रविवार, 11 अक्तूबर 2020

एसक्यूलस ( AESCULUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग और गुण व फायदें

एसक्यूलस ( AESCULUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग और गुण व फायदों का तुलनात्मक विश्लेषण विस्तार से जाने-

  • मलद्वार शिराओं में रक्त - संचय , ( बवासीर में, गले , पेट , फेफड़े , आँख आदि को शिराओं में रक्त संचय से फूला हुआ अनुभव करना
  • कमर के नीचे की हड्डी में दर्द ( त्रिकास्थि ) जिसे चिनका पड़ जाना कहते हैं 
  • दर्द का स्थान परिवर्तन होना

एसक्यूलस औषधि की प्रकृति- लक्षणों में कमी- बवासीर का खून निकलने और ठह से रोग के लक्षणों कमी आती हैं। लक्षणों मे वृद्धि - प्रात काल रोग का बढ़ना, ठंडी हवा मे सास लेने,  शौच या पेशाब के बाद और हिलने - डुलने तथा घूमने से लक्षणों में वृद्धि होती हैं ।

मलद्वार की शिराओं में रक्त संचय ( बवासीर ) - मानव शरीर मे दो प्रकार की रक्त वाहिनियाँ होती है - 'धमनिया और शिराएँ ' । धमनियों मे शुद्ध  रक्त बहता हैं और शिराओ मे अशुद्ध रक्त । यह रक्त पहले हृदय मे इकट्ठा होता है , वहा से शुद्ध होने के लिये फेफडों में जाता है, वहा से ऑक्सीजन लेकर व शुद्ध होकर फिर हृदय में आ जाता हैं और वहा से धमनियों द्वारा पुन शरीर में संचार करता है । जब शरीर की मांसपेशियाँ ढीली पड़ जाती हैं, तब शिराओं में कमजोरी आ जाती है। और जहाँ शिराओं का समूह अधिक तौर से होता है, वहाँ अशुद्ध रक्त ले जाने वाली इन शिराओं मे अशुद्ध रक्त इकट्ठा होता है । अशुद्ध रक्त के एक स्थान पर इसी सचय को ' शिरा रक्त संचय '  कहते हैं । इसी ' शिरा रक्त संचय ' से बवासीर की उत्पत्ति होती है । 

बवासीर दो प्रकार की होती है- बादी बवासीर और खूनी बवासीर। यह औषधि बादी बवासीर में अधिक उपयोगी है । बवासीर मे कभी खून आता है और कभी नही आता । एसक्यूलस बादी बवासीर में , जिसमे खून नही आता उसमें अधिक कारगर होती है । परन्तु खूनी बवासीर में भी यह लाभदायक होती है । इस दवा का कार्य क्षेत्र अधिक विस्तृत नही है , परन्तु बवासीर तथा जहाँ - जहाँ शिराओ मे रक्त संचय की शिकायत हैं, वहाँ - वहाँ इसका कार्य निस्मन्दिग्ध हैं । क्योंकि एसक्यूलस का प्रभाव ' शिराओ ' पर होता है इसलिये जहाँ - जहाँ लाल - नीले रंग का रुधिर दिखे , बवासीर के मस्सो में , घाव में या कही भी , वहाँ वहाँ यह औषधि उपयोगी है । 

खूनी बवासीर में कोलिनसोनिया उत्कृष्ट औषधि है । कोलिनसोनिया से लाभ होने के बाद जो कुछ शेष रहता है, उसे एसक्यूलस पूरी तरह ठीक कर देती है । इसी प्रकार नक्स वोमिका तथा सल्फर से जब रोग मे कमी आ जाए, और बवासीर मे पूरा लाभ न हो , तब एसक्यूलस बचे हुए रोग को ठीक कर देती है । 

रक्त - संचय के कारण किसी अंग में भारीपन - रक्त संचय से भारीपन इस औषधि का विशेष लक्षण है। बवासीर में गुदा की शिराओं मे नीला रक्त संचित हो जाता हैं, इसलिये वहाँ पर रोगी को भारीपन का अनुभव होता है। मलद्वार में भारीपन अनुभव करना इस औषधि का विशेष लक्षण है । 

मलद्वार में तिनके जैसी चुभन का अनुभव होना - मलद्वार नीचे की ओर होता है , इसलिए शिराओं में संचित अशुद्ध रक्त ऊपर की तरफ नही लौटता , तब रोगी को चुभन अनुभव होती है । जिन व्यक्तियों की रुधिर नाड़ियाँ अधिक फूली होती है , उन्हें विशेष तौर से ऐसी चुभन अनुभव होती हैं । 

एसक्यूलस तथा नाइट्रिक एसिड की तुलना - इस औषधि में गुदा मे तिनके जैसी चुभन का अनुभव होता हैं जबकि नाइट्रिक एसिड में शौच करते समय ऐसा अनुभव होता हैं, जैसे गुदा मे कही हड्डी का टुकडा चुभ रहा हो । एसक्यूलस में शौच करने के कुछ घंटे बाद चुभन का दर्द होता है , जबकि नाइट्रिक एसिड मे शौच करते समय और शौच करने के कई घंटे बाद तक यह चुभन का दर्द रहता है । नाइट्रिक एसिड का लक्षण खूनी बवासीर होती है ,जबकि एसक्यूलस का लक्षण नीले रग के बाहर निकले हुए बड़े मस्से होते हैं, जिनमे चाकू से काटने जैसा दर्द होता है । इसमे रोगीं न खड़ा रह सकता हैं , न लेट सकता है , न ही बैठ सकता है ।

