रविवार, 18 अक्तूबर 2020

ऐलो ( ALOE )औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें

ऐलो ( ALOE )औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें- पेट व आंत्र रोग में लाभप्रद होती है।

  • खाने के तुरत बाद शौच की इच्छा या वेग  
  • गुदा प्रदेश में भारीपन अनुभव होना 
  • वायु ( गैस ) या मूत्र के साथ शौच निकलना 
  • कठिन मल का स्वंय निकल पड़ना 
  • गाढ़ी आंव का निकलना तथा बवासीर
  • डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट होना 
  • बीयर पीने से डायरिया होना 
  • यह जिगर के रोगों की मुख्य औषधि हैं 
  • एलो, नक्स वोमिका व सलफर की तुलना 

एलो औषधि की प्रकृति- इस औषधि में खुली हवा में रहने से, ठंड में रहने से और पाखाने के बाद लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि खाने पीने के बाद, गर्मी से, गर्म मौसम से, नम मौसम से, प्रात काल 2 बजे से 9 बजे तक और सवेरे बिस्तर से उठने पर रोग के लक्षणों में वृद्धी होती हैं । 

खाना खाने के तुरत बाद शौच की इच्छा अथवा वेग- गुदा प्रदेश में ऐसी मांसपेशियाँ होती हैं, जिन्हें सकोचक मांसपेशियाँ कहते हैं । सकोचक मांसपेशियों का काम मल को बाहर निकलने से रोकना हैं । ऐलो औषधि के रोगी की सकोचक मासपेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। इसलिए रोगी खाना खाते ही या पानी पीते ही शौच का वेग बनता हैं । और नह शौच का वेग धारण नही कर सकता और शौचालय जाना पसंद करता हैं। प्राय: देखा जाता हैं कि शौचालय में पहुंचने से पहले ही शौच निकल पड़ता हैं। इस लक्षण में यह औषधि लाभ पहुँचाती है।

गुदा प्रदेश में भारीपन अनुभव करना - गुदा प्रदेश की सकोचक मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, इस कारण ज़रा सा भी मल इकट्ठा हो जाने पर रोगी को भारीपन अनुभव होता हैं। और उसका घ्यान उधर ही अटका रहता हैं, क्योकि उसे डर रहता हैं, कि कही मल अपने आप बाहर न निकल पड़े। तो यह औषधि दी जाती हैं ।

वायु या मूत्र के साथ शौच का निकलना - रोगी के पेट से जब अपान वायु का अपसरण होता हैं, या जब भी पेशाब करते वक्त या पेट से हवा निकलने के साथ शौच भी निकल पड़ता है । इसका मुख्य का कारण गुदा की सकोचक मांसपेशियों की कमजोरी हैं। इस अवस्था में यह औषधि कारगर साबित होती हैं ।

कठिन मल का अनायास या स्वंय ही निकल पड़ना - कभी - कभी बच्चों को पता ही नहीं चलता कि उसका कठिन मल अनायास ही बिस्तर में निकल पड़ा हैं । इस लक्षण में बच्चों को 200 शक्ति की ऐलो दी जाती हैं । और उसका कब्ज़ का रोग ठीक हो जाता हैं । 

गाढ़ी आव का निकल पडना तथा बवासीर - इस औषधि का रोगी जब शौच जाता हैं , तो कभी - कभी शौच से पहले एक जेली के समान गाढ़ी आव निकलती हैं । यह आव आंत के निचले हिस्से में जमा होती रहती है और या तो शौच इस आव से लिपटा रहता हैं, या सिर्फ़ आव ही निकलती है । आव निकलने के बाद गुदा में जलन होती हैं । 

बवासीर - गुदा प्रदेश मे भारीपन का अनुभव होना ऐलो के हर रोग मे पाया जाता हैं । यह भारीपन शौच के एकत्रित हो जाने से हो जाता हैं, या गुदा प्रदेश में आव के इकट्ठा हो जाने से हो सकता हैं, या बवासीर से भी हो सकता हैं । ऐलो में बवासीर के मस्से आव से सने रहते हैं क्योकि गुदा प्रदेश में एकत्रित आव सकोचक पेशियो की शिथिलता के कारण बाहर रिसती रहती हैं। और इन मस्सों को भिगोती रहती है । इस बवासीर मे खुजली बहुत रहती है , इन मस्सों में स्पर्श असहिष्णुता होती हैं , और ठंडे पानी से मस्सों को धोने पर रोगी को आराम मिलता है । 

बवासीर के मामले में ऐलो, ब्रोमियम और म्यूरियेटिक एसिड से तुलना-  ब्रोमियम के मस्सों पर मुख का सेलाइवा लगाने से आराम मिलता हैं।  और म्यूरियेटिक एसिड की बवासीर में गरम पानी से आराम मिलता हैं जबकि ऐलो में ठंडे पानी से आराम मिलता हैं। 

बवासीर के रोग में अन्य मुख्य औषधियाँ 

>> नक्स वोमिका व सलफर - प्रात: काल में सलफर 30 और सूर्यास्त के समय सोने से 3 घंटे पहले नक्स वोमिका 30 देने से प्राय बवासीर का रोग दूर हो जाता है । जैसे मेहनत न करना , बैठे रहना , घी तथा चटपटे पदार्थ खाने से बवासीर होती हैं, तो नक्स वोमिका ज्यादा फायदा करती हैं। और पुरानी बवासीर ( खून रहे या न रहे ) में सलफ़र ज्यादा फायदा करती है । 

>> एकोनाइट तथा हैमेमेलिस- बवासीर में केवल खून निकलने के लक्षण में ऐकोनाइट अथवा हैमेमेलिस दिया जाता है । 

>> एसक्यूलस-  बादी बवासीर में जब अशुद्ध रक्त से यानि शिरा शोथ से मस्से बन जायें तो एसक्यूलस दी जाती हैं।

>> कोलिनसोनिया - एसक्यूलस की तरह इसमें भी गुदा में तिनके चुभने जैसा अनुभव होता हैं, परन्तु एसक्यूलस बादी में और कोलिनसोनिया खूनी बवासीर में दी जाती हैं । एसक्यूलस में कब्ज कम रहती, कोलिनसोनिया में बवासीर के साथ कब्ज़ भी होती हैं । 

>> म्यूरियेटिक एसिड - इसके लक्षणों में मस्से नीले रंग के होते हैं,और उनमें इतनी स्पर्श असहिष्णुता होती हैं, कि बिस्तर की चादर का स्पर्श भी सहन नहीं होता और गरम पानी से धोने पर आराम मिलता हैं। ऐलो में ठंडे पानी से धोने पर आराम मिलता हैं । 

>> आर्सनिक - तेज जलन और बवासीर के मस्सों में से गर्म सूई निकल रही हो । मस्से बाहर निकलना और सैक करने से आराम मिलता हैं । 

>> रेटनहिया - पाखाना फिरने के बाद पूरे मलद्वार में असहनीय जलन और पाखाना शिथिल होने पर भी जलन होती हैं और मस्से बाहर आ जाते हैं। उक्त लक्षणों के साथ अन्य लक्षणों को मिलाकर यह औषधि दी जाती हैं । 

डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट होना- अगर डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट के जैसा लक्षण जैसे बोतल में से पानी गड़गड़ कर रहा हैं, तो यह ऐलो का विशेष लक्षण हैं। यदि दस्त के साथ गड़गड़ाहट न रहे, तो ऐलो कारगर लाभप्रद होती हैं । पोड़ोफाइलम में मी गड़गड़ाहट रहती हैं, परन्तु उसमें दस्त मध्याह्न से पूर्व बन्द हो जाते हैं। 

बीयर पीने से डायरिया होना- जो लोग बीयर पीने के आदी होते हैं, उन्हें प्राय डायरिया हो जाता हैं । तो ऐसे व्यक्तियों को ऐलो बहुत लाभ पहुंचाती है । कभी - कभी ऐलो से लाभ न हो तो केली बाईक्रोम इस अवस्था मे उपयोगी सिद्ध होती है । 

जब डायरिया के रोगी को जिसे कैलेकेरिया , नक्स वोमिका, ब्रायोनिया और आर्सनिक आदि से कोई लाभ नही हुआ हो । उसके सभी लक्षणों को ध्यान में रखते हुए पता करे कि उसे जब दस्त आता था तब पेट में जोर से गड़गड़ाहट तो नही होती और दस्त का वेग प्रबल तो नही । जिससे वह सवेरे तीन बजे निद्रा से उठ बैठता हो । तीन बजे से नौ बजे तक उसे चार से पाँच बार पतले दस्त गड़गड़ाहट के साथ आते हो और दिन या रात के किसी अन्य समय दस्त नही आते हो। जब दस्त की हाजत होती हो तभी उसे शौचालय में भागना पड़ता हो । उसे ऐसा प्रतीत होता हो कि वह दस्त को रोक ही नही सकता । इन सभी लक्षणों के होने पर उसे 10 बजे ऐलो 200 की एक खुराक दी जाती हैं । यह खुराक तब दी जाती हैं, जब रोग का वेग शान्त हो । 

यह जिगर के रोग की मुख्य औषधि हैं - होम्योपैथिक में ऐलो को जिगर के रोग की मुख्य औषधि माना गया हैं । यह औषधि लिवर के रोगों की तीव्रता को कम कर देती हैं, और इसके बाद इसकी अनुपूरक औषधि सलफर , कैली बाईक्रोम या सीपिया देने से रोग जड से खत्म हो जाता हैं । ऐलो , सलफर की तरह गहरी औषधि नही है , परन्तु एकोनाइट और बैलेडोना की तरह बिल्कुल अल्पकालिक भी नही है । यह दोनो के बीच की दवा है । 

