सोमवार, 21 दिसंबर 2020

एम्ब्रा ग्रीसिया ( AMBRA GRISEA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग और फायदें

एम्ब्रा ग्रीसिया दवा के लक्षण, मुख्य रोग व फायदों को विस्तार से जानते हैं -

  • जवानी में वृद्धावस्था के लक्षण 
  • चक्कर आना
  • घरेलू विपत्ति या व्यापार में हानि से स्नायु दुर्बलता तथा अनिद्रा 
  • गाना बजाना सहन न होना व सुनने से खांसी आ जाना 
  • शरीर के पीड़ित अंग में शिकायत

" एम्ब्रा ग्रीसिया की प्रकृति "

भोजन करने के बाद  ठंडी हवा में व ठंडा खाने पीने से लक्षणों में कमी आती हैं। दूसरों की उपस्थिति से, चिन्ता , व्यावसायिक चिन्ता, घरेलु विपत्ति, वृद्धावस्था में और  प्रातःकाल तथा सायंकाल को रोग में वृद्धि होती हैं।

" जवानी मे वृद्धावस्था के लक्षण "

कई दुबले - पतले युवक-युवतियाँ  जवानी में ही बुढ़ापे जैसी अवस्था में पहुंच जाते हैं , वे 50 से 60 वर्ष की आयु जैसे लगते हैं । ऐसे रोगियों के लिये यह उत्तम औषधि हैं । रोगी के अंगों में कमजोरी के कारण कंपन , चलने में लड़खड़ाहट , स्मरण शक्ति की कमी - ये सभी लक्षण दिखाई देते हैं । 

वे बात करते हुए भूल जाते हैं कि क्या कहा था , प्रश्न करेंगे और उत्तर सुने बिना दूसरा प्रश्न कर डालेंगे । कई नवयुवकों में ऐसी मानसिक कमजोरी आ जाती हैं , वे पागल तो नहीं होते , परन्तु पागल जैसी प्रवृति करते हैं । 

वृद्ध लोगों में स्नायु दुर्बलता का यह लक्षण पाया जाता हैं कि वे क्षण में तो बिल्कुल हतोत्साह, निराश दीख पड़ते हैं, फिर कुछ देर बाद, स्वभाव की उग्रता दर्शाते हैं। इस प्रकार के स्नायु दुर्बलता में वृद्ध पुरुषों को इस दवा से लाभ होता हैं । कभी - कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्ति सुख - दुख , शुभ - अशुभ सब बातों के प्रति उदासीन हो जाता हैं । जिन बातों से दूसरों का दिल टूट जाए उन बातों का उन पर कोई असर नहीं होता हैं। 

ऐसा इसलिए होता हैं, क्योंकि उनकी सोच विचार की शक्ति क्षीण हो जाती हैं । प्रात: काल उठने पर इन लोगों की मानसिक स्थिति सजग नहीं होती, वे स्वप्न की अवस्था में ही रहते हैं । अगर यह अवस्था बढ़ जाए , तो सायंकाल तक पागल से पाये जाते हैं । 

" चक्कर आना "

जिन लोगों में युवावस्था में ही वृद्धावस्था के लक्षण प्रकट हो जाते हैं, उनकों चक्कर आना स्वाभाविक हैं । वह अकेला बाहर नहीं निकल सकता, जिस विषय पर विचार-विमर्श हो रहा हैं, उस पर ध्यान केंद्रित नही कर पाता हैं। चक्करों की इस अवस्था में एम्ब्रा ग्रीसिया बहुत ही अच्छी औषधि हैं।

" घरेलू विपत्ति या व्यापार में हानि से स्नायु दुर्बलता तथा अनिद्रा "