मुख, गले, पेट, फेफडे और आँख की शिराओं में फूलापन अनुभव करना - जैसे गुदा की शिराओं में रक्त संचय से फूलापन अनुभव होता है , वैसे मुख की या गले की शिराओं में भी रक्त - संचय के कारण फूलापन अनुभव होता है। इसी प्रकार का अनुभव पेट, हृदय और फेफड़ों में प्रतीत होता हैं। गला नीली शिराओं से भरा दिखना और आँखो की शिराओं में सूजन अर्थात उनमें रक्त संचय से कष्ट उत्पन्न हो जाता हैं। उसके लिये एसक्यूलस बहुत ही उत्तम औषधि हैं। 

कमर के नीचे की त्रिकास्यि में दर्द ( चिणक पड़ना ) - इस औषधि की मुख्य क्रिया गुदा व पीठ के नीचे के स्थान में होती हैं , जिसे त्रिकास्थि कहते हैं । त्रिकास्थि का स्थान रीढ़ की अंतिम हड्डी के ठीक ऊपर होती हैं। चलने - फिरने , हिलने - डुलने तथा झुकने से कमर के नीचे इस हड्डी मे दर्द बढ़ जाना इस औषधि का विशिष्ट लक्षण है । पीठ मे चिणक पड़ जाने पर यह औषधि उपयुक्त मानी जाती है । कमर दर्द की यह अतिउत्तम औषधि है । 

कमर के नीचे दर्द में एसक्यूलस तथा एगैरिकस की तुलना - कमर के नीचे दर्द दोनों औषधियों का लक्षण है , परन्तु एगैरिकस मे कमर दर्द बैठी हुई हालत में होता है और चलते - फिरने से चला जाता हैं । जबकि एसक्यूलस मे यह दर्द बैठी हुई हालत से उठने या झुकने या चलने फिरने से होता है । रोगी एक तरह का लंगड़ापन अनुभव करता है और यह अनुभव कूल्हे या टांग तक होता है । 

दर्द का स्थान परिवर्तित होना - इस औषधि में दर्द स्थान परिवर्तित करता रहता हैं । कभी - कभी ये दर्द स्नायु मार्ग पर होता हैं । पल्सेटिला तथा कैली कार्ब में भी दर्द इस तरह स्थान परिवर्तन करता  है । पल्सेटिला तथा एसक्यूलस दोनों ही ऊष्णता प्रधान औषधियाँ हैं , दोनों के रोगी ठंड को पसंद करता हैं और दोनों में ही दर्द स्थान परिवर्तन करता हैं। लेकिन दोनों औषधियाँ ऊष्णता  प्रधान होने पर भी रोगी दर्द की हालत में गर्मी को पसंद करता हैं। इसी प्रकार सिकेल का रोगी भी ऊष्णता प्रधान होता है लेकिन ठंड को पसन्द करता है जबकि  दर्द की हालत में गर्मी चाहता है । कैम्फर का रोगी भी दर्द की हालत में बंद कमरा चाहता है , परन्तु दर्द कम होते ही कपड़े उतार देता है । रोगी का ऊष्णता प्रधान होने के कारण ठंड को पसंद करना ' व्यापक ' लक्षण है , और दर्द की हालत में गर्मी पसंद करना ' एकागी ' लक्षण है । इन लक्षणों में यह व्यापक उचित औषधि हमें

एसक्यूलस मे गुदा के लक्षणों की प्रधानता होती है और पल्सेटिला मे पेट के लक्षणों की प्रधानता होती है । पल्सेटिला की स्त्री मोटी होती है और सिकेल की स्त्री पतली, दुबली , व झुरियो वाली होती है । सिकेल का रोगी ठंड चाहता है , कैम्फर का रोगी भी ठंड चाहता है , परन्तु जब कैम्फर का रोगी कपड़े उतार फेंकता है तब उसे फिर ठंड लगने लगती है । और जब वह कपड़े से अपने को ढ़क लेता है तब उसे एकदम गर्मी लगने लगती है । 

इस औषधि के अन्य लक्षण 

ठंडी हवा से नाक में जुकाम लगना -  ऐसा जुकाम जो आर्सनिक के लक्षणों मिलता हो , जिसमें पतला , पनीला , जलन वाला जुकाम हो और ठंडी हवा में सास लेने से जो नाक मे लगता हो तो ऐसे जुकाम में यह एसक्यूलस उपयोगी औषधि है । 

प्रदर की समस्या में जब कमर कमजोर अनुभव हो, चलने मे टागें थकी - थकी महसूस हो और थोडी दूर चलने मे ही भारीपन प्रतीत हो , तो ऐसे प्रदर को यह औषधि ठीक करती है । 

एसक्यूलस औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - एसक्यूलस औषधि 3, 6, 30 की शक्ति में उपलब्ध है। ( यह औषधि उष्ण प्रधान हैं ) 

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