई ब्लड प्रेशर की भी उत्कृष्ट दवा हैं। 

>> रक्त संचय से सिर दर्द - जब रक्त का वेग सिर की तरफ चलता हैं, तो सिर दर्द होने लगता हैं। बेलाडोना में भयंकर सिर दर्द होता हैं, जिसे रोगी बर्दाश्त नहीं कर सकता, स्पर्श को सहन नहीं कर सकता, रोशनी और हवा को भी सहन नहीं कर पाता । सिर को हिलाने से सिर दर्द बढ़ जाता हैं। यह सिर दर्द सिर में रक्त संचय के कारण होता हैं। ऐसा सिर दर्द तेज ज्वर में हुआ करता हैं। रोगी अनुभव करता हैं कि रक्त सिर की तरफ दौड़ रहा हैं। बेलाडोना के सिर दर्द में सिर गरम होता हैं और हाथ - पैर ठंडे होते है , आंखें लाल , कनपटियों में टपकन होती हैं। लेटने से सिर दर्द बढ़ता है , रोगी पगड़ी से या किसी चीज़ से सिर को बांधे रखता हैं , तब उसे थोड़ा आराम मिलता हैं। 

>> रक्त के सिर की तरफ दौर से प्रलाप - बेलाडोना में रक्त का सिर की तरफ दौर इतना जबरदस्त होता हैं कि रोगी की प्रबल प्रलाप तथा बेहोशी की अवस्था हो जाती हैं । यदि उसे नींद आ रही हो, तब भी वह सो नहीं पाता । रोगी सिर को तकिये पर इधर - उधर पटकता हैं । कभी - कभी वह प्रगाढ़ निंद्रा में पहुंच जाता हैं, जिससे उसे घबराहट भरे स्वप्न आते हैं । इस दौरान वह प्रलाप भी करने लगता हैं। उसे भूत प्रेत , राक्षस , काले कुत्ते , सांप व भिन्न - भिन्न प्रकार के कीड़े - मकोड़े दिखाई देते हैं । यह सब रक्त का सिर की तरफ दौर होने के कारण होता हैं । 

>> पागलपन - जब रक्त का सिर की तरफ दौर बहुत अधिक होता हैं , तब बेलाडोना में पागलपन की अवस्था आ जाती हैं । वह अपना भोजन मंगवाता है , परन्तु खाने के बजाय चम्मच और प्लेट को चबाता हैं , कुत्ते की तरह नाक चढ़ाता हैं और भौंकता हैं । रोगी अपना गला घोटने का प्रयत्न भी करता हैं , और दूसरों को कहता है कि वे उसे मार दे । हाय - हाय करना इस औषधि की विशेषता है । ठीक हालत में हो या न हो , वह हाय - हाय करता हैं । अधिक बोलता है, बोल - चाल  और काम करने में बहुत तेजी आ जाती हैं । बिना अर्थ के कुछ भी जल्दी - जल्दी बड़बड़ाता रहता हैं । उसे ऐसे काल्पनिक भयंकर दृश्य दिखाई देते हैं जिनसे जान बचाने के लिए भागता है या छिप जाता हैं । उसका पागलपन उत्कृष्ट उन्माद पर होता हैं, जिसमे वह तोड़फोड़ , मारपीट, दूसरो पर थूकता है और गाली - गलौज करता हैं । होम्योपैथिक में पागलपन की तीन दवाओं पर विशेष बल दिया है जैसे- बेलाडोना , हायोसाइमस तथा स्ट्रेमोनियम ।  

दर्द का एकाएक आना और एकाएक चला जाना - लक्षणों का एकाएक आना और एकाएक चले जाना बेलाडोना का चरित्रगत लक्षण हैं । यह लक्षण तब स्पष्ट होता हैं, जब कोई भी दर्द एकदम आए और एकदम ही चला जाए , तो वह बेलाडोना से ठीक हो जाता हैं ।  कभी - कभी यह दर्द कुछ मिनट रहकर ही चला जाता हैं । 

रोग का एकाएक आना तथा प्रचंडता - हमें यह याद हैं कि बेलाडोना में रोग बडे वेग और प्रचंड रूप में आता हैं । ' प्रचंडता ' और ' एकाएक ' इस औषधि के मूल लक्षण हैं । जैसे - किसी प्रकार का दर्द हो , प्रचंड सिर दर्द , धमनियों का प्रचट - स्पन्दन , प्रचंड डिलीरियम , प्रचंड पागलपन , प्रचंड ऐंठन । 

रोशनी , शोर व स्पर्श सहन न कर पाना - इसके रोगी की पांचों इंद्रियों में अत्यंत अनुभूति उत्पन्न होती है । रोगी आँखो से रोशनी , कानो से शब्द , जीभ से स्वाद , नाक से गंध , त्वचा से स्पर्श की अनुभूति साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक होने लगती हैं ।  रोगी रोशनी , शब्द , गंध , स्पर्श आदि को सहन नहीं कर पाता । उसका स्नायु मंडल उत्तेजित रहता हैं । स्नायु मंडल की उत्तेजना बेलाडोना का मुख्य लक्षण हैं ।  बेलाडोना के रोगी के मस्तिष्क में जितना रुधिर संचित रहता हैं, उतनी असहिष्णुता बढ़ जाती हैं । स्पर्श की असहिष्णुता उसमे इतनी होती हैं कि सिर के बालों में कंघी तक नहीं कर सकता । 

मूत्राशय की उत्तेजित अवस्था - बेलाडोना मूत्राशय तथा मूत्र नली की उत्तेजित अवस्था को शान्त करने वाली सबसे उत्तम औषधि हैं । पेशाब करने की इच्छा लगातार बनी रहती है । पेशाब बूंद - बूंद कर निकलता हैं, पूरी मूत्र प्रणाली उत्तेजित अवस्था में रहती हैं। मूत्राशय में रक्त संचय और उसकी उत्तेजित अवस्था होने से उस स्थान को छुआ तक नहीं जा सकता । मानसिक अवस्था भी चिड़चिड़ी हो जाती हैं । मूत्राशय में मरोड़ होती हैं और मूत्र में रक्त तक आ जाता हैं । मूत्राशय में थोड़ा सा भी मूत्र इकट्ठा होता हैं, तो पेशाब जाने की इच्छा होती हैं ,  दर्द होता हैं लेकिन मूत्र नहीं निकलता । 

जरायु से रक्तस्राव व असहिष्णुता - बेलाडोना में ' असहिष्णुता ' का लक्षण होता हैं , किसी भी अंग को छूने पर दर्द होता हैं । जरायु में असहिष्णुता हो जाती हैं, और उसमें से थक्कों के साथ चमकता हुआ रक्त निकलता हैं ।  बेलाडोना का जरायु में रक्तस्राव का यह मुख्य लक्षण हैं । जरायु रक्त के थक्कों से अट जाता है , और इस अटकाव को दूर करने के लिए जरायु में से इस प्रकार की संकोचन की लहर उठती है जिस प्रकार प्रजनन के समय होती हैं, तब रक्तस्राव हो जाता हैं । जरायु असहिष्णु व नाजुक हो जाता है, इसलिये वह अंदर एकत्रित रक्त के थक्कों के स्पर्श को बर्दाश्त नहीं कर पाता । यदि गर्भपात में इस प्रकार के लक्षण उपस्थित हो , या किसी भी समय इस प्रकार के लक्षण उत्पन्न हो , तो बेलाडोना इस प्रकार के रक्तस्राव को रोक देती हैं ।  

दाईं तरफ असरकारक औषधि - बेलाडोना अनेक दाई तरफ वाले रोगों में प्रभावशाली औषधि हैं । उदाहरणार्थ- स्त्री का दाया डिम्बकोश बायें की अपेक्षा ज्यादा दर्द करता हैं , गले का दाया हिस्सा या शरीर का दाया हिस्सा रोग से प्रभावित होता है तो यह दवा अति उत्तम हैं ।