एक स्वस्थ आदमी को व्यापार में एकदम से नुकसान हो जाए या फिर घरेलू विपत्ति आ जाए , परिवार में लगातार मौतें होने से मन में ऐसा आघात लगता हैं, कि उसे संसार निस्सार दिखने लगता हैं । और इन दुर्घटनाओं को देखकर उसे जीने का कुछ लक्ष्य नहीं दिखता , वह जीवन से निराश हो जाता हैं । इन्ही विचारों से उसकी निद्रा नष्ट हो जाती हैं । ऐसे रोगी की यह ठीक कर देती हैं । 

" गाना बजाना सहन न होना व गाने से खांसी आ जाना "

रोगी को गाना सुनने व बजने से अनेक कष्ट होते हैं, खांसी आने लगती हैं । गाने के स्वरों को वह भौतिक वस्तु समझता है , और उसे ऐसी अनुभूति होती हैं, कि स्वर उसे जकड़े हुए हैं । ऐसे में  एम्ब्रा ग्रीसिया औषधि लाभप्रद होती हैं।

" शरीर के पीड़ित अंग में शिकायत "

एम्ब्रा ग्रीसिया में शरीर के एक अंग में ही शिकायत होती है । जैसे रोगी के शरीर के उसी अंग में पसीना आता है जो अंग पीड़ित व रोग ग्रस्त हैं , दूसरे में नहीं आता ।  

इस औषधि के कुछ अन्य लक्षण भी होते हैं। जैसे- स्त्री प्रसंग के समय दमे का दौरा पड़ना , मेरुदण्ड के प्रदाह से जो लोग रोग ग्रस्त हैं उनकी स्नायविक खांसी , डकार , उंगली व बाह में से किसी एक अंग में सुन्नपन और  भीड़ से परेशानी जैसे लक्षणों में लाभ करती हैं ।  यह स्नायु प्रधान दवा हैं । 

" एम्ब्रा ग्रीसिया औषधि की शक्ति व उपयोग "

एम्ब्रा ग्रीसिया का 2 या 3 शक्तियों का बार - बार प्रयोग किया जा सकता हैं । सांयकाल इस औषधि को नही देना चाहिये , इससे रोग बढ़ सकता हैं । यह व्हेल मछली से निकलता हैं और यह नोसोड होता हैं ।


रविवार, 20 दिसंबर 2020

एलूमिना औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

एलूमिना औषधि के व्यापक  लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विश्लेषण विस्तार से जानते है,

  • एलूमिना के मानसिक लक्षण 
  • चाकू या खून देखकर स्वयं या दूसरे  को मारने का ख्याल आना 
  • प्रात: काल उठने के बाद उदासी 
  • स्नायु - सस्थान के लक्षण ( मेरुदण्ड में जलन व शिथिलता )
  • मूत्राशय तथा मलाशय में शिथिलता 
  • बुढ़ापे में चक्कर आना  
  • बच्चा सो कर घबराहट में उठना  
  • नाक तथा गले में कटार ( जुकाम )
  • खुजली होने के बाद फोड़े फुन्सी होना 
  • बेहद खुश्की ( चेहरे व हाथों पर जाले  सा अनुभव, बालों का झड़ना ) 
  • आवाज का बैठना 
  • स्त्रियों में पानी की तरह बहने वाला प्रदर 
  • मासिक धर्म बन्द होने की आयु में 
  • गर्भवती स्त्री तथा शिशु का कब्ज 
  • स्त्रियों तथा पुरूषों का गोनोरिया

" एलूमिना की प्रकृति "

सांयकाल के समय, खुली व नम हवा में रहने, हल्के फुल्के चलने - फिरने और  ठंडे पानी के स्नान से रोगी लक्षणों में कमी आती हैं। और,  गर्मी में, बन्द कमरे में रहने से, आलू खाने से, बातचीत करने से, खुश्क ऋतु में, प्रात: काल उठने से, बैठे रहने से , स्त्रियों में रजोधर्म के बाद लक्षणों में वृद्धी होती हैं। और अकारण भी समय - समय पर रोग के लक्षणों में कमी - वृद्धि होती रहती हैं।

" एलूमिना के मानसिक लक्षण "