ऐलो व नक्स वोमिका की तुलना – नक्स वोमिका में शौच जाने की बार - बार इच्छा होती हैं, क्योंकि आंते शौच को एक बार में नहीं निकाल सकती , ऐलो में इसके विपरीत आंते शौच को रोक नही सकती।  नक्स मे गुदा की सकोचक मांसपेशिया उत्तेजित रहती हैं, इसलिए शौच बार-बार आता हैं। ऐलो में यह मांसपेशिया शिथिल होती हैं । जो शौच को रोक नही पाती हैं। 

ऐलो और सलफर में तुलना - ऐलो तथा सलफर में गहरा सम्बन्ध हैं । दोनों में प्रात: बिस्तर से उठते ही शौच के लिये भागना पड़ता है , दोनों में पेर जलते हैं और दोनों में त्वचा में गर्मी होती हैं। दोनों में अंतर यह हैं, कि ऐलो का रोगी खाना खाते ही शौच के लिए दौड़ता हैं, जबकि सलफर का रोगी उठते ही शौचालय के लिए दौड़ता हैं । 

एलो औषधि के अन्य लक्षण- जब किसी रोग में औषधि की अधिक मात्रा देने से औपधि के लक्षण रोग में घुल  मिल जाए और समझ न आए कि ये लक्षण किस औषधि के हैं । तो वहाँ ऐलो से उपचार करने पर लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं । नक्स और सलफ़र भी इस दिशा मे उपयुक्त काम ककती हैं । 

एलो औषधि की शक्ति व प्रकृति - गुदा प्रदेश के रोग में 3 शक्ति की कुछ मात्रा देकर इन्तिज़ार करना चाहिये। अन्य रोगों मे 30 , 200 शक्ति की दवा दी जाती हैं । यह औषधि उष्ण प्रधान प्रकृति की हैं। 


शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

एलियम सीपा ( ALLIUM CEPA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें

एलियम सीपा  ( ALLIUM CEPA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदों का विश्लेषण-

  • शरीर की आन्तरिक झिल्ली का नवीन प्रदाह, जुकाम, नाक और आँख से पानी बहना 
  • जुकाम के कारण सिरदर्द 
  • ठंडे पानी से भीगने, कच्ची सब्जी व सलाद खाने से पेट दर्द 
  • कान का दर्द 
  • लम्बे डोरे की तरह होने वाला शियाटिका का दर्द 
  • किसी अंग के कटने के बाद नसों में दर्द होना

एलियम सीपा की प्रकृति- इस औषधि में ठंडे कमरे व खुली हवा मे रहने से रोग में कमी होती है। और बंद गरम कमरे व सांयकाल को रोग में वृद्धी होती है। 

शरीर के अगों की आन्तरिक झिल्ली का नवीन प्रदाह, जुकाम, नाक और आंख से पानी बहना - एलियम सीपा प्याज से बनी औषधि हैं। जब भी कच्चा प्याज को काटा जाता हैं, तब उसके रस से नाक तथा आँख से जुकाम की तरह पानी बहने लगता हैं। होम्योपैथिक के अनुसार जो औषधि जिन लक्षणों को स्वस्थ मनुष्य मे उत्पन्न करती हैं, उसी रोग में उन लक्षणों के विद्यमान होने पर सूक्ष्म मात्रा में देने से उन लक्षणों को दूर कर देती हैं। 

>> नाक से बहने वाला पानी, जिस स्थान पर बहे वही पर लगना इसका मुख्य लक्षण हैं- इसके जुकाम का मुख्य लक्षण यह हैं, कि नाक का पानी होटों पर बहता है वही लग जाता हैं, जलन पैदा करता हैं, और उस जगह को लाल कर देता हैं। इसमे आँख से भी पानी निकलता हैं, परन्तु नाक का पानी लगता हैं, आँख से निकलने वाला पानी गाल पर लगता नहीं। जुकाम में इसकी तुलना युफ्रेशिया से की जा सकती हैं। 

>> एलियम सीपा का जुकाम नाक पर लगता हैं, आँख पर नहीं, जबकि युफ्रेशिया का जुकाम आँख पर लगता हैं, नाक पर नहीं - एलियम सीपा और युफ्रेशिया दोनो के जुकाम मे आँख तथा नाक दोनो से पानी बहता हैं, परन्तु दोनो में यह प्रक्रिया विपरीत होती हैं। एलियम सीपा के जुकाम का पानी नाक पर चिरमिराता हैं, आँख का पानी आँख को नहीं चिरमिराता, जबकि युफ्रेशिया के जुकाम का पानी आँख को चिरमिराता हैं, नाक को नहीं । 

>> जुकाम का बाई नाक से शुरू होकर दाई तरफ जाना - एलियम सीपा का जुकाम बाई नाक की तरफ से शुरु होता हैं और उसमें चिरमिराने वाला पानी बहता हैं, नाक भर जाती हैं, और लगभग 24 घंटों के भीतर यह हालत दायी तरफ हो जाती हैं। 

जुकाम के कारण सिर दर्द -  इसका रोगी खुली हवा और ठंड पसन्द करता हैं। जबकि बन्द कमरे में उसकी शिकायतें बढ़ जाती हैं, और सांयकाल में भी उसके रोग में वृद्धि होती हैं। इसके कारण एलियम सीपा के रोगी को जुकाम के साथ सिर दर्द भी होता हैं। इसी सिर दर्द के कारण रोगी ठंडी हवा पसन्द करता हैं। और गरम कमरे में आते ही उसका सिर दर्द फिर से शुरू हो जाता हैं । युफ्रेशिया और पल्सेटिला में भी गरम कमरे में तकलीफे बढ़ जाती हैं। परन्तु युफ्रेशिया के जुकाम में पनीला जुकाम और आँख में चिरमिराहट होती हैं, जबकि पल्सेटिला के जुकाम में पीला, गाढ़ा जुकाम होता हैं । 

मासिक धर्म के शुरुआत में सिर दर्द में आराम और अंत में वापिस सिर दर्द शुरू होना- स्त्रियों में  मासिक धर्म शुरु होने पर सिर दर्द बन्द हो जाता हैं, और मासिक धर्म बन्द होने पर सिर दर्द फिर शुरु हो जाना एलियम सीपा का लक्षण हैं। लैकेसिस और जिंकम में भी यह लक्षण पाया जाता हैं। लैकेसिस का इस लक्षण के साथ मुख्य लक्षण सोने के बाद तकलीफ़ का बढ़ जाना हैं, और जिंकम का मुख्य लक्षण स्नायु रोग और मेरुदण्ड के रोगों से पीड़ित होना हैं । वैसे लैकेसिस तथा जिंकम मेटेलिकम में रजोधर्म शुरु होने पर सिर दर्द या अन्य दर्द ठीक हो जाते हैं । सिर्फ इस एक लक्षण पर औषधि का निर्णय कर देना उचित नही हैं । होम्योपैथिक में रोगी के अधिक से अधिक लक्षण, औषधि के अधिक से अधिक लक्षणों के साथ मिलने चाहिए, यही औषधि के चुनने का उचित प्रकार है । 

ठंडे पानी से भीगने, अधिक खाने , कच्ची सब्जी या सलाद खाने से पेट दर्द - पैर के भीग जाने से कभी - कभी ठंड लग जाने पर पेट दर्द हो जाता हैं,और अधिक खाने से या खीरा तथा अन्य कच्ची सब्जी खाने से पेट दर्द हो जाता हैं। यदि बैठे रहने से यह दर्द बढ़ता हैं, और घूमने - फिरने से घटता हैं , तो एलियम सीपा उत्तम व कारगर औषधि हैं। 

कान का दर्द - कान के दर्द में तीन प्रकार की औषधि जैसे- एलियम सीपा, पल्सेटिला , कैमोमिला । यदि जुकाम की वजह से कान में दर्द हो, तो एलियम सीपा इस दर्द को शान्त कर देती हैं । यह औषधि कान के दर्द में अति लाभप्रद मानी जाती हैं । पल्सेटिला कर्ण शूल की प्रसिद्ध औषधि हैं, इसका कान के साथ विशेष महत्व हैं। जब बच्चा तेज कान के दर्द से कराह रहा हो, तो ऐसे कोमल स्वभाव वाले बच्चों के कान के दर्द में पल्सेटिला अद्भुत काम करती हैं । जो बच्चे में कान के दर्द से चिड़चिड़ापन हो, तो उनके लिये  कैमोमिला उपयुक्त औषधि मानी गई हैं।  

लम्बे डोरे की तरह होनेवाला शियाटिका का दर्द - चेहरा , सिर , गर्दन और छाती में कभी - कभी स्नायु ( नस ) में दर्द होता हैं, जो लम्बे डोरे की नस की तरह प्रतीत होता हैं। इस तरह का दर्द शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है । 

किसी अंग के कटने के बाद नसों में दर्द -यदि किसी कारणवस शरीर का कोई अंग कट जाता हैं या काटना पड़ जाता हैं , तो कभी - कभी किसी भी नस में भयंकर शूल हो जाता है, असहनीय वेदना होती हैं। यह औषधि ऐसे दर्द में लाभप्रद होती अर्थात दर्द को शान्त कर देती है । 

एलियम सीपा औषधि के अन्य लक्षण -

>> यदि रोगी को कच्चा प्याज खाने की तीव्र इच्छा हो, दूसरा कोई पौष्टिक आहार न ले सके, तो यह भी इस औषधि का एक लक्षण हैं । 