दोपहर 3 बजे से रात तक रोग में वृद्धि - बेलाडोना का ज्वर दोपहर 3 बजे से प्रारंभ होता हैं और रात तक बढ़ जाता हैं । मध्य रात्रि में रोग चरम सीमा पर होता हैं । इसका तापमान 104-105 तक होकर सुबह तक सामान्य हो जाता हैं । 

बेलाडोना औषधि के अन्य लक्षण -

>> जरायु का योनि द्वार से निकल पड़ने का  अनुभव - स्त्री अनुभव करती है कि उसका जरायु  अग योनिद्वार से निकल पड़ेगा । बेलाडोना में लेटने से यह स्थिति बढ़ जाती हैं और खड़े होने पर आराम मिलता हैं ।  बेलाडोना का रोगी शीत प्रधान होता हैं। 

>> रात को सूखी खांसी का दौरा पड़ना - बेलाडोना की खांसी विलक्षण होती हैं। ज़ोर - जोर से लगातार खासने पर जब थोडा सा कफ निकलता हैं , तब रोगी को थोड़ी देर के लिए आराम मिल जाता हैं , परन्तु इस दौरान श्वास प्रणाली में खुश्की बढ़ती जाती है और खुजली शुरु हो जाती हैं , उसके बाद फिर से खांसी का दौर पड़ता हैं । गला रुधने लगता है, कभी - कभी उल्टी आ जाती है , तब जाकर थोड़ा कफ फिर से निकलता है , और अब फिर आराम मिल जाता हैं । इस प्रकार के खांसी के दौर पड़ते रहते हैं । बेलाडोना इस प्रकार की खाँसी में लाभप्रद होती हैं।

>> ऐंठन - ऐंठन बेलाडोना का चरित्रगत लक्षण हैं । बच्चो की ऐंठन में यह अति उपयोगी दवा हैं । शरीर के किसी भी अंग में ऐंठन हो सकती हैं । मस्तिष्क में रक्त संचय या उसके उत्तेजित होने पर ऐंठन होती है । हृष्ट - पुष्ट बच्चों को सर्दी लग कर भी ऐंठन हो जाती है । लेकिन ऐंठन का नाम सुनते ही बेलाडोना दे देना उचित भी नहीं है । क्यूप्रम भी ऐंठन के लिये प्रसिद्ध दवा हैं । क्यूप्रम में हाथ - पैरों का ऐंठन मुख्य हैं । बेलाडोना की ऐंठन में चेहरा और आंख लाल , सिर आग की तरह गरम , तेज बुखार और कनपटियों में टपकन होती हैं । रोगी शरीर को कभी आगे और कभी पीछे की ओर झुकाता हैं । 

>> पथरी में अंग संकोच - ऐंठन और अंग संकोच में बहुत अधिक अंतर नहीं हैं । अंग संकोच अंग का दौरा पड़ना है और ऐंठन एक अंग या पूरे शरीर में दौरा पड़ना हैं । कभी - कभी छोटा सा पथरी का टुकडा मूत्र प्रणाली से गुजरता हैं, तो  घर्षण पैदा करता हैं, जिससे मूत्र प्रणाली में ऐंठन या संकोच उत्पन्न हो जाता हैं । इस अंग संकोच से जो दर्द होता है उससे रोगी छटपटा जाता हैं । बेलाडोना इस संकोच को अर्थात पथरी का टुकड़ा  मूत्र प्रणाली से बाहर निकालने वाली एक मात्र दवा हैं । 

>> अपेंडिसाइटिस - पेट के दाहिनी ओर नीचे के भाग में जहां छोटी आंत और बड़ी आंत मिलती हैं उस स्थान मे अत्यन्त पीड़ा होना तथा कपड़े तक लग जाने से भी असह्य पीड़ा का अनुभव होना अपेंडिसाइटिस का लक्षण हैं । यदि इसके साथ बेलाडोना के अन्य लक्षण मिलते हो तो इससे फायदा होता हैं । 

>> फ्लुरिसी - फेफड़ों के आवरण के शोथ को प्लुरिसी कहते हैं । इसमें अत्यंत दर्द होता हैं । रोग की उत्पत्ति मुख्य तौर पर दायीं तरफ होती हैं । 

>> त्वचा पर दाने - त्वचा पर दानों के लिये बेलाडोना के अलावा भी अन्य औषधियां हैं । बेलाडोना के दाने उत्ताप , लाल व जलन पैदा करने वाले होते हैं । ये दाने चमकीले, उभरे हुए न होकर त्वचा के साथ मिले होते हैं । रोगी गर्मी पसन्द करता है , प्यास लगती है तो थोड़ा - थोड़ा करके बार बार पानी पीता हैं । 

>> ढके स्थान पर पसीना आना - बेलाडोना में शरीर का जो अंग ढका हुआ होता हैं, वहाँ पर पसीना आ जाता हैं।

बेलाडोना की शक्ति तथा प्रकृति - बेलाडोना अनेक रोग साधक औषधि हैं । इसका असर  अल्पकालिक होता हैं, अत: इसे दोहराया जा सकता हैं । बार - बार आने वाले रोगों में यह  उपयुक्त नहीं हैं ।  बेलाडोना  3, 6, 30, 200 शक्ति में दिया जाता हैं । यह शीत प्रकृति की औषधि हैं ।


बैराइटा कार्बोनिका ( BARYTA CARBONICA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

बैराइटा कार्बोनिका ( BARYTA CARBONICA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग फायदों का वर्णन -

  • शारीरिक तथा मानसिक विकास का अभाव  
  • ग्रंथियों का बढ़ जाना , टॉन्सिल में सूजन 
  • वृद्ध पुरुषों में बच्चों सा आचरण 
  • वृद्ध पुरुषों की खांसी 
  • शीत प्रधान रोगी 

बैराइटा कार्बोनिका की  प्रकृति -  गर्मी से व एकांत में रहने से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि  सर्दी से, रोग वाली करवट सोने से व स्नान से परहेज करने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

शारीरिक तथा मानसिक विकास का अभाव - यह  दीर्घकालिक तथा गंभीर क्रिया करनेवाली औषधि हैं । शरीर तथा मन की आन्तरिक तह तक प्रभाव डालती हैं । जब बच्चा कोई काम देर से सीखता हैं जैसे - देर से चलना , देर से पढ़ना लिखना , मानो की उसमें शारीरिक तथा मानसिक विकास अभाव हैं । लड़कियां 18-19 साल की हो जाने पर भी बच्चों सा व्यवहार करती हैं । विवाह हो जाने पर भी गृहस्थी के काम को समझ नहीं पाती । शारीरिक तथा मानसिक विकास की वह प्रक्रिया जो व्यक्ति को पुरुष अथवा स्त्री बनाती हैं , वह इन रोगियों में रुक जाती हैं ।  कभी कभी तो शरीर का एक अंग बढ़ता है और दूसरे नहीं । शारीरिक तथा मानसिक विकास के अभाव में बैराइटा कार्बोनिका उपयुक्त औषधि हैं।

ग्रंथियों का बढ़ जाना , टॉन्सिल में सूजन - इसके रोगी की ' ग्रंथियां '  बढ़ जाती हैं , सख्त हो जाती हैं , गले , जांघ और पेट में गिल्टियाँ पड़ जाती हैं । गलतिया बढ़ जाने और मांसपेशियों सूख जाने पर शरीर बौना हो जाता हैं। ऐसे रोगी को बैराइटा कार्बोनिका ठीक कर देती हैं ।  टांसिल पर इस औषधि का विशेष प्रभाव पड़ता हैं । जरा सी सर्दी लगने से ही टांसिल बढ़ जाती हैं । 