मानसिक शिथिलता, जड़ता, निर्णय शक्ति का अभाव अर्थात  शिथिलता  इसका मुख्य लक्षण है । यह शिथिलता शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की होती है । रोगी हमेशा भ्रम में रहता हैं, जिसके कारण वह निर्णय लेने में असमर्थ होता हैं ।  जिन चीजों को वह पहले वास्तविक रूप में जानता था , वे अब उसे वास्तविक नही लगती । 

जब वह कुछ कहता है या देखता हैं , तो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि कोई दूसरा कह रहा हैं या दूसरा देख रहा हैं। उसे अपने व्यक्तित्व के विषय में संदेह होता हैं , वह यह निश्चय नहीं कर पाता कि वह कौन हैं। पढ़ने लिखने में गलतियां करता हैं, गलत शब्दो का प्रयोग करता हैं। मन शिथिल व भ्रम में हो तो एलूमिना दी जाती हैं । 

" समय धीरे धीरे बीतता मालूम होना "

एलूमिना का दूसरा मानसिक लक्षण यह हैं कि उसे लगता हैं कि समय बहुत धीरे बीत रहा हैं । वह समझता है कि चीजें जिस तेजी से होनी चाहिये उस तेज़ी से नहीं हो रही , सब कार्यों में देर हो रही है , जिस काम में आधा घंटा लगना चाहिये उसमे पूरा दिन लग रहा हैं । तो ऐसे में एलूमिना कारगर होती हैं।

" चाकू या खून को देखकर स्वयं व दूसरे को मारने का ख्याल आना "

इस औषधि के रोगी का मन इतना अधिक प्रभावित हो जाता हैं कि रोगी अगर चाकू या खून को देखता है , तो उसके भीतर दूसरे को या स्वयं को मारने की भावना प्रबल हो उठती हैं, वह आत्महत्या करना चाहता हैं । 

" प्रात काल उठने के बाद उदासी ( चित वृत्ति का बदलते रहना ) "

इस औषधि का रोगी प्रात काल  उठने के बाद उदास होता हैं और रोने लगता हैं। अपनी परिस्थितियों से दूर भागना चाहता हैं और भयभीत रहता हैं। समझता है कि जिन परिस्थितियों से घिरा हैं, उनके हटने से उसका दुख दूर हो जाएगा ।  

जब वह अपनी मानसिक दशा के बारे में सोचता हैं तो डरता हैं कि कहीं वह पागल तो नहीं हो गया। अपना नाम तक भूल जाता हैं, सोचने लगता हैं, मन घबराया रहता हैं। उसे वास्तव में लगता हैं, कि वह सचमुच पागल हो गया हैं । 

प्रात: काल सोकर उठने के बाद उसके मन में ऐसे विचार आते - जाते रहते हैं, परन्तु चित्त वृत्ति बदलती रहती है । कभी निराशा की मनोवृत्ति से निकल कर वह आशाभरी , शांत मनोवृत्ति में आ जाता हैं , इसके बाद फिर उसी निराशा में चला जाता है । इस औषधि की प्रकृति में समय - समय पर रोग का बढ़ना - घटना चलता रहता हैं । 

" स्नायु संस्थान  के लक्षण ( मेरुदण्ड में जलन व शिथिलता ) "

जो स्नायु  मेरूदण्ड से निकलते हैं, उन पर इस औषधि का विशेष प्रभाव होता हैं । इन स्नायु संस्थान में शिथिलता आने से भोजन नली में निगलने में कठिनाई होती हैं, हाथ उठाने हिलाने में कठिनाई होती हैं ।  

टांगों में, मलद्वार, मूत्रद्वार में शिथिलता, जड़ता अनुभव होती है । सबसे पहले  इन अंगों की क्रियाशीलता नष्ट होती हैं, फिर अंत में पूरा अर्धाग हो जाता हैं । पाव में कांटा लगे , कोई चूटी मारे तो एकदम अनुभव नहीं होता । सिर्फ बाह्य अनुभव होता हैं, चेतना तक धीरे - धीरे पहुंचता हैं । 