>> ऐसी खाँसी जिसमे रोगी खाँसते - खाँसते गला पकड़ लेता हैं और महसूस करता हो कि गला अन्दर से पका पडा है। तो यह औषधि लाभ पहुँचाती है।

एलियम सीपा औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - यह एकोनाइट की तरह थोड़ी देर काम करने वाली ' स्वल्प कालिक ' औषधि है । यह 3, 6, 30 और अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं और यह उष्ण प्रधान प्रकृति की औषधि हैं।


सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा ( AILANTHUS GLANDULOSA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, गुण व फायदें

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा ( AILANTHUS GLANDULOSA )  व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा गुण व फायदों का विस्तार से विश्लेषण-

  1. स्कारलेटीना, गले के रोगों व दाने न उभरने के रोगों में 
  2. मीजल्स ( छोटी चेचक ) या डिफ्थीरिया रोग में 

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा प्रकृति - इस औषधि की प्रकृति यह हैं कि गर्म पानी या गर्म पेय पीने पर रोग के कमी लक्षणों में और होती हैं । और दाने न उभरने की स्थिति में रोग में वृद्धि होती हैं ।

स्कारलेटीना- गले के रोगों में व दाने न उभरने के रोगों में - स्कारलेटीना एक संक्रामक फैलने वाला रोग हैं । स्कारलेटीना रोग में त्वचा पर नारंगी रंग के दाने उभर आते हैं, और साथ ही हल्का या गंभीर ज्वर भी होता हैं। रोगी तन्द्रा में रहता है , डिलीरियम भी हो जाता हैं, गला सूज जाता हैं, और अन्दर से काला और नीला दिखता हैं, टाँसिल बढ़ जाते हैं और उनमे से बदबूदार पतला पस निकलता है । तो रोगी को यह औषधि दी जाती हैं ।

स्कारलेट - ज्वर तीन प्रकार का होता है । 

पहला -रोग के प्रथम प्रकार को ' Scarlatina Simplex ' कहते है , क्योंकि यह रोग की साधारण अवस्था है। कभी यह  बहुत हल्का होता हैं, दाने आसानी से निकल आते हैं और ज्वर भी अधिक नहीं होता हैं। रोगी की अच्छी देखभाल करने व उसे गर्म कमरे में रखने से वह बिना औषधि के स्वयं ठीक हो जाता है । 

दूसरा - रोग के दूसरे प्रकार को ' Scarlatina Anginosa ' कहते है , क्योंकि यह विशेषकर गले पर आक्रमण करता है ,इसमें त्वचा लाल , कोमल और चमकदार होती हैं । यह रोग भयंकर रुप धारण नहीं करता हैं। इसमें ज्वर न होकर भी अधिक कष्टकर होता है । इममें कष्ट गले में होता हैं, और गला अन्दर से  सूज जाता हैं और दर्द करता हैं। इसके साथ ही दाने बहुत कम निकलते हैं, मेरुदण्ड के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, कमर और गर्दन में दर्द होता हैं।

तीसरा - रोग के तीसरे प्रकार को ' Scarlatina Maligna ' कहते हैं, जिसमें गला भीतर से गंभीर  रूप से सूज जाता है , और रूधिर के विषाक्त होने के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, टाँसिल सूज जाते हैं , त्वचा फूल जाती है , दुर्गन्ध आने लगती है और दाने बहुत कम या न के बराबर होते हैं । अगर तीसरे प्रकार के स्कारलेट ज्वर का उपचार ठीक से न हो सके तो रोगी मर भी सकता है । यह रोग की अत्यन्त भयकर अवस्था है । 

तीसरे प्रकार के स्कारलेटीना की अन्य औषधि - अगर त्वचा पर स्कारलेटीना के दाने हो, तो त्वचा को अँगुली से दबा कर देखे । और दबा कर अँगुली हटाने के बाद त्वचा सफेद बनी रहे, और वह स्थान रूधिर से भरने में  बहुत समय लगाये, तो वह तीसरे प्रकार का भयंकर स्कारलेटीना हैं। इस अवस्था में एलेन्थस ग्लेंडुलोसा का प्रयोग अत्यन्त लाभप्रद होता हैं । त्वचा पर दाने न उभरना , गले में भयंकर रूप से टाँसिल का सूज जाना, उसका रंग नीला हो जाना, रोग का डिफथीरिया जैसा रूप हो जाना, रोगी का अत्यंत कमजोर हो जाना । ये सभी लक्षण एलेन्थस ग्लेंडुलोसा औषधि के है, चाहे वह स्कारलेटीना हो या नही।

स्कारलेटीना में अन्य औषधियों में तुलना - रोगीं के लक्षणों को देखकर यह नही समझना चाहिये कि उसे स्कारलेटीना है ।  रोगी के दाने एकोनाइट के हो सकते हैं , परन्तु एकोनाइट मे इतनी अधिक सड़न नही होती ।  ये दाने बैलेडोना के हो सकते हैं, परन्तु बैलेडोना  के दाने चमकदार और चिकने होते हैं। ये दाने एलेन्थस ग्लेंडुलोसा के हो सकते हैं, एलेन्थस ग्लेंडुलोसा का प्रयोग उस हालत में किया जाता हैं। जब दाने न उभर कर गले मे भयंकर टाँसिल हो, मस्तिष्क में डिलोरियम हो और अत्यधिक ज्वर हो ये सभी इस रोग की तीसरी अवस्था को उत्पन्न कर देते हैं । 

मीजल्स ( छोटी चेचक ) या डिफथीरिया -  छोटी चेचक में जब रोग बिगड जाता है , दाने नहीं निकलते या निकल कर एकदम दब जाते हैं या नीले पड़ जाते हैं, तब एलेन्थस ग्लेंडुलोसा अच्छा काम करती है । डिफथीरिया या अन्य गले की बीमारियो में इसको दिया जाता है । इसका उपयोग मुख्य रूप से उन बीमारियों में होता हैं, जिनमे दाने देर से निकलते हो या दाने न निकलें या निकल कर दब जायें, रोगी बेसुद पड़ा रहे, डिलीरियम में आ जाए, बैचेन रहे, चक्कर आते हो, जी मिचलना , उल्टी करे - इन सभी लक्षणों में यह औषधि लाभप्रद व कारगर होती है । 

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा औषधि की प्रकृति व शक्ति - यह औषधि 1,3,6,30 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं और यह शीत प्रधान औषधि हैं।


एब्रोटेनम ( ABROTANUM ) औषधी के व्यापक लक्षण , मुख्य रोग और उपयोग व फायदें

एब्रोटेनम ( ABROTANUM ) औषधी के व्यापक लक्षण , मुख्य रोग और फायदो को विस्तार से जानते है- 

बच्चे के सूके के रोग मे नीचे से सूकना - बच्चे के सूके के रोग मे इस औषधी की बहुत अधिक उपयोगिता है । इस औषधि के सूके में सब से पहले नीचे के अंगो मे दुबलापन आना शुरू होता है , सूकापन नीचे से ऊपर की तरफ बड़ता है । चेहरा सब से बाद में सूकने लगता है और एब्रोटेनम में सबसे पहले टांगे सूकनी शुरू हैं , ऊपर का धड़ बाद मे सूकता है।

एक बीमारी के दबने से दूसरी बीमारी का हो जाना  - प्राय देखा जाता है कि जब एक बीमारी हटती है तब दूसरी बीमारी उठ खडी होती है । ऐसी स्थिति में  एब्रोटेनम औषधी लाभकारी होती है । इसे कुछ उदाहरणों से समझते हैं- 

  1. गठिये के रोगी को यदि पतले दस्त आते रहें तो दर्द कम हो जाता है और अगर कब्ज हो जाती हैं तो दर्द बढ़ जाता है। 
  2. कर्णमूल की सूजन दब जाने से पुरुषो मे पोते तथा स्त्रियो मे स्तन की सूजन हो जाती है । 
  3. मालिश द्वारा गठिये के दब जाने से दिल की तकलीफ हो सकती है । 
  4. गठिया या दस्त के ठीक होने पर बवासीर के लक्षण उभरने लगते हैं । 
  5. दस्त एकदम बन्द हो जानेे पर गठिया की शिकायत हो जाती है । 

एब्रोटेनम और पल्सेटिला मे भेद की पहचान - एक रोग के हटने पर दूसरे रोग के प्रकट हो जाने मे एब्रोटेनम और पल्सेटिला दोनो काम आते हैं , परन्तु इन दोनो मे भेद यह है कि जहा एब्रोटेनम मे एक रोग के दबने से दूसरा जो रोग पैदा होता है उसका पहले रोग से कोई सम्बन्ध नही होता , वहा पल्सेटिला से जो रोग दबा है वो दूसरे स्थान मे चला जाता है । उदाहरणार्थ - 

एब्रोटेनम मे दस्त दब कर गठिया हो सकता है , बवासीर हो सकती है , कर्णमूल की सूजन दब कर पोते बढ सकते हैं । इस प्रकार जो रोग पैदा हो जाता है उसे एलोपैथीक का एक नया रोग कहते हैं , परन्तु होम्योपैथीक  मे इसे नया रोग न कह कर पुराने रोग का ही रूपान्तर मानते हैं । पल्सेटिला मे गठिये का दर्द जब अपना स्थान बदलता है , तब एक जोड से दूसरे जोड मे चला जाता है , अगर सूजन है तो एक गिल्टी से दूसरी गिल्टी मे चली जाती है , अगर दर्द है तो एक अंग से दूसरे अंग मे चला जाता है । पल्सेटिला मे रोग वही रहता है , केवल स्थान बदलता है , एब्रोटेनम मे रोग अपना रूप ही बदल देता है , एलोपैथिक परिभाषा में पहला रोग दब कर एक नया रोग बन जाता है , यद्यपि होम्योपैथी के अनुसार वह नया रोग न होकर पुराने रोग का ही रूपान्तर होता है । 