टांसिल में बैराइटा कार्बोनिका , बेलाडोना , हिपर तथा कैमोमिला की तुलनाबेलाडोना और हिपर मे टांसिल की उत्पत्ति एकाएक होती हैं । जिस रात सर्दी लगी उसी रात टांसिल सूज जाते हैं और पक भी जाता हैं । परन्तु बैराइटा कार्बोनिका में टांसिल उसी रात नहीं सूजता , उसे कुछ दिन लगते हैं और पकता भी  धीरे - धीरे हैं । कैमोमिला के टांसिल की सूजन से कान में दर्द होता हैं और गर्मी से आराम मिलता हैं व रोगी चिड़चिड़ा हो जाता हैं ।  

वृद्ध पुरुषों में बच्चों सा आचरण - इस औषधि मेम वृद्ध पुरुष बच्चों जैसा आचरण करते हैं । स्मरण शक्ति लुप्त हो जाती हैं , चलते हुए डगमने लगते हैं । बैराइटा कार्बोनिका के रोगी का सर्वांगीण विकास रुक जाता हैं - चाहे वह बच्चा, युवा या वृद्ध हो । जब सत्तर वर्ष का व्यक्ति बच्चे की तरह व्यवहार करने लगे हैं , तो समझ लेना चाहिये कि उसका शारीरिक विकास रुक गया है , तब उसे बैराइटा कार्बोनिका की जरूरत हैं।

वृद्ध पुरुषों की खांसी - बुढ़ापे में कई लोगों को ऐसी खांसी हो जाती हैं, जो उनका पीछा नहीं छोड़ती । छाती में घड़घड़ाहट होती हैं, तो बैराइटा कार्बोनिका लाभप्रद होती हैं। जब किसी 70-80 वर्ष के वृद्ध को हर समय छाती में खांसी की घड़घड़ाहट होती हो, जो गर्मी के दिनो मे ठीक रहे और सर्दी के दिनों में तकलीफ दे और कोई दूसरा लक्षण न हो तो ऐमोनियम कार्बोनिकम लाभप्रद होती हैं। 

शीत प्रधान रोगी - होम्योपैथिक में यह जानना बहुत आवश्यक होती हैं, कि रोगी शीत प्रधान है या ऊष्णता प्रधान । शीत प्रधान रोगी के लिये शीत प्रधान औषधि का निर्वाचन किया जाता है , ऊष्णता प्रधान रोगी के लिये ऊष्ण औषधि का । होम्योपैथिक में रोगी से बड़ी बारीकी से पूछा जाता हैं, कि तुम्हें ठंड पसन्द या गर्मी । तुम कमरे में आते ही खिड़की - दरवाजे खोलना चाहते हो या  बंद करना । यदि किसी रोग में दो औषधियों के सब लक्षण मिलते हो , परन्तु एक औषधि शीत प्रधान हो और दूसरी ऊष्णता प्रधान , तो औषधि का निर्वाचन शीत प्रधान रोगी के लिये शीत प्रधान और ऊष्णता प्रधान रोगी के लिये ऊष्णता प्रधान औषधि का निर्वाचन करना होता हैं ।  बैराइटा कार्बोनिका शीत प्रधान औषधि हैं । रोगी ठंड सहन नही कर सकता, शरीर को ढके रखना चाहता हैं । कमरे के खिड़की - दरवाजे बंद रखना चाहता हैं ।   

बैराइटा कार्बोनिका की शक्ति तथा प्रकृति - यह औषधि ३० , २०० की शक्ति में उपलब्ध हैं । यह शीत प्रधान औषधि हैं।


बैप्टीशिया ( BAPTISIA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

बैप्टीशिया ( BAPTISIA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन-

  • टाइफॉयड़ के लक्षण ( ज्वर व कमजोरी )  
  • शरीर में कुचले जाने सा दर्द अनुभव 
  • टाइफॉयड़ में बैप्टीशिया और जेलसीमियम की तुलना
  • रोगी अनुभव करता है कि अपने बिखरे हुए अंगों को बटोरना
  • ठोस पदार्थ निगलने से गले में दर्द

बैप्टीशिया की प्रकृति - नमी , गर्मी , बंद कमरे में व सोने के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि में वृद्धि होती हैं।

टाइफॉयड़ के लक्षण ( ज्वर व कमजोरी ) - यह टाइफॉयड़ की मुख्य औषधि मानी जाती है । रोग की प्रारंभिक अवस्था में घबराहट , सर्दी,  सिर दर्द, पीठ दर्द और हाथ - पैरों में दर्द  होता हैं । रोगी को ऐसा अनुभव होता है कि उसका पूरा शरीर टूट रहा हैं । ज्यो - ज्यो रोग व कमजोरी बढ़ती जाती हैं, रोगी ' तन्द्रा ' में पहुँच जाता हैं ।  अगर आप इस रोगी को जगा कर कुछ कहना चाहें , तो वह आप की ओर इस तरह देखता हैं, मानो शराब के नशे में हो और जवाब देते ही सो जाता हैं, पूरा जवाब देने से पहले ही सो जाता हैं।  ये सभी लक्षण इन्फ्लुएन्जा , स्कार्लेट फीवर किसी में भी हो बैप्टीशिया ठीक कर देती हैं । 

शरीर में कुचले जाने सा दर्द अनुभव - रोगी  जिस भी तरफ लेटता हैं , उसी तरफ कुचले जाने का सा दर्द अनुभव करता हैं । शरीर में कुचले जाने का लक्षण पाइरोजेन और आर्निका में भी होता हैं।  शरीर के कुचले जाने के लक्षण के साथ यदि रक्त के दूषित होने की अवस्था हो तो पाइरोजेन उपयुक्त दवा हैं । टाइफॉयड़ में रसटॉक्स के लक्षण भी पाये जाते हैं , बैप्टीशिया की तरह रोगी बिस्तर पर करवटें बदलता हैं। इसके अतिरिक्त बैप्टीशिया के रोगी का मल अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त होता हैं । बैप्टीशिया का डायरिया के लक्षण होते हैं, जो अत्यन्त दुर्गन्ध युक्त होता हैं । इन लक्षणों में बैप्टीशिया औषधि उपयुक्त मानी गई हैं।

टाइफॉयड़ में बैप्टीशिया और जेलसीमियम तुलना - टाइफॉयड़ की प्रारम्भिक अवस्था जेलसीमियम बहुत ही कारगर औषधि हैं । टाइफॉयड़ की प्रथम अवस्था में रोगी चुपचाप उंघाई में पड़ा रहता हैं , इस अवस्था में प्रचंड ज्वर नहीं होता और पतले दस्त नहीं होते । परन्तु प्रथमावस्था के बाद रोगी ' ऊंघाई ' से ' तन्द्रा ' में चला जाता हैं , तो ज्वर अधिक होने लगता हैं , पतले दस्त आने लगते हैं । तब बैप्टीशिया उपयुक्त औषधि हैं । वैसे टाइफॉयड़ की हर अवस्था में शुरु से अन्त तक बैप्टीशिया इसकी अवधि को कम कर देती हैं । 

रोगी अनुभव करता है कि अपने बिखरे हुए अंगों को बटोरना - रोगी बिस्तर में करवटें बदलता रहता हैं , और महसूस करता हैं कि उसका शरीर बिखरा पड़ा हैं , और वह उन्हें बटोर रहा हैं । यह भी इसका विशिष्ट लक्षण हैं । इन लक्षणों में बैप्टीशिया देने से रोगी ठीक हो जाता हैं।