मेरुदंड में जलन होती हैं और पीठ में दर्द होता हैं । रोगी को लगता हैं, पीठ में  मेरुदण्ड के नीचे की कशेरुका में गर्म लोहा घुसा दिया गया हो । मेरुदण्ड के प्रदाह में जब पीठ की मांसपेशियों में ऐंठन  अनुभव हो , और मेरुदण्ड की उपझिल्ली  का शोथ हो तो वहां एलुमिना आश्चर्य जनक कार्य करती हैं । 

" मूत्राशय की शिथिलता "

स्त्री या पुरुष दोनों को देर तक पेशाब के लिये बैठे रहना, पेशाब नहीं आता, देर से आता है , धीरे - धीरे निकलता हैं। कभी - कभी धार की जगह बूंद - बूंद कर पेशाब निकलता हैं। कभी - कभी भरा रहता है और अपने आप  बूँद - बूँद कर टपकता रहता हैं । यह इस अंग की शिथिलता के कारण होता हैं, जो इस औषधि का व्यापक लक्षण हैं । इसका विलक्षण लक्षण यह हैं कि पेशाब करने के लिए भी मलाशय अर्थात् गुदा पर जोर लगाना पड़ता है । 

" मलाशय की शिथिलता "

मलाशय इतना शिथिल हो जाता है कि भरा रहने पर भी मल नहीं निकलता, मल कठोर न होकर तरल ही क्यो न हो , वह नहीं निकलता । जब गुदाद्वार में इस प्रकार की जड़ता , शिथिलता हो कि दस्त भी न निकले , ऐसी कब्ज हो , तब यह औषधि उत्तम कार्य करती है । 

रोगी को अनुभव होता है कि मलद्वार मल से भरा हैं और ज़ोर लगाने पर भी मल नही निकल रहा, तो रोगी को पेट की मांसपेशियों से ज़ोर लगाना पडता हैं, परन्तु गुदाद्वार की मांसपेशियां मल को धकेलने में कोई सहायता नहीं करती । कठिनाई से मल निकालने पर प्रोस्टेट ग्लैंड का स्राव निकल पड़ता है क्योकि मल के लिये जोर लगाने पर इस ग्रंथि पर जोर पड़ता है । अगर ऊपर लिखे गये मानसिक लक्षण मौजूद हो , तब कठोर मल और कठिन कब्ज होने पर भी इस औषधि से बड़ा लाभ होता है । 

परन्तु इस आधार पर ही एलूमिना दे देना उचित नही हैं कि पतला मल भी जोर लगाने से ही निकलता हैं । होम्योपैथिक में एक ही लक्षण पर दवा नहीं दी जाती , रोगी की लक्षण समष्टि पर ध्यान दिया जाता है । उदाहरणार्थ , पतले मल के लिये भी जोर लगाना पड़ना नक्स मौस्केटा और चायना में भी होता हैं। 

रोगी को पतले मल के लिये भी जोर लगाना पड़ता है , परन्तु उसकी प्रकृति ऐसी हो कि वह जगा नहीं रह सकता, पढ़ने पर झट से सो जाता हैं, हमेशा सोना पसंद करता हैं। देर तक खड़ा नहीं रह सकता है , बंद कमरे में परेशान हो जाता हैं और खुली ठंडी हवा में भी परेशान हो जाता हैं। तो ऐसे रोगी को एलूमिना की जगह नक्स मौस्केटा देने से उसकी कब्ज की शिकायत दूर हो जाती हैं। 

रोगी को पतले मल के लिये जोर लगाना पड़ता हैं, परन्तु उसका पेट हवा से भरा रहता हो, चेहरा खून की कमी से पीला पड़ गया हो, कमजोर हो, ऊपर से डकारे आती हो , नीचे से हवा खारिज होती रहती है , जितनी हवा ऊपर - नीचे से निकलती हैं , उसकी परेशानी भी बढ़ती जाती है तो ऐसी कब्ज़ के लिए चायना दी जाती हैं । 