इस औषधि का अन्य लक्षणों मे भी प्रयोग किया जाता है । 

बच्चों की अण्ड - वृद्धि मे यह औषधि लाभ देती है । बच्चो की नाक  से खून बहने को यह रोकती है मतलब बच्चो की नकसीर मे यह लाभप्रद औषधि है । 

एब्रोटेनम औषधि की प्रकृति व शक्ति - यह औषधि लगभग सभी शक्तीयों में उपलब्ध है, दवा का इस्तेमाल चिकित्सक की सलाह मे ही करे और और उचित शक्ति का सेवन करे ।    


एबिस नाइग्रा ( ABIES NIGRA ) के फायदे , व्यापक लक्षण तथा मुख्य रोग व फायदें

एबिस नाइग्रा  ( ABIES NIGRA ) के फायदे , व्यापक लक्षण तथा मुख्य रोग को विस्तार से जानते है -  

खाने के बाद पेट दर्द का बढ़ना - जिन व्यक्तियो का खाने के बाद पेट - दर्द बढ जाता है, उनके लिये यह अति उत्तम औषधि है । इसके विपरित एनाकाडियम औषधी मे खाने के बाद पेट - दर्द कम होता है । 

पेट के ऊपरी हिस्से मे उबले हुए अंडे जैसा अनुभव  - रोगी अनुभव करता है कि पेट के ऊपरी हिस्से में कोई अंडे जैसी चीज़ अटकी हुई है जो दर्द उत्पन्न करती है । ऐसा अनुभव होता है कि जो न तो बाहर आती है , न नीचे उतरती है , वही अटकी हुई है और भरीपन  का अहसास होता है । ' वक्षोस्थि ' के नीचे के भाग मे इस प्रकार की कोई चीज अटकी अनुभव हो , तो चायना औषधि से लाभ होता है । अगर ऐसा अनुभव हो कि जो - कुछ खाया है वह पेट के ऊपर के हिस्से मे अटका हुआ है , तो पल्सेटिला या ब्रायोनिया से लाभ होता है । 

वृद्ध व्यक्तियो की कमजोर पाचन क्रिया - वृद्ध - व्यक्तियो की कमजोर पाचन क्रिया की बीमारी के साथ हृदय रोग के लक्षण भी दिखाई देते है , तो इस औषधि का प्रयोग किया जाता है । इनकी बदहज़मी का कारण चाय अथवा तम्बाकू का अधिक सेवन हो सकता है । 

चाय तथा तम्बाकू के दुष्प्रभाव के लिए  - जो लोग चाय अथवा तम्बाकू का अधिक सेवन करते है वे  फलस्वरूप पेट की बीमारियो के शिकार हो जाते हैं , उन लोगों में अक्सर देखा जाता है कि वे उत्साहहीन रहते है , वे रात को ठीक से सो नहीं पाते । उन रोगियों के लिये यह औषधि बहुत ही उपयोगी होती है । 

प्रात काल भूख बिल्कुल न लगना और दोपहर या रात को तेज भूख लगना - जिन लोगो को प्रात काल के समय बिल्कुल भूख नही लगती , परन्तु दोपहर और रात को अधिक भूख लगती है और भोजन की अधिक खाने की इच्छा होती है , तो उन रोगियों लिये यह औषधी बहुत ही उपयोगी है । 

छाती मे जकडन व अटका हुआ अनुभव होना — छाती मे दर्द अनुभव होना , ऐसा प्रतीत होना कि छाती मे कुछ अटका हुआ है जो खासने से निकल जाना चाहिये । जैसे पेट में कुछ अटका - सा अनुभव होता है , वैसे छाती मे भी कफ - जैसी कोई चीज अटकी हुई अनुभव होती है । 

इस औषधि के अन्य लक्षण पीठ के नीचे के भाग मे दर्द, हड्डियो मे वात - रोग का दर्द, पुराना मलेरिया , ज्वर मे गर्मी - सर्दी का एक - दूसरे के बाद आना - जाना, रात को नीद न आना और साथ ही भूख लगना आदि लक्षणों में भी यह औषधी बहुत कारगर होती है।

एबिस नाइग्रा औषधि की शक्ति व प्रकृति - यह औषधी -1,6,30 पावर में उपलब्ध है। चिकित्सक इस औषधी में रोग की गम्भीरता को ध्यान में रखकर सही पावर की औषधि का इस्तेमाल करने की सलाह देते है। सही पावर की औषधी के लिए चिकित्सक की सलाह में औषधी का सेवन करे।


एबिस कैनेडेनसिस ( ABIES CANADENSIS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदे

एबिस कैनेडेनसिस ( ABIES CANADENSIS )  व्यापक - लक्षण तथा मुख्य - रोग व फायदों का विस्तार से विश्लेषण जाने -

  1. अजीर्ण , पाचन - क्रिया की गडबड़ , खरोच जैसी भूख लगना  , भूख से ज्यादा खा जाना 
  2. कमजोरी मे एबिस को जेलसी मियम से तुलना  
  3. दायें कंधे की फलकास्थि मे दर्द होना 
  4. जरायु का अपने स्थान से हटना 
  5. ज्वर मे ठंड और कंपन , कन्धो के बीच ठंड जैसा एहसास 
  6. बेहद कमजोरी होना 
  7. आचार व सलाद, गाजर , शलजम आदि खाने की तीव्र इच्छा 

एबिस कैनेडेनसिस औषधि के व्यापक लक्षण तथा मुख्य रोगों और फ़ायदों को विस्तार से जानते है । 

अजीर्ण , पाचन क्रिया की गडबडी , खरोचने जैसी भूख लगना , भूख से ज्यादा खा जाना - पाचन क्रिया पर इस औषधी का विशेष प्रभाव है । पेट मे खरोचने जैसी भूख लगती है और रोगी भूख से ज्यादा खा जाता है , उसे पता नहीं लगता कि उसने कितना खा लिया है । रोगी इतना खा जाता है कि पेट फूलने लगता  है । जिसके दबाव से हृदय की धड़कन तेज़ होने लगती है और पेट की गैस बनाने लगती है । जिससे  हृदय की गति क्रिया बाधा उत्पन्न होती है और हृदय - स्पदन होने लगता है । 

जरायु का अपने स्थान से हटना - जरायु के अपने स्थान से हटने पर इसका उपयोग लाभकारी होता है । जरायु मे अग्रभाग मे हल्का - हल्का सा दर्द अनुभव होता है जो दबाने से या चलने  के कारण   दबाव पडने पर कम हो जाता है । गर्भाशय कोमल तथा कमजोर अनुभव होता है । 

बेहद कमजोरी - रोगी बेहद कमजोरी अनुभव करता है । हर समय लेटे रहना पसंद करता है । इस प्रकार की कमजोरी के कारण रोगी सुस्त रहता है । यह सुस्ती जेलसीमियम मे भी पायी जाती है, परन्तु दोनो की कमजोरी तथा सुस्ती मे भेद होता है ।   

कमजोरी मे एबिस की जेलसीमियम से तुलना - इसकी कमजोरी तथा सुस्ती का कारण अधिक खाना और उसका शरीर मे न लगना है। जेलसीमियम की सुस्ती का कारण मासपेशियो की कमजोरी और उनकी शिथिलता होती है।

दायें कन्धे की फलकास्थि मे दर्द होना - इस औषधी का एक लक्षण यह भी है, कि दायें कन्धे की फलकास्थि मे दर्द होता है। चैलोडोनियम मे भी दायें कन्धे की फलकास्थि मे दर्द होता है। अगर दायें कन्धे की फलकास्थि के नीचे के बिन्दु मे दर्द का रोग पुराना है, तो लाइकोपोडियम से लाभ मिलता है । इस प्रकार का दर्द बायी फलकास्थि मे हो तो औग्जेलिक एसिड पर ध्यान देना चाहिये ।  

ज्वर में ठंड से कापना - ज्वर मे रोगी को कंधो के बीच ठंडे पानी  जैसा अनुभव होता है मानो नाडियो में बर्फ - सा ठंडा रुधिर बह रहा है । रोगी सर्दी से कापता है , हाथ तथा त्वचा ठंडी हो जाती हैं । पीठ में ऊपर से नीचे की तरफ ठंड चलती है और कन्धो के बीच ठंडे पानी का  अनुमव होता है । 

आचार , गाजर , शलजम खाने की तीव्र इच्छा - रोगी को आचार , गाजर , शलजम तथा मोटे अन्न खाने की ज्यादा इच्छा होती है । अगर किसी रोग मे बेहद कमजोरी हो , रोगी को ठंड लगे , खरोचने - जैसी भूख लगे , आचार - चटनी , गाजर - शलजम के खाने की तीव्र इच्छा हो , तो इस औषधि से लाभ होगा । 

इन लक्षणो और रोगो मे एबिस कैनेडेनसिस औषधि का सेवन उचित माना जाता है और किस शक्ति क उपयोग करना है उसके लिए चिकित्सक की सलाह लें । 

एबिस कैनेडेनसिस औषधि की प्रकृति - यह औषधि 6 , 30 , 200 और अधिक शक्ति मे उपलब्ध है । 


