रविवार, 18 अक्तूबर 2020

ऐलो - धी - क्वार ( ALOE )औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें

ऐलो - धी - क्वार ( ALOE )औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें- पेट व आंत्र रोग में लाभप्रद होती है।

  • खाने के तुरत बाद शौच की इच्छा या वेग  
  • गुदा प्रदेश में भारीपन अनुभव होना 
  • वायु ( गैस ) या मूत्र के साथ शौच निकलना 
  • कठिन मल का स्वंय निकल पड़ना 
  • गाढ़ी आंव का निकलना तथा बवासीर
  • डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट होना 
  • बीयर पीने से डायरिया होना 
  • यह जिगर के रोगों की मुख्य औषधि हैं 
  • एलो, नक्स वोमिका व सलफर की तुलना 

एलो औषधि की प्रकृति- इस औषधि में खुली हवा में रहने से, ठंड में रहने से और पाखाने के बाद लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि खाने पीने के बाद, गर्मी से, गर्म मौसम से, नम मौसम से, प्रात काल 2 बजे से 9 बजे तक और सवेरे बिस्तर से उठने पर रोग के लक्षणों में वृद्धी होती हैं । 

खाना खाने के तुरत बाद शौच की इच्छा अथवा वेग- गुदा प्रदेश में ऐसी मांसपेशियाँ होती हैं, जिन्हें सकोचक मांसपेशियाँ कहते हैं । सकोचक मांसपेशियों का काम मल को बाहर निकलने से रोकना हैं । ऐलो औषधि के रोगी की सकोचक मासपेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। इसलिए रोगी खाना खाते ही या पानी पीते ही शौच का वेग बनता हैं । और नह शौच का वेग धारण नही कर सकता और शौचालय जाना पसंद करता हैं। प्राय: देखा जाता हैं कि शौचालय में पहुंचने से पहले ही शौच निकल पड़ता हैं। इस लक्षण में यह औषधि लाभ पहुँचाती है।

गुदा प्रदेश में भारीपन अनुभव करना - गुदा प्रदेश की सकोचक मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, इस कारण ज़रा सा भी मल इकट्ठा हो जाने पर रोगी को भारीपन अनुभव होता हैं। और उसका घ्यान उधर ही अटका रहता हैं, क्योकि उसे डर रहता हैं, कि कही मल अपने आप बाहर न निकल पड़े। तो यह औषधि दी जाती हैं ।

वायु या मूत्र के साथ शौच का निकलना - रोगी के पेट से जब अपान वायु का अपसरण होता हैं, या जब भी पेशाब करते वक्त या पेट से हवा निकलने के साथ शौच भी निकल पड़ता है । इसका मुख्य का कारण गुदा की सकोचक मांसपेशियों की कमजोरी हैं। इस अवस्था में यह औषधि कारगर साबित होती हैं ।

कठिन मल का अनायास या स्वंय ही निकल पड़ना - कभी - कभी बच्चों को पता ही नहीं चलता कि उसका कठिन मल अनायास ही बिस्तर में निकल पड़ा हैं । इस लक्षण में बच्चों को 200 शक्ति की ऐलो दी जाती हैं । और उसका कब्ज़ का रोग ठीक हो जाता हैं । 

गाढ़ी आव का निकल पडना तथा बवासीर - इस औषधि का रोगी जब शौच जाता हैं , तो कभी - कभी शौच से पहले एक जेली के समान गाढ़ी आव निकलती हैं । यह आव आंत के निचले हिस्से में जमा होती रहती है और या तो शौच इस आव से लिपटा रहता हैं, या सिर्फ़ आव ही निकलती है । आव निकलने के बाद गुदा में जलन होती हैं । 