" बुढ़ापे में चक्कर आना "

जैसा की हमने पहले ही बता दिया हैं कि एलूमिना के रोगों का उद्भव स्नायु संस्थान या मेरुदंड की विकृति से होता हैं। इसी कारण इस औषधि का व्यापक लक्षण जडता, शिथिलता और अपंगता हैं । और इसी कारण बुढ़ापे में चक्कर आने पर यह दवा दी जाती हैं । 

रोगी को यह भी लगता हैं कि चीजें लगातार घूम रही हैं,  वृद्ध व्यक्तियों को शिथिलता के कारण चक्कर आना संभव हैं, और चलने में व्यक्ति डिगमिगाता हैं । इसी कारण पैरों और हाथों की अंगुलियों में सुन्नपन आ जाता है । रोग की प्रारमिक अवस्था में एलूमिना इन रोगों को ठीक कर देती है । 

" बच्चा सोकर घबराहट में उठना "

इसकी प्रकृति में हमने बताया था कि इसके रोग प्रात: काल सोकर उठने के बाद बढ़ते हैं । एलूमिना के मानसिक लक्षणों में शिथिलता , जड़ता के कारण बच्चा प्रात: काल जब सोकर उठता हैं, तब घबराया हुआ होता हैं । उसकी शारीरिक तथा मानसिक स्थिति शिथिल होती है । ज्यों - ज्यों दिन बढ़ता हैं , अंगों में जान आने लगती हैं। सोकर उठने पर सभी चीजे अपरिचित लगती हैं।

" नाक तथा गले में कटार ( जुकाम ) "

सब अंगों की शिथिलता का असर नाक तथा गले पर भी पड़ता हैं । नाक तथा गले की झिल्ली खुश्क हो जाती है ।  ज्यादातर बायी नाक बंद रहती हैं । नाक में  बदबूदार , सूखी पपड़ी जमती हैं । रोगी हर समय खांसता और नाक साफ करता रहता हैं । गले में लसदार बलगम चिपका रहता हैं और अत्यन्त खुश्की अनुभव होती हैं । रोगी को न्गलने में कठिनाई होती हैं। अर्जेन्टम नाइट्रिकम , नाइट्रिक एसिड तथा हिपर में भी यह लक्षण पाए जाते हैं ।  

" खुजली होने के बाद फोड़े फुन्सी होना "

त्वचा में इतनी खुजली होती हैं, कि खुजलाते - खुजलाते त्वचा छिल जाती हैं और फिर फोड़े - फुंसी हो जाते हैं । कई बार फोड़े फुंसी पहले होते हैं और उन्हें खुजली चलती हैं ।  एलूमिना में त्वचा सूख जाती हैं , उसमें दरारें पड़ जाती हैं और सख्त पड़ जाती हैं । इसका कारण शिथिलता और जड़ता हैं । अगर खुजली पहले और खुजलाने के बाद फोड़े - फुंसी होते हैं, तब एलूमिना , मेजेरियम , आर्सनिक आदि दवा दी जाती हैं। अगर फोड़ा - फुन्सी पहले हो और खुजली में खुजली हो तो हिपर दवा दी जाती हैं । 

" बेहद खुश्की ( चेहरे तथा हाथों पर जाले जैसा अनुभव, बाल झड़ना ) "

बेहद खुश्की एलूमिना का व्यापक लक्षण हैं । चेहरे की रुधिर प्रणालिकाए सूख जाती हैं, जिनके कारण चेहरे  पर मकड़ी का जाल लिपटा हुआ प्रतीत होता हैं । यह अनुभूति इतनी कष्टदायक होती हैं, कि रोगी बैठा - बैठा चेहरा रगड़ता रहता हैं । हाथों की पीठ पर भी ऐसा ही अनुभव होता है । रोगी मुह पर बार - बार इस तरह हाथ फेरता है जैसे चेहरे से कुछ हटा रहा हो । 