एगैरिकस ( AGARICUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा गुण व फायदें

एगैरिकस ( AGARICUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा गुण व फायदों को विस्तार से जानते हैं -

  • मांसपेशियों व विभिन्न अंगों का फड़कना 
  • मांसपेशियों में कम्पन्न , सोने पर कम्पन्न बन्द हो जाना 
  • शरीर पर चींटियों के चलने जैसा अनुभव होना 
  • वृद्धावस्था व अधिक मैथून से शारीरिक कमज़ोरी आना 
  • ठंड से त्वचा में सूजन आना 
  • चुम्बन की तीव्र इच्छा होना
  • मेरु दण्ड के रोग 
  • जरायु का बाहर निकलने जैसा अनुभव होना 
  • रोग के लक्षणों का तिरछा भाव 
  • क्षय रोग की प्रारंभिक अवस्था

एगैरिकस औषधि की प्रकृति -  शारीरिक श्रम करने व धीरे - धीरे चलने - फिरने से इसके लक्षणों में कमी आती हैं।  सर्दी व ठंडी हवा में रहने से, मानसिक श्रम करने से, मैथून से, भोजन करने के बाद, आधी - तूफ़ान से और मासिक  धर्म के दिनों मे इसके लक्षणों में वृद्धी होती है।

एगैरिकस औषधि के लक्षणों का विस्तार से विश्लेषण

मांसपेशियों व अंगों का फड़कना - मांसपेशियों तथा अंगो का फड़कना एगैरिकस औषधि का मुख्य लक्षण माना जाता है । इसमें मांसपेशियाँ तथा आँख फड़कती हैं, और अंगो में कम्पन्न होता है । अगर यह कम्पन्न बढ़ जाए तो ताडव  रोग  के लक्षण प्रकट होने लग जाते हैं । यह औषधि कम्पन्न में लाभप्रद होती है । 

मांसपेशियों में कम्पन्न और सोने पर कम्पन्न बन्द हो जाना - मांसपेशियों व अंगों के फडकने या कम्पन्न इस औषधि का विशेष लक्षण है । जब तक रोगी जागता रहता है तब यह कम्पन्न होता रहता है और जब वह सो जाता हैं,तो उसका कम्पन्न बन्द हो जाता है । 

शरीर पर चींटियाँ चलने जैसा अनुभव - सारे शरीर में ऐसा अनुभव प्रतीत होता हैं, जैसे शरीर पर चींटियाँ रेंग रही हो । यह अनुभव त्वचा के साथ-साथ मांसपेशियों में भी होता है । शरीर का हर भाग इस प्रकार के अनुभव को महसूस करता हैं । त्वचा या अन्य भागों पर कभी ठंडी , कभी गर्म सूई बेंधने का अनुभव होता है । शरीर के जिस अंग में रक्त का प्रवाह शिथिल होता हैं, उनमें चुभन व जलन महसूस होती हैं । ऐसी चुभन तथा जलन में ऐसा लगता हैं, मानो ये अंग ठंड से जम गये हो । इस लक्षण के होने पर किसी भी रोग में यह औषधि लाभ पहुँचाती है, क्योंकि यह इस औषधि का सर्वांगीण अथवा व्यापक लक्षण है । 

वृद्धावस्था या अधिक मैथून से शारीरिक कमज़ोरी - वृद्धावस्था में मनुष्य के रुधिर की गति धीमी पड़ जाती है , शरीर मे झुरियाँ पड़ जाती हैं और सिर के बाल झड़ने लग जाते है । अधिक मैथून क्रिया से शारीरिक कमज़ोरी होने लग जाती हैं । वृद्धावस्था मे रक्तहीनता के कारण और युवावस्था मे अधिक मैथून क्रिया के कारण या अन्य किसी कारण से रोगी में मेरु - दण्ड सम्बंधी उप-द्रव होने लगते हैं । जैसे मांसपेशियों का फड़कना , कमर दर्द , पीठ का कड़ा पड़ जाना और मेरू - दंड का अकड़ जाना आदि । पैरो में कमजोरी, चक्कर आना , सिर भारी हो जाना , उत्साह नही रहना , काम करने का मन नहीं करना । और युवा व्यक्तियों मे जब अधिक मैथून क्रिया से उक्त लक्षण प्रकट होने लगे , तो एगैरिकस की कुछ बूंदे मस्तिष्क के स्नायुओं को शांत कर देती है । स्नायु प्रधान स्त्रियाँ मैथुन के उपरान्त हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त हो जाती है और बेहोश हो जाती हैं। इस स्थिति में भी यह औषधि लाभकारी होती है । यह याद रखना जरूरी हैं कि केवल बुढ़ापा आ जाने से एगैरिकस नही दिया जाता । होम्योपैथिक में कोई भी औषधि केवल एक लक्षण पर नही दी जाती बल्कि  समष्टि लक्षण देखकर दी जाती हैं। 

ठंड से त्वचा में सूजन आना - अधिक ठंड से जब एगैरिकस में सूजन आ जाती हैं और उसमें लाल चकते पड़ जाते हैं, जिसके कारण त्वचा में बेहद खुजली और जलन होती हैं। ऐसी अवस्था में एगैरिकस बहुत अच्छा काम करती है। 

चुंबन की अति  तीव्र इच्छा - स्त्री तथा पुरुष में जब वैषयिक इच्छा तीव्र हो जाती है , जिसे भी चूमने की इच्छा रहती हैं अर्थात आलिंगन की प्रबल इच्छा, मैथुन के बाद अत्यन्त शारीरिक कमजोरी, मैथुन के बाद मेरुदण्ड के रोग में वृद्धी तथा जलन, अंगो में शिथिलता जैसी हालत में यह औषधि उपयुक्त और कारगर होती हैं । 

मेरु दंड के रोग - इस औषधि में मेरु दंड के अनेक रोग शामिल हैं । जैसे - मेरु दण्ड का कड़ा पड़ जाना , झुकने पर ऐसा लगना की पीठ टूट जाएगी, मेरू दण्ड में जलन , पीठ की मांसपेशियों कम्पन्न, मेरु दंड में विभिन्न प्रकार की पीड़ा , पीठ में कभी ऊपर कमी नीचे दर्द, स्त्रियों मे कमर के नीचे दर्द, अंगो का फड़कना आदि लक्षण में इस औषधि का इस्तेमाल होता हैं । 

जरायु का बाहर निकलने जैसा अनुभव - जब स्त्रियों को ऐसा प्रतीत होता हैं, कि उनका जरायु बाहर निकल पड़ जाएगा, तो वे अपनी टांगे सिकोड लेती हैं । इस लक्षण में अन्य औषधियाँ जैसे - सीपिया , पल्सेटिला , लिलियम या म्यूरेक्स दी जाती है। परन्तु इस लक्षण के साथ अगर मेरु दण्ड के लक्षण मौजूद हो, तो एगैरिकस दी जाती हैं । अगर जरायु के बाहर निकल पड़ने का लक्षण वृद्ध स्त्रियों में पाया जाए और उसके साथ उसकी गर्दन कांपती हैं, सोने पर कम्पन्न बन्द हो जाता हैं, उसके शरीर मे गर्म या ठंडी सूई बेधने जैसा अनुभव हो, तो भी  एगैरिकस औषधि दी जाती हैं । 

रोग के लक्षणों का तिरछा भाव प्रकट होना - इस औषधि का एक विलक्षण है कि रोग के लक्षण एक ही समय में तिरछे भाव से प्रकट होते हैं । जैसे - गठिया का दर्द दायें हाथ में और बायें पैर में एक साथ होगा, या फिर बायें हाथ और दायें पैर में होगा । इसी प्रकार अन्य रोग में भी तिरछे भाव प्रकट हो सकते है, परन्तु रोग एक ही होना चाहिये तो यह औषधि दी जाती हैं।

क्षय रोग की प्रारंभिक अवस्था -  इस औषधि का रोगी को छाती में भारीपन अनुभव करता हैं, खाँसी के दौरे आते हैं और घबराहट के साथ पसीना आता है । खाँसी और छीकें एक साथ और लगातार आती हैं । होम्योपैथिक में एगैरिकस छाती के रोगों के लिये महान् औषधि मानी गई हैं। यह क्षय रोग में भी लाभ पहुँचाती हैं । रोगी को छाती में कष्ट, खाँसी जुकाम , रात में पसीना आना, स्नायु सम्बन्धि रोग, तेज़ खाँसी, नब्ज़ तेज़ होना, खाँसी में पस और कफ आना, रोगी की प्रात काल तबीयत गिरी - गिरी होती है । इन लक्षणों के होने पर इसे क्षय रोग की प्रारंभिक अवस्था मानी जाती है । इस प्रारंभिक अवस्था में यह औषधि लाभप्रद व कारगर होती है । 