ठोस पदार्थ निगलने से गले में दर्द - रोगी तरल पदार्थों को सरलता निगल लेता हैं , परन्तु ठोस पदार्थ को निगलने में तकलीफ होती हैं,  गले में दर्द होता हैं । इग्नेशिया में इसका विपरित होता हैं, ठोस आसानी से निगल लेता हैं और तरल में तकलीफ होती हैं । 

बैप्टीशिया की शक्ति तथा प्रकृति - बैप्टीशिया और जेलसीमियम दोनों अल्पकालिक औषधियाँ हैं । यह औषधि ' गर्म ' प्रकृति की हैं ।


शनिवार, 13 मार्च 2021

ऑरम मेटैलिकम ( Aurum Metallicum) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

ऑरम मेटैलिकम ( Aurum Metallicum) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें विस्तार से जानते हैं-

  • जीवन से निराशा व आत्महत्या करने की इच्छा 
  • जीवन निराशा  
  • आतशक, हड्डियों का क्षय तथा उनमें दर्द 
  • एक वस्तु के दो या वस्तु का नीचे का हिस्सा दिखना 
  • पोतो का सूकना व सख्त होना
  • शरीर की ग्रंथियों के शोथ में लाभ 
  • ब्लड प्रेशर में फायदेमंद

ऑरम मेटैलिकम की प्रकृति -  ठंडी व खुली हवा घूमने से, ठंडे पानी से नहाने से रोग लक्षणों में कमी कमी आती हैं। जबकि सूर्यास्त से सूर्योदय तक, गृह कलेश से व शीत ऋतु में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

जीवन से निराशा व आत्महत्या करने की इच्छा - मनुष्य में उसके आन्तरिक जीवन को प्रकट करने अंग मन व हृदय हैं । मन मानसिक जीवन को सूचित करता है व हृदय उसके हार्दिक जीवन को । मानसिक जीवन का अर्थ है- चिंतन आदि , तथा हार्दिक जीवन का अर्थ है - उसका जीवन के प्रति प्रेम भाव। कभी - कभी मनुष्य ऐसी परिस्थितियों में पहुँच जाता हैं। वह मानसिक शक्ति द्वारा यह जानता हैं, कि वह जो अनुभव कर रहा है वह ठीक नहीं है , जिससे उसके हार्दिक भाव इतने बिगड़ जाते हैं, कि वह जीवन के प्रति हताश - निराश हो जाता हैं। कभी-कभी वह निराशा में इस हद तक पहुँच जाता हैं, कि वह जीने की चाह छोड़ देता है, और कभी - कभी आत्महत्या करने की सोचने लगता है और कई रोगी आत्महत्या कर भी लेते हैं । उसकी मन स्थिति इतनी विक्षिप्त नही होती जितने उसके हार्दिक भाव । ऐसी हार्दिक अवस्था में जब उसकी जीवन के प्रति चाह खत्म हो जाती है, तब ऑरम मेटैलिकम हृदय के आत्मघात के विचार को एकदम बदल देती हैं । 

जीवन निराशा  - गृह कलेश, आर्थिक हानि व शोक आदि से मनुष्य ऐसी विकट स्थिति में पहुंच जाता है , जिससे वह जीने की चाहत छोड़ देता हैं, इसका कारण गृह कलेश, आर्थिक हानि व शोक हो सकता है , ऐसा कलह जिसमें मनुष्य इतना निराश हो जाए कि मरना पसन्द करे । वह सोचता है कि उसकी जो स्थिति हैं, उसमें जीवन भार है । छोटी - छोटी बात से वह चिढ़ने लगता हैं , तुरन्त गुस्से से भड़क जाता हैं । यही निराशा बढ़ती - बढ़ती पागलपन का रूप धारण कर लेती हैं । जब रोगी इस हालत में पहुंच जाता है कि वह किसी से बात तक नहीं करता । उसे इस मानसिक स्थिति से निकालने के लिए यह दवा उत्तम हैं, यह हृदय में संतुलन लाती हैं । 

ऑरम मेटैलिकम , नेजा , आर्सेनिक एल्बम , नक्स वोमिका , सिमिसिफ्यूगा , इग्नेशिया , लेकेसिस तथा एसिड फॉस में आत्महत्या के मामले में तुलना - आत्महत्या की इच्छा उक्त सभी औषधियों में होती हैं परन्तु इनमें भेद यह है कि ऑरम मेटैलिकम में यह इच्छा घरेलू कारणों,  आर्थिक हानि के कारण होती है । नेजा मे दिल की बीमारी के कारण होती है । आर्सेनिक एल्बम और नक्स वोमिका में मरने की इच्छा रहती है परन्तु रोगी मरने से डरता है। किसी के प्रेम से निराशा होने के कारण मरने की इच्छा हो तो सिमिसिफ्यूगा , इग्नेशिया , लेकेसिस , एसिड फॉस में पाया जाता हैं ।  

आतशक, हड्डियों का क्षय तथा उनमें दर्द - जिन लोगों को आतशक हो जाता हैं, एलोपैथी में इसका इलाज मर्करी से होता हैं । अन्य रोगों में भी मर्करी का उपयोग किया जाता हैं । इसका परिणाम यह होता है कि रोगी को आतशक की बीमारी के अलावा मर्करी जनित रोग भी हो जाता हैं । आतशक तथा मर्करी जनित रोग से भी रोगी हताश , निराश और उदास रहने लगता हैं । आतशक के रोग से तथा पारे के इलाज से उसे घुटने के नीचे की हड्डी ' टीबिया ' में शोथ या दर्द होता हैं । कान , नाक , तालु की हड्डियां भी सड़ने लगती हैं । आतशक से जिगर पर भी प्रभाव पड़ता हैं , हृदय पर आतशक जनित गठिये का असर होने लगता हैं । इन रोगों में जोड़ों में दर्द , गठिये का दर्द , जोड़ों की हड्डियों में शोथ , शरीर को ग्रन्थियों में शोथ आदि उत्पन्न हो जाते हैं, जिनको ऑरम मेटैलिकम ठीक कर देती हैं । 

एक वस्तु के दो या वस्तु का नीचे का हिस्सा दिखना - यह इस औषधि का विशिष्ट लक्षण हैं, कि एक वस्तु दो जगह दिखाई देती हैं । ऐसा कई औषधियों में होता हैं । परन्तु वस्तु का नीचे का हिस्सा दिखना और ऊपर का नही दिखना इसका विशिष्ट लक्षण हैं । इन लक्षणों में ऑरम मेटैलिकम लाभप्रद होती हैं।

पोतो का सूकना व सख्त होना - ऑरम मेटैलिकम औषधि का यह भी विशिष्ट लक्षण हैं, कि बच्चों के अंडकोष सूकते जाते हैं और बड़ो के फूल जाते हैं या सख्त हो जाते हैं । 

शरीर की ग्रंथियों के शोथ में लाभ - शरीर के भिन्न - भिन्न अंगों की ग्रंथिया जैसे गले में , बाजुओं की कोख में , पेट में , जांघों के जोड़ में , स्त्री के स्तनों में, अंडकोष तथा डिंबकोश । इस औषधि का इन ग्रंथियों पर कारगर प्रभाव होता हैं । इन ग्रंथियों के शोथ को ऑरम मेटैलिकम दूर कर देती हैं ।  ग्रंथियों के शोथ में उच्च शक्ति निम्न शक्ति की अपेक्षा अधिक कारगर होती हैं । 

उच्च रक्तचाप में फायदेमंद - रुधिर का एक स्थान पर संचय इस औषधि का विशेष लक्षण हैं । इसीलिए उच्च रक्तचाप में ऑरम मेटैलिकम 30 शक्ति की मात्रा रोग को ठीक कर देती है । उच्च रक्तचाप में बैराइटा 6x , ग्लोनॉयन और डिजिटेलिस भी अच्छी औषधियाँ हैं । 