" आवाज़ का बैठ जाना "

लकवे जैसी शिथिलता इस औषधि का व्यापक लक्षण हैं । इसी कारण गला भी बैठ जाता हैं और गायक थोडी देर ही गा पाता हैं । धीरे - धीरे यह शिथिलता इतनी बढ़ जाती हैं कि बोलना ही बंद हो जाता हैं ।  जब तक आवाज़ के बैठने को ठीक करने के लिये एलूमिना औषधि नहीं बनी थी, तब तक  गले बैठने पर गायकों और व्याख्याताओं को अर्जेन्टम नाइट्रिकम दिया जाता था, परन्तु गला बैठने पर  एलूमिना अच्छा काम करती हैं। 

" स्त्रियों में पानी की तरह बहने वाला प्रदर "

स्त्रियों के रोगों में भी एलूमिना की शिथिलता का लक्षण पाया जाता है । रोगी के जननांग इतने शिथिल हो जाते हैं कि प्रदर का पानी टांगों पर  बहने लगता है । यह पानी पीला, तीखा और त्वचा को काटने वाला होता हैं । यह अंडे जैसा सफेद भी हो सकता हैं । इस प्रदर के साथ रोगी के जननांगों में निम्न लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं - जरायु के मुख पर जख्म, जननांगों में शिथिलता, शिथिलता के कारण जननांगों भारीपन,  जननांग की मांसपेशियों में ढीलापन आदि में एलूमिना लाभप्रद होती हैं।

" मासिक धर्म बन्द होने की आयु में " 

लगभग 45-50 वर्ष के आस - पास स्त्रियों का मासिक धर्म बन्द होने का समय होता हैं। माहवारी में कमी से  शिथिलता आ जाती हैं । और रोगिणी अपने को निहायत कमजोर महसूस करती हैं । और जितनी भी माहवारी होती है वह स्त्री को परेशान करती हैं । उस अवस्था में एलूमिना बहुत लाभ करती हैं । 

" गर्भवती स्त्री तथा शिशु का कब्ज "

अक्सर स्त्रियाँ गर्भावस्था में कब्ज की शिकार हो जाती हैं । उनका मलद्वार काम नहीं करता, उसमें मल निस्काशन की शक्ति नही रहती और पेट से दबाव डालने पर शौच उतरता हैं । ऐसा ही नवजात शिशु के साथ भी होता हैं । ऐसी हालत में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 

" स्त्रियों तथा पुरुषों का गोनोरिया "

जब किसी स्त्री-पुरूष को गोनोरिया रोग हो जाता हैं  और उसे पल्सेटिला तथा थूजा दी जाती हैं । जिससे रोग में तो कमी आती हैं, परन्तु जड़ से खत्म नही होता और रोग बार - बार पलट कर आ जाता हैं । इस अवस्था में एलूमिना का उपयोग किया जाता हैं । 

" एलूमिना औषधि की शक्ति तथा प्रकृति "

एलूमिना औषधि 30,200 व इससे अधिक शक्ति में दी जाती हैं । यह शीत व गरम प्रधान औषधि हैं।


एलूमेन ( ALUMEN ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

एलूमेन ( ALUMEN ) औषधि के व्यापक  लक्षण, मुख्य  रोग व फायदों का विस्तार से विश्लेषण

  • मलद्वार में लकवे जैसी कमजोरी होना
  • मूत्राशय में पक्षाघात जैसी कमजोरी 
  • शोथग्रस्त त्वचा , जिह्वा , गुह्यद्वार , जरायु या फोड़े का कड़ा पड़ जाना 
  • टाँसिल व स्तन ग्रंथियों का कड़ा पड़ जाना 
  • वृद्ध पुरुषों में खाँसी

" एलूमेन औषधि की प्रकृति "

सिर दर्द में गर्मी से रोग व लक्षणों में कमी आती हैं। और ठंड से रोग में वृद्धि ( सिर दर्द को छोड़ कर क्योंकि सिर दर्द गर्मी से कम हो जाती है ), और निद्रा व दाई तरफ लेटने से रोग व लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