इस औषधि के अन्य लक्षण 

  • रीढ़ की हड्डी के रोग के कारण रोगी बार - बार ठोकर खाकर गिर पड़ता है और हाथ से बर्तन बार - बार गिरना है । बर्तन का हाथ से बार - बार गिरना एपिस में भी पाया जाता है , परन्तु एगैरिकस का रोगी आग को पसंद करता है और एपिस आग से दूर भागता है । 
  • रीढ़ की हड्डी को दबाने से रोगी को हंसी आ जाती है, यह इसका अद्भुत  लक्षण है । 
  • एगैरिकस के रोगी को चलते समय पैर की एड़ी मे असहनीय पीड़ा होती है , जैसे किसी ने काट खाया हो । 
  • जैसे बच्चों का देर से बोलना सीखने पर नेट्रम म्यूर और देर से चलना सीखने पर केल्केरिया कार्ब दिया जाता हैं। परन्तु जब एक साथ बोलना और चलना दोनों देर से सीखने पर एगैरिकस दिया जाता है । 
  • एगैरिकस का यह अद्भुत लक्षण है कि रोगी को पेशाब करते समय मूत्र ठंडा लगता हैं। जबकि मूत्र बूंद बूंद कर निकल रहा होता है तब वह प्रत्येक बूंद को गिन सकता है । इस स्थिति में यह लाभ पहुँचाती है।
  • पुराने गोनोरिया के रोगियों में मूत्र करते समय मूत्राशय में देर तक सुरसुराहट बनी रहती हैं और मूत्र की अन्तिम बूंद निकलने में बहुत देर लगती हैं । इस लक्षण में पेट्रोलियम और एगैरिकस औषधियाँ दी जाती हैं। 
  • एगैरिकस का रोगी अपनी आखें घड़ी की तरह इधर - उधर घुमाता रहता है । वह पढ़ नहीं सकता, अक्षर उसके सामने से हटते जाते हैं । आँखों के आगे काली मक्खियाँ , काले धब्बे , जाला दिखाई देता है तो एगैरिकस दी जाती हैं। 

एगैरिकस औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - यह औषधि 3 , 30, 200 और अधिक शक्तियों में उपलब्ध हैं और इस औषधि की प्रकृति शीत प्रधान हैं।


एगनस कैस्टस ( AGNUS CASTUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, गुण और फायदें

एगनस कैस्टस ( AGNUS CASTUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, गुण और फायदों का विस्तार से जाने 

  • नपुंसकता - जननेंद्रिय के दुरुपयोग से शिथिलता आना 
  • जवानी में बुढ़ापे का आगमन 
  • स्त्री रोग- सफेद प्रदर  
  • प्रसूता को दूध में कमी 

एगनस कैस्टस औषधि की प्रकृति - वासना व मैथून क्रिया से रोग में वृद्धी होती है। और किसी भी कारण से रोग में कमी नही आती।

नपुंसकता - जननेन्द्रिय के दुरुपयोग से शिथिलता आना, वर्तमान में नवयुवक तथा नवयुवतिया जिस प्रकार बाल अवस्था में कुप्रवृत्तियो के शिकार हो जाते हैं जैसे- हस्तमैथुन , गुदामैथुन और पशुमैथुन आदि घृणित आदतें। जो इन आदतों के शिकार हो जाते हैं, वे परिणामस्वरूप नपुसंक हो जाते हैं। विवाहित व्यक्ति भी अगर इन्द्रिय वासना में डूब जाते हैं , कुछ समय बाद वे भी नपुसंकता के शिकार हो जाते हैं। ऐसे लोगों का शरीर क्षीण होने लगता हैं, उनकी स्मरण शक्ति कमजोर, किसी बात को समझ न पाना, अगर वे विद्यार्थी हैं तो पढने में मन नही लगना, और जिन्दगी बेजान लगती हैं। ऐसी अवस्था में यह औषधि लाभप्रद व कारगर होती हैं। 

स्त्रियों में भी ऐसे कुकर्त्यो से भोग की इच्छा खत्म हो जाती हैं, तो इस औषधि से सेवन यह समस्या दूर हो जाती हैं । उसे 15 से 20 बूंद का एक माह तक दिन में तीन बार दी जाती हैं। इससे उसके शरीर में विवाह से पहले जैसी रंगत आ जाएगी । 

नपुंसकता की अन्य औषधियाँ और उनकी तुलना - 

  • एगनस कैस्टस - इसमें भोग इच्छा की कमी होती है, यह नपुसंकता को दूर कर भोग इच्छा में वृद्धी करती हैं।
  • कैलेडियम और सिलेनियम - इसमे भोग की इच्छा रहती है , लेकिन इन्द्री शिथिल होती हैं । 
  • कोनायम तथा फॉसफोरस - इनमे इन्द्रिय  दमन के कारण नपुसंकता आ जाती है । 
  •  ओनोसमोडियम - इसमें स्त्री में भोग इच्छा नही रहती , यह स्त्री की भोग इच्छा बढ़ाने में लाभप्रद हैं ।
  • लाइकोपोडियम व सलफ़र - जब जननेन्द्रिय शीतल , शिथिल तथा छोटी पड जाती है । तब यह कारगर साबित होती है। 
  • योहिमबीनम - यह औषधि भी नपुसंकता को दूर करने लाभप्रद होती है । 
  • थूजा - यह औषधि गोनोरिया के कारण आई नपुसंकता लाभदायक होती है । 

जवानी में ही बुढ़ापा आना - वीर्य क्षय और जननेन्द्रिय सम्बंधी कुकर्मों के कारण जवानी में ही बूढ़ापा आ जाता है।जीवन में हताशा व निराशा आ जाती हैं, जिससे आत्म ग्लानि, आत्म हत्या का विचार, याददास्त की कमजोरी आदि लक्षणों में यह औषधि दी जाती है । 

सफ़ेद प्रदर - स्त्रियों में प्रदर की समस्या अनेक कारणों से होती हैं। लेकिन जब अधिक मैथून क्रिया से योनि शिथिल हो जाए और उसमे से गाढ़ा सफेद पद्धार्थ आए तो वह सफेद प्रदर होता है । जो कपड़े पर सूख जाने पर पीला पड़ जाता है । तब यह औषधि लाभप्रद होती है।

प्रसूता को दूध न आना - प्रसव के बाद जब प्रसूता को दूध नही उतरता हैं, या कम उतरता हो तो यह औषधि दी जाती हैं, जिससे दूध बढ़ जाता है और आसानी से उतरने लगता है 

एगनस कैस्टस की शक्ति व प्रकृति - एगनस कैस्टस औषधि 1, 3 , 30 , 200 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं ।

एकोनाइट ( ACONITE ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, गुण और फ़ायदें

एकोनाइट ( ACONITE ) के व्यापक - लक्षण, मुख्य - रोग, गुण और फ़ायदों को विस्तार से जानते है । 

  • भय के कारण बीमारियाँ  
  • घबराहट तथा बेचैनी 
  • खुश्क - शीत के कारण यकायक रोग 
  • शीत से शोथ की प्रथमावस्या में एकाएकपन और प्रबलता 
  • जलन और उत्ताप  
  • अत्यन्त प्यास 
  • शीत द्वारा दर्द - स्नायु - शूल 

भय के कारण बीमारियाँ - एकोनाइट का मुख्य तथा प्रबल लक्षण ' भय ' है । किसी भी रोग मे ' भय ' अथवा ' मृत्यु के भय ' के उपस्थित रहने पर एकोनाइट औषधि का प्रयोग आवश्यक है । मैटीरिया मैडिका की किसी अन्य औषधि मे भय का लक्षण इतना प्रधान नहीं है जितना इस औषधि में हैं । उदाहरणार्थ -

>> सड़क पार करने से भय लगना - इसका रोगी सड़क पार करते हुए डरता है कि कही मोटर की चपेट में न आ जाए । वैसे तो हर - कोई मोटर की चपेट मे आने से डरता है, परन्तु एकोनाइट का रोगी बहुत दूर से आती हुई मोटर से भी डर जाता है । 

>> भीड़ मे जाने से डरना - रोगी भीड़ मे जाने से, समाज मे जाने से डरता है और बाहर निकलने से डरता है ।

मृत्यु की तारीख बताना - इसके रोगी का चेहरा घबराया हुआ रहता है । रोगी अपने रोग से इतना घबरा जाता है कि जीवन की आशा छोड़ देता है । वह समझता है कि उसकी मृत्यु निश्चित है । कभी - कभी अपनी मृत्यु की तारीख की भविष्यवाणी कर देता है और डाक्टर से कहता है कि तुम्हारा इलाज व्यर्थ है , मैं शीघ्र ही अमुक तारीख को मर जाऊँगा। घड़ी को देख कर कहता है कि घड़ी की सूई अमुक स्थान पर आ जाएगी तब मैं मर जाऊँगा । 

>> प्रथम प्रसूति - काल के डर से लड़की का रोना - जब नव विवाहिता लड़की प्रथम बार गर्भवती होती है तब माँ को पकड़ कर रोती है और कहती है इतने बड़े बच्चे को कैसे जन्म दूँगी , मैं तो मर ही जाऊँगी । इस अवस्था में उसे एकोनाइट 200 की एक खुराक देने से ही उसका भय दूर हो जाता  है और वह शांत हो जाती है । 

>> भय से किसी रोग का श्रीगणेश होना - जब किसी बीमारी का श्रीगणेश भय से हुआ हो तब एकोनाइट लाभप्रद होती है । 

>> भूत - प्रेत का डर – बच्चो में अकारण ही भूत प्रेत का भय होता है । अन्य कारणो से भी बच्चे , स्त्रियाँ तथा अनेक पुरूष अकारण भय से परेशान रहते हैं । इन अकारण भय में यह औषधि बहुत ही फायदेमंद है । 