ऑरम मेटैलिकम औषधि के अन्य लक्षण 

>> रात में रोग की वृद्धि - पारे के सभी रोगों की तरह इसमें तकलीफ शाम को शुरु होकर सारी रात रहती है । हड्डियों से दर्द अधिक रहता हैं मानो टूट जाएगी । हड्डी के परिवेष्टन में ऐसा दर्द होता है मानो कोई चाकू से छील रहा हो । जोड़ों में रात को दर्द होता है । रोगी दर्द से बिस्तर छोड़कर टहलने लगता हैं । जो रोगी हमेशा पारा लेता है , उसका जिगर बढ़ जाता है , जोड़ों में सूजन आ जाती हैं । ऐसे रोगी के लिये ऑरम मेटैलिकम लाभप्रद दवा हैं । 

>> रोगी खुली हवा पसंद करता हैं - ऑरम मेटैलिकम रोगी चिड़चिड़ा व क्रोधी होता हैं । जबकि वह खुली हवा पसन्द करता हैं, परन्तु सिर दर्द में सिर को लपेट कर रखता हैं । दमे में भी ऑरम मेटैलिकम का रोगी खुली हवा चाहता है , गर्मी से दमे में वृद्धि होती हैं । ठंडे पानी से स्नान करने से बहुत से लक्षण कम हो जाते हैं । जब ऑरम मेटैलिकम का रोगी उत्तेजना से परेशान हो , उसकी धमनिया स्पन्दन कर रही हो , तब वह दरवाजे और खिड़कियां खुलवाना चाहता हैं , शरीर का कपड़े उतार फेंकता हैं , जबकि अन्य समय पर वह कपड़े में लिपटा रहता हैं । 

ऑरम मेटैलिकम की शक्ति तथा प्रकृति - यह औषधि 6 , 30 , 200 शक्ति में उपलब्ध हैं । यह औषधि ' गर्म ' प्रकृति की हैं, परन्तु कई वातो में ' सर्द ' प्रकृति की हैं ।


बुधवार, 10 मार्च 2021

ऐसाफैटिड़ा औषधि ( ASAFOETIDA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

ऐसाफैटिड़ा औषधि ( ASAFOETIDA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक विवरण-

  • फूला हुआ, स्थूल , ढीला - ढाला , लाल - नीला चेहरा 
  • हिस्टीरिया में पेट से गले की ओर गोलक का चढ़ना 
  • पेट में ऊर्ध्वगामी वायु व बड़ी - बड़ी डकारे आना 
  • रात को हड्डियों में दर्द 
  • रोग का बायीं तरफ से प्रारंभ होना

ऐसाफैटिड़ा की प्रकृति - खुली हवा मे घूमने से रोगी को आराम व रोग के  लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि रात में, बन्द कमरे में, स्राव के रुक जाने पर, गर्म कपड़ा लपेटने पर, बायीं ओर लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

फूला हुआ, स्थूल , ढीला - ढाला , लाल - नीला चेहरा - मानव शरीर में दो प्रकार की रक्तवाहिनीयाँ होती हैं - ' धमनियाँ ' व ' शिराए ' । धमनियों में हृदय से शुद्ध रक्त शरीर में जाता है , और शिराओं से अशुद्ध रक्त फेफड़ों द्वारा शुद्ध होने के लिये हृदय में लौटता हैं । शिराए काम करना बंद कर दे , तो नीला खून शरीर में जगह - जगह रुक जाता हैं, जिससे चेहरा फूला हुआ , ढीला - ढाला और रक्त नीलिमायुक्त हो जाता हैं । ऐसे रोगी देखने में मोटा ताज़ा लगता हैं , परन्तु शिराओं की शिथिलता के कारण उसका चेहरा फूला हुआ होता हैं । ऐसे रोगी के हृदय में कुछ विकार होता है, जिसके कारण उसके शरीर में ' शिरा रूधिर स्थिति ' पाई जाती हैं । ऐसे रोगियों का इलाज कठिन होता हैं , ये ' शिरा प्रधान शरीर ' के रोगी होते हैं और इन्हें कई प्रकार के स्नायवीय रोग होते हैं, जिनमें ऐसाफैटिडा लाभदायक हैं ।  

हिस्टीरिया में पेट से गले की ओर गोलक का चढ़ना - यह इस औषधि का प्रधान लक्षण हैं । इसे नीचे उतारने के लिये रोगी बार - बार अंदर निगलने की कोशिश करता हैं , परन्तु उसे ऐसा लगता है कि यह गोलक पेट से ऊपर चढ़ता चला जाएगा । इसका कारण यह है कि वायु की गति अधोगामिनी होने की बजाय में अर्ध्वगामिनी हो जाती हैं । आंतों में एक विशेष प्रकार की गति होती है जिससे भोजन या मल आगे बढ़ता हैं । इसे ' अग्र गति ' कहते हैं । इस औषधि के रोगी में ' प्रतिगामी अग्र गति ' होती हैं, जिसके कारण वायु आगे की तरफ जाने के बजाय पीछे की तरफ जाती हैं, और इसे ही हिस्टीरिया रोग कहते हैं। जिसमें रोगी को एक गोलक का पेट से गले की तरफ चढ़ने जैसा कष्ट अनुभव होता हैं। 

पेट में ऊर्ध्वगामी वायु व बड़ी - बड़ी डकारे आना - ऐसाफैटिड़ा में वायु का निकास नीचे से बिल्कुल बन्द हो जाता हैं। रोगी ' प्रतिगामी अग्र गति ' से पीड़ित हो जाता हैं । पेट से इतनी हवा ऊपर से डकार के रूप में निकलती हैं, जिस पर रोगी का कोई बस नहीं होता । ऐसाफैटिड़ा बहुत ही कारगर औषधि हैं।

रात को हड्डियों में दर्द - आतशकी के रोगियों की तकलीफे रात को बढ़ जाती हैं । रात को हड्डियों में दर्द होता हैं । इस दवा में आतशकी मिजाज़ होने के कारण हड्डियों में और हड्डियों के परिवेष्टन में रात को दर्द होता हैं । यह दर्द हड्डी के अन्दर से बाहर की ओर आता हैं । सिर दर्द या किसी भी अंग की हड्डी के भीतर उठने वाला दर्द इस औषधि का लक्षण हैं । 

रोग का बायीं तरफ से प्रारंभ होना - इस औषधि में पेट , हड्डी , या शरीर के किसी अंग पर प्रभाव हो सकता हैं, परन्तु शुरूआत शरीर के बायें भाग होता हैं । होम्योपैथिक में बायीं ओर से शुरू होने वाले रोगों में बहुत दवाइयाँ  होती हैं । लेकिन ऐसाफैटिड़ा अपना विशेष स्थान रखती हैं।

ऐसाफैटिड़ा की शक्ति व प्रकृति - यह  6 , 30, 200 ती शक्ति में उपलब्ध हैं । यह औषधि ' गर्म ' प्रकृति की हैं।


शनिवार, 6 मार्च 2021

आर्सेनिकम आयोडेटम ( ARSENICUM IODATUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

आर्सेनिकम आयोडेटम ( ARSENICUM IODATUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक विवरण-

  • नाक या कान से लगने वाला अत्यधिक पीला स्राव 
  • यक्ष्मा रोग की प्रारंभिक अवस्था 
  • आर्सेनिकम आयोडेटम के कारण शीत तथा आयोडीन के कारण ऊष्ण प्रधान प्रकृति 
  • हृदय के रोग में फायदेमंद

आर्सेनिकम आयोडेटम की प्रकृति- खुली हवा में रहने से रोग के लक्षणों में कमी होती हैं। शुष्क हवा में, बंद कमरे में रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