" मलद्वार में लकवे जैसी कमजोरी "

एलूमेन औषधि में मलद्वार में ऐसी कमजोरी हो जाती है मानो पक्षाघात या लकवा हो गया हो । गुदा की क्रियाशीलता समाप्त हो जाती हैं, और मल गुदा में चिपकने लगता हैं । कोलन में से मल निकलता ही नहीं । जो मल निकलता है वह अत्यंत कठोर , सूखा व पत्थर की तरह गांठोवाला होता हैं । मल सप्ताह में एक बार या दो बार ही निकलता है । 

" मूत्राशय में लकवा, पक्षाघात जैसी कमजोरी "

जिस तरह मलद्वार शिथिल पड़ जाता है , उसी तरह मूत्राशय में भी  शिथिलता आ जाती है । मूत्र बड़ी कठिनाई से निकलता है । पेशाब कर लेने के बाद भी मूत्राशय भरा हुआ लगता है । शुरूआत में मूत्र निकलने में बहुत देर लगती हैं , और जब मूत्र  प्रारंभ होता हैं , तो मूत्र धार मूत्रनली से सीधे नीचे गिरता है , मूत्र में वेग बिलकुल भी नही होता । इस का कारण मूत्राशय की प्रणाली का पक्षाघात में यह औषधि कारगर होती हैं।

" शोथग्रस्त त्वचा, जिह्वा, गुह्यद्वार, जरायु या फोड़े का कड़ा पड़ जाना "

इस औषधि में त्वचा के कड़ा पड़ जाने की प्रवृत्ति है । जहाँ त्वचा में शोथ होगी वहाँ  कड़ी पड़ जाएगी । जिन औषधियों में भी त्वचा में कड़ा पड़ जाने की प्रवृत्ति पायी जाती हैं , वहां कैंसर होने की संभावना  हो जाती हैं।  जब जख्म कड़ा पड़ने लगे तो समझ लेना चाहिये कि वह कैंसर में परिवर्तित हो रहा है । याद रखे कड़ापन बढ़ता - बढ़ता कैंसर बन जाता है । ऐसे जख्म त्वचा पर कही भी हो सकते है और जिह्वा , गुह्यद्वार , जरायु में भी हो सकते हैं । कड़ेपन का  शुरु में ही एलूमेन द्वारा उपचार कर लेने से रोगी कैंसर से बच सकता हैं । 

" टाँसिल व स्तन ग्रंथियों का कड़ा पड़ जाना "

शरीर की ग्रंथियों में  टाँसिल व स्तन आदि में गोली की तरह कड़ी पड़ जाती हैं तो यह औषधि लाभप्रद होती हैं । यह प्रवृत्ति विशेष रूप से टाँसिल में भी पायी जाती है । जिन लोगों में ठंड  टाँसिल में बैठ जाती है , तो वह टाँसिल को कड़ा कर देती हैं , तो ऐसे में एलूमेन लाभप्रद होती हैं।  टाँसिल के कड़ा होने की प्रवृत्ति बैराइटा कार्ब में भी पायी जाती हैं। और टाँसिल के कड़ापन में बैराइटा कार्ब भी उत्तम औषधि हैं । 

" वृद्ध पुरुषों की खांसी "

जिन वृद्ध पुरूषों की छाती में कफ जम जाता हैं और आसानी से नहीं निकलता हैं, लम्बी - लम्बी तार के रूप में निकलता हैं , तो यह औषधि उसे ठीक कर देती हैं । यह लक्षण एन्टिम टार्ट में भी पाया जाती हैं । 

" एलूमेन औषधि की शक्ति व प्रकृति "

यह औषधि 30, 200 व इससे अधिक शक्ति में दी जाती हैं । यह दीर्घकालिक एन्टी  सोरिक औषधि हैं । यह शीत प्रधान औषधि  हैं।