बवासीर - गुदा प्रदेश मे भारीपन का अनुभव होना ऐलो के हर रोग मे पाया जाता हैं । यह भारीपन शौच के एकत्रित हो जाने से हो जाता हैं, या गुदा प्रदेश में आव के इकट्ठा हो जाने से हो सकता हैं, या बवासीर से भी हो सकता हैं । ऐलो में बवासीर के मस्से आव से सने रहते हैं क्योकि गुदा प्रदेश में एकत्रित आव सकोचक पेशियो की शिथिलता के कारण बाहर रिसती रहती हैं। और इन मस्सों को भिगोती रहती है । इस बवासीर मे खुजली बहुत रहती है , इन मस्सों में स्पर्श असहिष्णुता होती हैं , और ठंडे पानी से मस्सों को धोने पर रोगी को आराम मिलता है । 

बवासीर के मामले में ऐलो, ब्रोमियम और म्यूरियेटिक एसिड से तुलना-  ब्रोमियम के मस्सों पर मुख का सेलाइवा लगाने से आराम मिलता हैं।  और म्यूरियेटिक एसिड की बवासीर में गरम पानी से आराम मिलता हैं जबकि ऐलो में ठंडे पानी से आराम मिलता हैं। 

बवासीर के रोग में अन्य मुख्य औषधियाँ 

>> नक्स वोमिका व सलफर - प्रात: काल में सलफर 30 और सूर्यास्त के समय सोने से 3 घंटे पहले नक्स वोमिका 30 देने से प्राय बवासीर का रोग दूर हो जाता है । जैसे मेहनत न करना , बैठे रहना , घी तथा चटपटे पदार्थ खाने से बवासीर होती हैं, तो नक्स वोमिका ज्यादा फायदा करती हैं। और पुरानी बवासीर ( खून रहे या न रहे ) में सलफ़र ज्यादा फायदा करती है । 

>> एकोनाइट तथा हैमेमेलिस- बवासीर में केवल खून निकलने के लक्षण में ऐकोनाइट अथवा हैमेमेलिस दिया जाता है । 

>> एसक्यूलस-  बादी बवासीर में जब अशुद्ध रक्त से यानि शिरा शोथ से मस्से बन जायें तो एसक्यूलस दी जाती हैं।

>> कोलिनसोनिया - एसक्यूलस की तरह इसमें भी गुदा में तिनके चुभने जैसा अनुभव होता हैं, परन्तु एसक्यूलस बादी में और कोलिनसोनिया खूनी बवासीर में दी जाती हैं । एसक्यूलस में कब्ज कम रहती, कोलिनसोनिया में बवासीर के साथ कब्ज़ भी होती हैं । 

>> म्यूरियेटिक एसिड - इसके लक्षणों में मस्से नीले रंग के होते हैं,और उनमें इतनी स्पर्श असहिष्णुता होती हैं, कि बिस्तर की चादर का स्पर्श भी सहन नहीं होता और गरम पानी से धोने पर आराम मिलता हैं। ऐलो में ठंडे पानी से धोने पर आराम मिलता हैं । 

>> आर्सनिक - तेज जलन और बवासीर के मस्सों में से गर्म सूई निकल रही हो । मस्से बाहर निकलना और सैक करने से आराम मिलता हैं । 

>> रेटनहिया - पाखाना फिरने के बाद पूरे मलद्वार में असहनीय जलन और पाखाना शिथिल होने पर भी जलन होती हैं और मस्से बाहर आ जाते हैं। उक्त लक्षणों के साथ अन्य लक्षणों को मिलाकर यह औषधि दी जाती हैं । 

डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट होना- अगर डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट के जैसा लक्षण जैसे बोतल में से पानी गड़गड़ कर रहा हैं, तो यह ऐलो का विशेष लक्षण हैं। यदि दस्त के साथ गड़गड़ाहट न रहे, तो ऐलो कारगर लाभप्रद होती हैं । पोड़ोफाइलम में मी गड़गड़ाहट रहती हैं, परन्तु उसमें दस्त मध्याह्न से पूर्व बन्द हो जाते हैं। 