नाक या कान से लगने वाला अत्यधिक पीला स्राव - साधारण जुकाम तथा पुराने जुकाम में इस औषधि का विशेष लाभ होता हैं । इसका स्राव अधिक नीला - पीला व पस जैसा होता हैं । जहां लगता है वहां काटता हैं । जब जुकाम क्रोनिक हो जाए तब आर्सेनिकम आयोडेटम अच्छा काम करती है । 

यक्ष्मा रोग की प्रारंभिक अवस्था - यक्ष्मा प्रकृति के रोगियों के लिये यह विशेष उपयोगिता रखती हैं । रोगी को तुरन्त ठंड लगकर जुकाम हो जाती है और लगातार नाक की शिकायत बनी रहती हैं । टी ० बी ० के रोगी में रक्त हीनता व पीलापन पाया जाता हैं, वज़न कम होता जाता है ।  जब यक्ष्मा रोग की प्राथमिक अवस्था हो , दोपहर को तापमान बढ़ जाता हो , पसीना आता हो , शरीर क्षीण हो रहा हो , इनके साथ अतिसार की शिकायत हो और खांसी रहती हो तो यक्ष्मा के इलाज के लिये यह प्रसिद्ध औषधि हैं । 

आर्सेनिक के कारण शीत तथा आयोडीन के कारण ऊष्ण प्रधान प्रकृति - अगर ठंड ज्यादा न हो तो रोगी खुली हवा पसन्द करता है , कमरे का दरवाजा व खिड़कियां खुली रखनी चाहता हैं, वह ठंडा पानी भी पसन्द नही करता और स्नान करने से उसे ठंड लग जाती हैं। इस औषधि में आर्सेनिक और आयोडीन का मिश्रण हैं। इसलिये इसके कई रोगी आर्सेनिक के कारण शीत प्रधान , और आयोडीन के कारण ऊष्ण प्रधान होते हैं। इसलिये यह दवा शीत व गरम दोनों प्रकृति की है, परन्तु मुख्य रूप से यह गरम प्रकृति की औषधि हैं । 

हृदय के रोग में फायदेमंद - हृदय के रोगों में आर्सेनिक आयोडेटम व कैटिगस दोनों दवा उपयोगी मानी गई हैं। इस दवा से हर प्रकार हृदय के रोगी ठीक हो जाते हैं । 

आर्सेनिक आयोडेटम की शक्ति व प्रकृति - यक्ष्मा में इस दवा का प्रयोग 4x शक्ति से शुरु करना चाहिए , औषधि ताजी होनी चाहिए और रोशनी से बचाकर रखना चाहिए । साधारण रोगों में 2 या 3 शक्ति की दवा का प्रयोग करना चाहिए । यह औषधि ' गर्म' प्रकृति की हैं ।


एरम ट्रिफाइलम औषधि ( ARUM TRIPHYLLUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फ़ायदे

एरम ट्रिफाइलम औषधि ( ARUM TRIPHYLLUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार से विश्लेषण-

  • होंठ और नाक को लगातार नोचने की इच्छा 
  • भयंकर खुश्क या बहता हुआ जुकाम 
  • गला बैठ जाना

एरम ट्रिफाइलम औषधि की प्रकृति -   भाषण देने, गायन, ठंडक से और गर्मी से ठंडक में आने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

होंठ और नाक को लगातार नोचने की इच्छा- किसी भी रोग में होंठ और नाक को लगातार नोचने की इच्छा हो , नोच कर रोगी खून तक निकाल लेता हैं। फिर भी कुरेदना बंद नहीं करता , इस अवस्था में एरम ट्रिफाइलम औषधि काम आती हैं ।  होंठ , मुख का खोल तथा नाक आदि की त्वचा छिल जाती है , खून निकलने लगता है , रोगी छिली जगह को भी नोचता रहता है , ऐसा करने से उसे दर्द होता है , परन्तु नोचने से नही रुकता । होंठ या नाक में ऐसी प्रबल खुजली  होती होती हैं, कि रोगी उस स्थान को नोचे बगैर चैन अनुभव न करता। होंठ से , नाक से खून बहे और वह फिर भी उस स्थान को नोचता रहै, यह " विशिष्ट - लक्षण ' हैं।  

भयंकर खुश्क या बहता हुआ जुकाम - इस औषधि में भयंकर जुकाम पाया जाता है । नाक बन्द हो जाती है , खासकर बांई नाक । रोगी मुख से सांस लेने को मजबूर हो जाता हैं । रात को लगातार छीकें आती हैं । यदि जुकाम खुश्क न होकर बहने वाला हो , तो नाक का पानी त्वचा के जिस भाग पर से बहता है वहाँ लाल निशान पड़ जाता है , नाक को रोगी अन्दर और बाहर से  छीलता रहता हैं । नाक से पानी बहने पर भी नाक बन्द रहती है । अत: इन लक्षणों में एरम ट्रिफाइलम औषधि लाभप्रद होती हैं।

गला बैठ जाना - गवैये , व्याख्याता , वकील या भाषण देने वाले जब तीन चार घंटे तक बोल कर ठंडे स्थान पर जाते हैं , तब हवा के लगने में उनका गला बैठ जाता हैं, तो एरम ट्रिफाइलम उन्हें अपना काम जारी रखने में सामर्थ्य प्रदान करती हैं , गला खुल जाता है । गला बैठने के लक्षण में एरम ट्रिफाइलम कारगर औषधि हैं।

एरम ट्रिफाइलम शक्ति व प्रकृति - यह औषधि निम्न शक्ति में अच्छा परिणाम नहीं देती और न ही इसे बार - बार देना चाहिए । क्योंकि इससे कुफल होता है । उच्च शक्ति मे ज्यादा कारगर लाभप्रद होती है ।


शुक्रवार, 5 मार्च 2021

आर्सेनिकम ऐल्बम ( ARSENICUM ALBUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फ़ायदे

आर्सेनिकम ऐल्बम ( ARSENICUM ALBUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन-

  • बैचेनी, घबराहट , मृत्यु भय और बेहद कमज़ोरी 
  • मृत्यु के समय की बैचेनी में आर्सेनिकम ऐल्बम शांत मृत्यु लाती हैं या मृत्यु से बचा लेते हैं 
  • जलन में गर्मी से आराम  
  • बार - बार व थोड़ी - थोड़ी प्यास लगना 
  • बाह्य त्वचा, अल्सर तथा गेंग्रीन पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव 
  • श्लैष्मिक झिल्ली पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव ( आँख , नाक , मुख , गला , पेट , मूत्राशय से जलने वाला स्राव ) 
  • समयानन्तर व पर्याय क्रम  के रोग 
  • रात्रिकालीन या दोपहर के बाद रोग का बढ़ना  
  • सफाई पसन्द स्वभाव

आर्सेनिकम ऐल्बम की प्रकृति - गर्मी से , गर्म पेय से, गर्म भोजन इच्छा, दमे में सीधा बैठने से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि ठंड , बर्फ , ठंडा पेय , ठंडा भोजन नापसन्द, दोपहर व मध्यरात्रि को रोग बढ़ना , 14 दिन बाद या साल भर बाद रोग का फिर से आक्रमण, अवरुद्ध स्राव या दाने और बरसात के मौसम में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