भय में एकोनाइट व अर्जेन्टम नाइट्रिकम से तुलना - इन दोनों औषघियो मे प्रबल लक्षण मृत्यु भय होता है। दोनो के रोगी कभी - कभी अपनी मत्यु  की भविष्यवाणी करता हैं। दोनो के रोगी भीड में जाने से डरते हैं, घर से निकलने से डरते है। अर्जेन्टम नाइट्रिकम की विशेषता यह है कि अगर उसे कुछ काम करना हो, तो उससे पहले ही उसका मन घबरा जाता है। किसी मित्र को मिलना हो, तो जब तक मिल नहीं लेता तब तक घबराया रहता है। गाड़ी पकड़ना हो तो जब तक गाड़ी पर चढ़ नही जाता तब तक परेशान रहता है। अगर व्याख्यान देना हो तो घबराहट के कारण उसे दस्त आ जाता है, शरीर मे पसीना छूटने लगता है। आगामी आने वाली घटना को सोच कर घबराया हुआ रहना, उस कारण दस्त आ जाना, पसीना फूट पड़ना, उस कारण नींद न आना अर्जेन्टम नाइट्रिकम का विशेष लक्षण है । ऊँचे - ऊँचे मकानों को देख कर उसे चक्कर आ जाता है। एकोनाइट में ठंड से बचता है, अर्जेन्टम नाइट्रिकम में ठंड को पसंद करता है। अर्जेन्टम नाइट्रिकम ठंडी हवा, ठंडे पेय, बर्फ, आइस क्रीम पसन्द करता है। पल्सेटिला के लक्षण की तरह बन्द कमरे में जी घुटता है , एकोनाइट मे ऐसा नहीं होता। अर्जेन्टम नाइट्रिकम का भय पूर्व - कल्पित भय होता  है  और एकोनाइट का भय हर समय रहने वाला भय होता है। 

भय मे एकोनाइट तथा ओपियम की तुलना - भय से किसी रोग का उत्पन्न होना एकोनाइट तथा ओपियम दोनो के लक्षण  है , परन्तु भय से उत्पन्न रोग की प्रारंभिक अवस्था मे एकोनाइट लाभ  करता है , परन्तु जब  भय दूर न होकर हृदय मे जम जाए और रोगी अनुभव करे कि जब  से मैं डर गया हूँ  तब  से यह रोग मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा, तब ओपियम अच्छा काम करती है । इस लक्षण के साथ ओपियम के अन्य लक्षणों को भी देख लेना चाहिये । 

घबराहट तथा बेचैनी -  मृत्यु भय , भय और घबराहट , ये तीनो एक - दूसरे से क्रमश हल्के शब्द हैं । यह जरूरी नहीं कि रोगी में मृत्यु का भय ही हो, घबराहट में मृत्यु का भय अन्तर्निहित रहता है और यह मानसिक है ।  और इसी कारण घबराहट से बेचैनी होती है और  यह शारीरिक होता है । इसकी तीन मुख्य औषधियाँ होती  हैं जैसे- एकोनाइट , आर्सनिक तथा रसटॉक्स, इन्हें बेचैनी  का त्रिक कहा जाता हैं । 

बेचैनी मे एकोनाइट, आर्सनिक तथा रस टॉक्स की तुलना - एकोनाइट का रोगी मानसिक घबराहट तथा शारीरिक बेचैनी के कारण बार - बार करवटें बदलता है, पर उसके शरीर मे पर्याप्त शक्ति बनी रहती है। वह कभी उठता है, कभी बैठता है, कभी लेट जाता है, किसी भी तरह उसे चैन नही मिलता। एकोनाइट के रोगी की बचैनी मन तथा शरीर दोनो मे रहती है और उसकी शारीरिक - शक्ति यथावत रहती हैं। आर्सनिक के रोगी का शरीर  कमजोर और शक्तिहीन होता है, उसकी मानसिक बेचैनी अधिक होती है जिसे घबराहट कहा जा सकता है। आर्सनिक का रोगी शारीरिक दृष्टि से कमजोर होने पर  मानसिक - घबराहट तथा बेचैनी के कारण बिस्तर पर इधर - उधर करवटें बदलता है, एक बिस्तर से दूसरे बिस्तर पर जाता है। रस-टॉक्स के रोगी को शारीरिक कष्ट अधिक होता है, शरीर की मासपेशियो मे दर्द होता है और इसी कारण वह करवटें बदलता है और इस प्रकार उसे कुछ देर के लिये आराम मिलता है क्योंकि रस टॉक्स के लक्षणों मे हिलने - जुलने से आराम  होता है। इस प्रकरण मे यह भी ध्यान रखना चाहिये कि बिस्तर सख्त मालूम होने के कारण बार - बार करवटें बदलते रहना और जिस तरफ भी लेटे उस तरफ बिस्तर सख्त मालूम होना आर्निका में पाया जाता है । 

भय , क्रोध और अपमान से होने वाले रोगो में एकोनाइट , कैमोमिला तथा स्टैफि सैप्रिया में तुलना - अगर शारीरिक अथवा मानसिक रोग का कारण ‘ भय '  हो तो एकोनाइट से लाभ मिलता है , अगर इसका कारण क्रोध हो तो कैमोमिला से लाभ होता है , अगर इसका कारण ' अपमान हो तो स्टैफिसैप्रिया से लाभ होता है । भय , क्रोध , अपमान में मनुष्य को मानसिक रोग साथ दस्त , पीलिया आदि शारीरिक रोग भी हो जाते हैं । 

खुश्क - शीत के कारण  बीमारियाँ होना - शीत दो प्रकार हो की सकती है । नमी वाली हवा की शीत , और खुश्क हवा की शीत । सूखी ठंडी हवा के शीत से  जो रोग उत्पन्न होते हैं , उन सब मे एकोनाइट  लाभप्रद होती है । नमी वाली ठंडी हवा के शीत से जो रोग उत्पन्न होते हैं उनमें रसटॉक्स और नेट्रमसल्फ़ औषधि लाभप्रद होती है । जिन  व्यक्तियों को खुश्क - शीत के रोग आसानी से हो जाते है। इस विषय मे अनुभव बतलाता है कि मोटे - ताजे , रक्त - प्रधान बच्चों तथा व्यक्तियों को खुश्क - शीत के रोग आसानी से हो जाते है जबकि दुबले - पतले बच्चों को ये रोग धीरे - धीरे होते है । 

>> मोटे - ताजे तथा दुबले - पतले बच्चों पर क्रुप खाँसी मे खुश्क शीत का आक्रमण - अगर एक ही परिवार के दो बच्चो को , जिनमे एक मोटा - ताजा और दूसरा दुबला - पतला हो और उनकों खुश्क - शीत में ले जाया जाए , तो मोटा - ताज़ा , तगड़ा बच्चा  सर्दी में क्रुप खाँसी का शिकार हो जाता है , जबकि दूसरा दुबला - पतला बच्चा एक - दो दिन बाद क्रुप खाँसी की पकड़ में आता है । यह एकोनाइट का लक्षण है , और जिस कमजोर बच्चे को पहली रात ही शीत का कोई अन्य रोग नही हुआ तो वह हिपर का रोगी है । 

>> मोटे - ताजे तथा दुबले - पतले लोगों पर जुकाम मे खुश्क शीत का आक्रमण - अगर मोटा - ताजा व्यक्ति हल्के कपड़े पहन कर बाहर जाने से खुश्क - शीत से पीड़ित होगा , तो उसे उसी रात को जुकाम हो जायगा , अगर कोई व्यक्ति गर्म कोट पहन कर सर्दी मे निकलने से पसीना आने पर सर्दी हो जाएगी और कुछ दिन बाद जुकाम होगी । पहले व्यक्ति को मोटा - ताजा होने पर सर्दी आकर जुकाम होने पर एकोनाइट दिया जाता हैं , दूसरे व्यक्ति को ठंड लगने के कुछ दिन बाद जुकाम होने के कारण कार्बोवेज या सल्फर दिया जाता हैं। 

>> शीत में  गठिया रोग  का आना - यह औषधि पुराने गठिया रोग मे तो काम नहीं करती , लेकिन  शीत में ठंडी  हवा के लगने से अगर जोडो मे दर्द, ज्वर या साथ बेचैनी हो तो एकोनाइट लामप्रद औषधि है । 

शीत से शोथ की  प्रथमावस्था में एकाएक प्रबलता - एकोनाइट में शीत से रोग का होना एक प्रथम कारण है , इसलिये शीत  जन्य रोगों मे इसका विशेष उपयोग होता है । शोध की प्रथमावस्था मे एकोनाइट तभी देना चाहिये जब  शीत का एकाएक तथा प्रबल वेग से बड़ना शुरू हो । शोथ  के अतिरिक्त यह भी प्राय कहा जाता है कि एकोनाइट ज्वर की दवा है । यह मी भ्रमात्मक विचार है । एकोनाइट उसी  ज्वर मे दिया जाना चाहिये जो प्रबल वेग से आया हो । ऐसे ही शोथ में , ज्वर में तथा अन्य रोगों में यह औषधि लाभप्रद है ।

>> शीत से आंख की सूजन की प्रथमावस्था में - प्राय सर्दी लगने से आँख  एकदम बंद और लाल हो जाती है । यह आँख  की सूजन इतनी अचानक होती है कि समझ नही आता कि यह कैसे हो गई । इस सूजन में आँख  से पानी निकलता है । इसी को शीत से सूजन की प्रथमावस्था कहा जाता है । सूजन की प्रथमावस्था के बाद सूजन की जो अगली अवस्थाएँ है जैसे  मूजन, पस का पड़ना इस स्थिति मे एकोनाइट काम नहीं करती । आँख  की मूजन मे एकाएकपन और प्रबलपन - ये एकोनाइट के मुख्य लक्षण माने गए हैं । 