बीयर पीने से डायरिया होना- जो लोग बीयर पीने के आदी होते हैं, उन्हें प्राय डायरिया हो जाता हैं । तो ऐसे व्यक्तियों को ऐलो बहुत लाभ पहुंचाती है । कभी - कभी ऐलो से लाभ न हो तो केली बाईक्रोम इस अवस्था मे उपयोगी सिद्ध होती है । 

जब डायरिया के रोगी को जिसे कैलेकेरिया , नक्स वोमिका, ब्रायोनिया और आर्सनिक आदि से कोई लाभ नही हुआ हो । उसके सभी लक्षणों को ध्यान में रखते हुए पता करे कि उसे जब दस्त आता था तब पेट में जोर से गड़गड़ाहट तो नही होती और दस्त का वेग प्रबल तो नही । जिससे वह सवेरे तीन बजे निद्रा से उठ बैठता हो । तीन बजे से नौ बजे तक उसे चार से पाँच बार पतले दस्त गड़गड़ाहट के साथ आते हो और दिन या रात के किसी अन्य समय दस्त नही आते हो। जब दस्त की हाजत होती हो तभी उसे शौचालय में भागना पड़ता हो । उसे ऐसा प्रतीत होता हो कि वह दस्त को रोक ही नही सकता । इन सभी लक्षणों के होने पर उसे 10 बजे ऐलो 200 की एक खुराक दी जाती हैं । यह खुराक तब दी जाती हैं, जब रोग का वेग शान्त हो । 

यह जिगर के रोग की मुख्य औषधि हैं - होम्योपैथिक में ऐलो को जिगर के रोग की मुख्य औषधि माना गया हैं । यह औषधि लिवर के रोगों की तीव्रता को कम कर देती हैं, और इसके बाद इसकी अनुपूरक औषधि सलफर , कैली बाईक्रोम या सीपिया देने से रोग जड से खत्म हो जाता हैं । ऐलो , सलफर की तरह गहरी औषधि नही है , परन्तु एकोनाइट और बैलेडोना की तरह बिल्कुल अल्पकालिक भी नही है । यह दोनो के बीच की दवा है । 

ऐलो व नक्स वोमिका की तुलना – नक्स वोमिका में शौच जाने की बार - बार इच्छा होती हैं, क्योंकि आंते शौच को एक बार में नहीं निकाल सकती , ऐलो में इसके विपरीत आंते शौच को रोक नही सकती।  नक्स मे गुदा की सकोचक मांसपेशिया उत्तेजित रहती हैं, इसलिए शौच बार-बार आता हैं। ऐलो में यह मांसपेशिया शिथिल होती हैं । जो शौच को रोक नही पाती हैं। 

ऐलो और सलफर में तुलना - ऐलो तथा सलफर में गहरा सम्बन्ध हैं । दोनों में प्रात: बिस्तर से उठते ही शौच के लिये भागना पड़ता है , दोनों में पेर जलते हैं और दोनों में त्वचा में गर्मी होती हैं। दोनों में अंतर यह हैं, कि ऐलो का रोगी खाना खाते ही शौच के लिए दौड़ता हैं, जबकि सलफर का रोगी उठते ही शौचालय के लिए दौड़ता हैं । 

एलो औषधि के अन्य लक्षण- जब किसी रोग में औषधि की अधिक मात्रा देने से औपधि के लक्षण रोग में घुल  मिल जाए और समझ न आए कि ये लक्षण किस औषधि के हैं । तो वहाँ ऐलो से उपचार करने पर लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं । नक्स और सलफ़र भी इस दिशा मे उपयुक्त काम ककती हैं । 

एलो औषधि की शक्ति व प्रकृति - गुदा प्रदेश के रोग में 3 शक्ति की कुछ मात्रा देकर इन्तिज़ार करना चाहिये। अन्य रोगों मे 30 , 200 शक्ति की दवा दी जाती हैं । यह औषधि उष्ण प्रधान प्रकृति की हैं। 


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