बैचेनी, घबराहट, मृत्यु भय और बेहद कमज़ोरी - बेचैनी इसका मुख्य लक्षण हैं । उसे कही पर भी चैन व आराम नहीं मिलता । रोगी कभी यहाँ बैठता है , कभी वहाँ । कभी यहाँ लेटता है, कभी वहाँ , कभी इस कुर्सी पर बैठता है , कभी दूसरी पर ।  इस प्रकार की बैचेनी में यह दवा उत्तम हैं । रोग की शुरुआत में जो बेचैनी होती हैं, उसमे एकोनाइट दे सकते हैं, परन्तु जब रोग जब बढ़ जाता है तब बैचेनी के लिये यह औषधि अधिक उपयुक्त होती हैं । इस बैचेनी में रोगी घबरा जाता है , कि उसे मृत्यु का भय लगने लगता हैं ।  रोगी लगातार कमजोर होता जाता हैं।  इस कमज़ोरी के कारण रोगी अब चल फिर भी नहीं सकता। जब कमज़ोरी बैचेनी का परिणाम हो , तब पूर्व बैचेनी और वर्तमान कमज़ोरी के लक्षणों के आधार पर आर्सेनिक ऐल्बम दी जाती हैं । बच्चों की बेचैनी में देखना चाहिए कि बच्चा कभी माँ की गोद में जाता हैं , कभी नर्स की गोद में , कभी बिस्तर पर,  किसी हालत में उसे चैन नही पड़ता , तो आर्सेनिकम ऐल्बम ही उसे ठीक कर सकती हैं । 

बैचेनी में एकोनाइट और आर्सेनिकम ऐल्बम की तुलना - एकोनाइट का रोगी बलिष्ठ और तन्दुरुस्त होता हैं। उसको अचानक रोग होता हैं, और उसे भी मौत भय रहता हैं, परन्तु वह शीघ्र ही दवा के प्रयोग से ठीक हो जाता हैं। आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी मौत के मुख से निकल भी आया तो भी उसे पूरी तरह स्वस्थ होने में देर लगती हैं । रोग की प्रथमावस्था में एकोनाइट के लक्षण होते हैं , रोग की भयंकर अवस्था में आर्सेनिकम ऐल्बम के लक्षण होते हैं। 

मृत्यु के समय की बैचेनी में आर्सेनिकम ऐल्बम शांत मृत्यु लाती हैं या मृत्यु से बचा लेते हैं - मृत्यु सिर पर खड़ी होने पर सारा शरीर निश्चल हो जाता हैं , शरीर पर ठंडा पड़ जाता हैं और चिपचिपा पसीना आ जाता हैं । ऐसा हैजा या किसी भी अन्य रोग में भी हो सकता हैं । इस समय दो ही रास्ते होते हैं, या तो रोगी की शांति से मर जाए , या वह मौत के मुख से बाहर निकल आए । ऐसे में होम्योपैथी की दो दवाए  आर्सेनिकम ऐल्बम और कार्बोवेज ठीक कर सकती हैं। ऐसे समय दोनों में से उपयुक्त दवा की उच्च - शक्ति की एक मात्रा या तो रोगी को मृत्यु के मुख से खींच लाती हैं , या उसे शान्तिपूर्वक मरने देती हैं ।  

जलन में गर्मी से आराम - आर्सेनिकम ऐल्बम का यह ' विशेष लक्षण है कि जलन होने पर भी गर्मी से उसे आराम मिलता हैं । फेफड़े में जलन हो तो रोगी सेक करना चाहेगा , पेट में जलन हो तो वह गर्म चाय , गर्म दूध पसन्द करेगा , ज़ख्म में जलन हो तो गर्म पुलटिस लगवायेगा , बवासीर की जलन हो तो गर्म पानी से धोना चाहेगा । इसमें अपवाद मस्तिष्क की जलन है , उसमे वह ठंडे पानी से सिर धोना चाहता हैं । आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी सारा शरीर कम्बल से लपेटे रखता हैं, परन्तु सिर उसका ठंडी हवा चाहता हैं । 

आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी शीत प्रधान होता है , परन्तु शीत प्रधान होते हुए भी उसे जलन होती है , और जलन में उसे गर्मी से आराम मिलता हैं । यह इसका सर्वांगीण और व्यापक लक्षण हैं । सिर दर्द में उसे ठंडक से आराम मिलता हैं । यह सर्वांग और एकांग का परस्पर विरोध हैं । इस प्रकार ध्यान देना होगा कि अंगो के " विशिष्ट लक्षण ' का उस औषधि के उस अंग के विशिष्ट लक्षण से साम्य है या नहीं , और व्यक्ति के जो विशिष्ट लक्षण हैं उनका उस औषधि का उस व्यक्ति पर पाये जाने विशिष्ट लक्षणों से साम्य है या नहीं और जिन औषधियों में सर्वांग और एकाग के लक्षणों में विरोध है उसे ध्यान में रखते हुए सर्वांग के व्यापक लक्षणों को प्रधानता देनी चाहिए । 

मस्तिष्क की गर्मी को ठंडे पानी से आराम मिलता है , तो भी खोपड़ी की जलन , जो वाय के कारण होती है , उसे गर्मी से ही आराम मिलता हैं । वह खोपड़ी को कपड़े से लपेटे रखता हैं । जलन के साथ दर्द भी हो , अगर उसमे गर्म सेक से आराम मिले , तो आर्सेनिकम ऐल्बम अच्छी दवा हैं । यदि जलन के साथ सिर दर्द, आखो में दर्द , नाक में दर्द , गले में, पेट में, आतों , बवासीर के मस्सो में , मूत्राशय में, गर्भाशय में , डिम्ब कोष में , जननेन्द्रिय में, छाती में , स्तन में, हृदय में , मेरूदंड में , जख्म में , त्वचा में कही भी हो सकता हैं । ऐसा लगता हैं कि धमनियों में बहते रूधिर में आग लगी गई हो । ऐसे लक्षणों में अगर गर्मी से आराम मिलता हो तो आर्सेनिकम ऐल्बम ही सबसे उपयुक्त औषधि हैं । 

बार - बार व थोड़ी - थोड़ी प्यास लगना - इस औषधि में बार - बार व थोड़ी - थोड़ी प्यास लगना इसका खास लक्षण हैं , परन्तु इस प्यास की एक विशेषता हैं । रोगी बार बार पानी पीता हैं और थोड़ा- थोड़ा पीता हैं । प्राय देखा जाता हैं कि रोग में एक अवस्था आगे चल कर दूसरी विरोधी अवस्था में बदल जाती हैं ।  प्रारंभ में प्यास , और रोग के बढ जाने पर प्यास की कमी आर्सेनिकम ऐल्बम का ही लक्षण हैं ।   

बाह्य त्वचा, अल्सर तथा गेंग्रीन पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव - आर्सेनिकम ऐल्बम के रोगी की त्वचा सूखी , मछली के छिलके के समान होती है , उसमें जलन होती है । फोडे - फुंसियां आग की तरह जलती हैं । सिफिलिस के अल्सर होते हैं जो बढ़ते चले जाते हैं , ठीक नहीं होते उनमें जलन और सडंन होने लगती हैं । अगर शोथ के बाद फोड़ा बन जाए और सड़ने लगे या गेंग्रीन बनने लगे तो यह औषधि बहुत लाभप्रद हैं । 

श्लैष्मिक झिल्ली पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव ( आँख , नाक , मुख , गला , पेट , मूत्राशय से जलने वाला स्राव ) - आर्सेनिकम ऐल्बम के रोगी का स्राव जहाँ लगता हैं , वहा जलन पैदा करता हैं। जैसे - 

>> जुकाम में जलन - जिसे जुकाम से पानी बहता हो तो वो होठों पर लगने पर जलन पैदा कर देता हैं , नाक में भी जलन करता है , नाक छिल जाता है, अगर रोगी को गरम पानी से आराम मिले तभी यह दवा ले। 

>> मुख के छालो में जलन - जब मुख में छाले पड़ जाए और उनमें जलन हो , और गरम पानी से लाभ हो तो इस औषधि का उपयोग करे । 

>> गले में टांसिलों में शोथ व जलन - गले मे जलन और शोथ के साथ गर्म पानी के सेक से आराम मिलने पर अन्य लक्षणों को ध्यान में रखते हुए यह दवा उपयोगी हैं ।

>> पेट में शोथ व जलन - पेट का अत्यंत नाजुक होना , एक चम्मच ठंडा पानी पीने से भी उल्टी हो जाना , गर्म पानी से थोड़ी देर के लिये आराम मिलना, पाचन प्रणाली में सूजन । जो भी खाए उल्टी कर दे और जलन होना , बाहर से गर्म सेक से आराम मिलना । रोगी इतना बेचैन हो जाता है कि टहलने फिरने से भी उसे चैन  नही मिलता और अंत में इतना शिथिल हो जाता है कि वह बिलकुल भी चल-फिर नही सकता ।  

>> मूत्राशय में शोथ व जलन - मूत्राशय में जबरदस्त शोथ हो , बार - बार पेशाब आता हो , मूत्र में रक्त मिला हो , रक्त के थक्के भी आ रहे हो । और साथ ही रोगी को शुरू में बेचैनी रही हो , घबराहट , मृत्यु - भय,बेहद कमजोरी हो और सेक से रोगी को आराम मिलता था , तब रोगी को आर्सेनिकम ऐल्बम दी जाती हैं।  

समयानन्तर व पर्याय क्रम  के रोग - रोग का समयानन्तर से  प्रकट होना इस औषधि का विशिष्ट - लक्षण हैं । इसी कारण मलेरिया ज्वर में यह विशेष उपयोगी दवा हैं । जब हर दूसरे दिन , चौथे दिन , सातवें या पन्द्रहवें दिन ज्वर आता हैं । सिर - दर्द भी हर दूसरे दिन , हर तीसरे , चौथे , सातवें या चौदहवें दिन आता हैं । रोग जितना पुराना होता है उतना ही उसके आने का व्यवधान लम्बा होता हैं । अगर रोग नया है तो रोग की उत्पत्ति हर तीसरे या चौथे दिन होता है , अगर पुराना है तो सातवें दिन , अगर रोग सोरिक है तो चौदहवें और पंद्रहवे दिन । इस दृष्टि से मलेरिया में आर्सेनिकम ऐल्बम अधिक उपयुक्त दवी हैं । 

>> ' समयानन्तर ' का सिरदर्द  - मलेरिया की तरह आर्सेनिकम ऐल्बम में ऐसा सिरदर्द होता है जो हर दो सप्ताह के बाद आता है । रोगी बेचैन रहता है , घबराता हैं । नए रोग में पानी बार - बार पीता है, लेकिन पुराने रोग में प्यास नहीं लगती , सिर पर ठंडा पानी डालने से आराम मिलता है और खुली हवा में घूमना चाहता है, मध्य रात्रि में एक से दो बजे तकलीफ होती है , कभी - कमी यह तकलीफ दोपहर के एक से दो बजे से सिरदर्द शुरू होकर सारी रात रहता हैं । समयानन्तर आने वाले इस सिरदर्द में अन्य लक्षणों को भी देखकर आर्सेनिकम ऐल्बम देना लाभकारी होता हैं ।  

रात्रिकालीन या दोपहर के बाद रोग का बढ़ना - आधी रात के बाद या दोपहर को एक से दो बजे के बाद रोग ( दमे ) का बढ़ना इसका चरित्रगत लक्षण हैं ।  बुखार , खांसी , हृदय की धड़कन किसी भी रोग में मध्य - रात्रि या दोपहर में रोग का बढ़ना आर्सेनिकम ऐल्बम का लक्षण हैं । 

सफाई पसन्द स्वभाव - रोगी का स्वभाव सफाई पसंद होता है । वह गंदगी या अनियमितता को बर्दाश्त नहीं कर सकता । अगर उसे किसी बात से परेशानी है और जबतक वह परेशानी ठीक नही हो जाती तबतक परेशान रहता हैं । 

आर्सेनिकम ऐल्बम औषधि के अन्य लक्षण 

>> हैजे का दस्त , डायरिया , डिसेंट्री - इस रोग मे कैम्फर , क्यूप्रम और वेरेट्रम ऐल्बम देना चाहिए ।  परन्तु इन तीनों के अलावा आर्सेनिकम ऐल्बम भी हैजे की अच्छी दवा हैं । पानी की तरह पतला दस्त , काला और दुर्गन्धयुक्त दस्त , बेचैनी , प्यास , मृत्यु - भय , कमजोरी आदि लक्षण होने पर यह औषधि उपयोगी हैं । आर्सेनिकम ऐल्बम के डायरिया और डिसेन्ट्री में घबराहट , दुर्गन्धयुक्त मल , बेचैनी और अत्यंत कमजोरी प्रधान लक्षण है । कमजोरी इतनी हो जाती है कि मूत्र और मल अपने आप निकल जाता हैं । ऐसी स्थिति भी आ जाती है कि रोगी मृतप्राय हो जाता है , सिर्फ सांस चलती है । मल लगता हुआ , जलन के साथ निकलता है । डिसेन्ट्री में ऐंठन होती है , टट्टी जाने की इच्छा बनी रहती है , आंतों में , गुदा में अत्यंत बेचैनी अनुभव होती हैं, दर्द इतना होता है कि रोगी मृत्यु के अलावा कुछ  नहीं सोच सकता । 

>> रक्तस्राव - आर्सेनिकम ऐल्बम रक्तस्राव की औषधि  है । रक्तस्राव किसी भी अंग से हो सकता हैं । अगर इस रक्तस्राव का इलाज न हो, तो कुछ समय बाद यह गेंग्रीन में बदल जाता हैं। उल्टी मे और टट्टी में काला, थक्केदार रुधिर जाने लगता हैं । रक्तस्राव के कष्ट में रोगी बेचैनी की हालत में होता हैं और अत्यधिक क्षीण, दुर्बल दशा में पहुंच जाता है , इस दुर्बलता में उसे ठंडा पसीना आने लगता हैं। रक्तस्राव का ही एक रूप खूनी बवासीर है, इसमें रोगी के मस्सों में खुजली और जलन होती है, इस दशा में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 

>> ज्वर - ज्वर में शीत , ताप और स्वेद - ये तीन अवस्थाए होती हैं । आर्सेनिकम ऐल्बम के ज्वर में शीत अवस्था में प्यास नहीं लगती , ताप अवस्था में थोड़ी प्यास लगती है , स्वेद अवस्था में खूब प्यास लगती है , जितना पसीना आता है, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती हैं । अगर समयानन्तर ज्वर हो ( मलेरिया ) तो इन लक्षणों में आर्सेनिकम ऐल्बम ज्वर को जल्दी ठीक कर देती हैं।  

>> खांसी या श्वास कष्ट -  खांसी आने के बाद श्वास कष्ट होने पर इस औषधि से लाभ होता है ।  खुश्क खांसी जिसमें रोगी थोड़ी - थोड़ी देर में खांसता हैं, जो ठीक होने में नही आती , न कफ बनता है , न निकलता है । ऐसी खांसी में आर्सेनिकम ऐल्बम से लाभ होता हैं ।

>> आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी शीत प्रधान होता है, वह गरम वातावरण चाहता हैं । हर समय गर्म कमरे मे रहना चाहता है । 

आर्सेनिकम ऐल्बम की शक्ति व प्रकृति - पेट , आंतो तथा गुर्दे की बीमारियों में निम्न शक्ति लाभ पहुँचाती है, स्नायु संबंधी बीमारियों तथा दर्द के रोगों में उच्च शक्ति लाभप्रद होती है । अगर सिर्फ त्वचा के बाह्य रोगों में 2x व 3x  उपयुक्त होती हैं, जिसे दोहराया जा सकता हैं । दमे मे 30 शक्ति और पुरानी बीमारी में 200 शक्ति लाभदायक होती हैं । यह औषधि ' सर्द ' प्रकृति की हैं ।