>> शीत से ज्वर कि प्रथमावस्था मे - जो ज्वर धीमी गति से आये और लगातार बना रहे , तो  यह औषधि उपयुक्त नही है । एकोनाइट का तो रूप ही प्रबल वेग से आना और उसी वेग से शान्त हो जाना है । इसलिये टाइफॉयडं जैसे ज्वरो मे यह औषधि उपयुक्त नहीं है । ज्वर को ठीक करने मे एकोनाइट का उपयोग एलोपैथ में भी किया जाता हैं । एकोनाइट उसी ज्वर मे उपयुक्त है जो शीत के कारण या पसीने के शीत से दब जाने के कारण एकदम आता है , एकोनाइटऐसी दवा है , जो  एक रात मे ही ज्वर को ठीक कर देती हैं । बिना सोचे ज्वर मे एकोनाइट देने से कभी - कभी दुष्प्रभाव की सभावना भी रहती है । बीमार का इलाज करते हुए केवल इस बात पर ही ध्यान नहीं देना होता कि रोगी मे कौन - कौन - से लक्षण हैं , इस बात पर भी ध्यान देना होता है कि उसमे कौन - से लक्षण नहीं हैं । एकोनाइट के ज्वर मे एकाएकपन , अचानकपन तथा प्रबल वेग - ये सभी लक्षण हैं। 

ज्वर मे एकोनाइट तथा बैलेडोना की तुलना - ज्वर मे एकोनाइट तथा बैलेडोना दोनो उपयुक्त औषधी  है परन्तु कई चिकित्सक ज्वर मे एकोनाइट और बैलाडोना को क्रमश दोनों दे देते हैं , यह ठीक नहीं है । दोनो औषधियो की भिन्नता यह होती है कि दोनों में त्वचा में  गर्मी का लक्षण एक - समान होता है , परन्तु बैलेडोना मे एकोनाइट की अपेक्षा बाहरी त्वचा की गर्मी अधिक होती है और ढके हुए अंगों  पर पसीना आता है , जबकि एकोनाइट मे जिस तरफ रोगी लेटा होता है उधर ही  पसीना आता है । एकोनाइट का रोगी बेचैनी में  यह सोचता कि मैं मर जाऊंगा और  बिस्तर मे इधर - उधर करवट  बदलता रहता है , बैलेडोना के ज्वर में रोगी -अर्ध निंद्रा में पड़ा रहता है। एकोनाइट का रोगी थोडी - थोड़ी देर में अधिक पानी पीता है और बैलेडोना का थोड़ा -थोड़ा पीता हैं । एकोनाइट का रोगी शरीर को खुला रखना पसन्द करता है और बैलेडोना का शरीर को ढक कर रखना पसंद करता है।  

>> शीत से कान के शोथ की  प्रथमावस्था मे - सर्दी लगने मे कान का शोथ अचानक , एकदम तथा प्रबल वेग से होता है जिसमे एकोनाइट उपयुक्त औषधि मानी जाती है । जब कोई  बाहर सर्दी मे गया है और उसके तन पर काफी कपडे कम पहने हो तब उसके कान मे तकलीफ होने लगती है ।  शाम तक कर्ण - शूल प्रारम्भ हो जाता है । अचानक और वेग इस शोथ के लक्षण हैं । 

>> शीत से एकाएक निमोनिया के प्रथम लक्षण मे - अगर रोगी को  ठंड लगने से अचानक निमोनिया हो जाता है तो उसके चेहरे पर घबराहट और बेचैनी दिखाई देती है ।  रोगी महसूस करता है की अब वह बच नहीं सकता, मृत्यु भय और बेचैनी उसके चेहरे पर अंकित  हो जाती है और छाती मे सूई के छेदन सा दर्द होने लगता है , लेट नही सकता , खासते ही खून निकलता है - ऐसे यकायक तथा प्रबल वेग के निमोनिया के पर एकोनाइट लाभदायक होती है । 

>> शीत से एकाएक प्लुरिसी के शुरुआती लक्षण में - फेफड़े को ढकने वाली झिल्ली की शोथ को प्लुरिसी कहते है । एकदम सर्दी लगने से इस झिल्ली का शोथ हो जाता है । एकाएक प्लुरिसी के शोथ मे छाती में दर्द होता है , ज्वर हो जाता है । इस प्रकार का वेग शुरुआती लक्षणों  में एकोनाइट उपयोग होता है । 

>> शीत से पेट की एकाएक तकलीफ़ों मे - सर्दी लगने से या अत्यधिक ठंडे पानी में  स्नान करने से अचानक  पेट मे ज़ोर का दर्द हो सकता है । सर्दी के पेट मे बैठ जाने से भयकर दर्द , उल्टी , खून की कय आदि तकलीफ़े हो सकती हैं । उस समय रोगी कटु पदार्थ खाना पसंद करता है । पानी के सिवा उसे सब कडवा लगता है । इस प्रकार की पेट की असाधारण अवस्था में मुख्य कारण पेट मे शीत का बैठ जाना होता है । इस अवस्था के शुरुआती लक्षणों  में  एकोनाइट लाभदायक होती है । 

जलन और उत्ताप - एकोनाइट में ' जलन ' एक विशेष लक्षण है । हर प्रकार के दर्द में जलन होती है । जैसे सिर मे जलन , स्नायु - शिरा के मार्ग मे जलन , रीढ मे जलन , ज्वर मे जलन , कभी - कभी तो ऐसी जलन जैसे मिर्च की जलन हो । 

अत्यन्त प्यास लगना - एकोनाइट का रोगी कितना ही पानी पी ले उसकी प्यास नही बुझती । आर्सनिक का रोगी बार बार में थोडा - थोडा कर पानी पीता है ,  एकोनाइट का रोगी बार - बार , बहुत - सा पानी पी जाता है । एकोनाइट के जलन और प्यास के लक्षणो को ध्यान में रखते हुए इस औषधि के गले की सूजन व टांसिल के लक्षणों को विस्तार से जानते हैं । 

>> शीत से गले की सूजन ( टासिल ) मे जलन और प्यास - गले की सूजन या टांसिल बढ़ जाने पर निगलना कष्टप्रद हो जाता है , लेकिन इतने से हम किसी औषधि का निर्णय नही कर सकते ।  अगर रोगी रक्त - प्रधान हो , तन्दुरुस्त हो , ठंडी हवा में सैर किया हो , शीत - वायु में रहा हो और वह उसी दिन गले मे तीव्र जलन अनुभव करे , गले में थूक निगलने में दर्द अनुभव करे , तेज़ बुखार हो , ठंडा पानी पीये , घबराहट और बेचैनी महसूस करे , तब उसके लिए एकोनाइट लाभप्रद होगी। 

शीत से दर्द  स्नायु  शूल - सिर  दर्द तथा दांत  दर्द में एकोनाइट उत्कृष्ट दवा माना गया है । इन सभी दर्द में भी इसके आधारभूत लक्षण सदा रहने चाहिये । शीत से स्नायु - शूल के लक्षणों निम्न उदाहरणों से समझते हैं- 

>> शीत द्वारा स्नायु  शूल - कोई व्यक्ति ठंडी सूखी हवा मे निकलता है । उसका चेहरा ठंडी हवा के सपर्क में आता है तो उसे स्नायु शूल हो जाती है , फिर हष्ट पुष्ट व्यक्ति को भी कहराने वाला दर्द शुरु हो जाता है । इस दर्द को एकोनाइट एकदम ठीक कर देती हैं । 

>> शीत से शियाटिका का दर्द - शीत लगने मे स्नायु मार्ग बर्फ जैसी ठंड अनुभव हो या जलन का अनुभव तो एकोनाइट अच्छा काम करती है । 

>> शीत से सिर  दर्द - इसका दर्द बड़े वेग से आता है जिससे मस्तिष्क तथा खोपड़ी पर जलन होने लगती है, कभी बुखार आता है कभी नहीं आता। सर्दी लगने से सिर में दर्द होने लगता है और कभी - कभी जुकाम के बन्द हो जाने से दर्द शुरू हो जाता है । जुकाम के समय रक्त - प्रधान व्यक्ति शीत हवा में बाहर निकलता है तो थोडी देर में आँखो के ऊपरी भाग सिर में दर्द होने लगता है । इस सिर दर्द से घबराहट रहती है ।  स्त्रियो के मासिक धर्म के अचानक रूक जाने से सिर में खून का दौर बढ़ जाता है और सिर - दर्द हो जाता है । इन सभी दर्दो में एकोनाइट बहुत ही फायदेमंद हैं ।

>> शीत द्वारा दातो मे दर्द - दांत के दर्द को दूर करने के लिये यह बहुत ही प्रसिद्ध औषधि है। एकोनाइट के मदर टिंचर की एक बूंद  रूई में लगाकर दांत की खोल में रखने से दर्द शान्त हो जाता है । अगर शक्तिकृत एकोनाइट का प्रयोग किया जाए तो वह और अच्छा काम करेगी , परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि दर्द सर्दी लगने से हुआ हो और एकदम व बड़े वेग से आया हो और रक्त - प्रधान व्यक्ति हो । 

दर्द में एकोनाइट , कैमोमिला तया कॉफिया की तुलना - होम्योपैथिक में एकोनाइट , कैमोमिला तथा कॉफ़िया दर्द की प्रमुख औषधिया हैं । कैमोमिला के दर्द में अत्यन्त चिडचिडापन  होता है , कॉफिया के दर्द मे अत्यन्त उत्तेजना होती है और त्वचा स्पर्श को सहन नही करती और रोगी शोर को सहन नहीं कर सकता।  एकोनाइट में रोगी को अत्यन्त घबराहट तथा मृत्यु का भय  होता है । 

एकोनाइट औषधि के अन्य लक्षण -

>> गर्मी से उत्पन्न रोगो में - यह औषधि का उपयोग शीत की बीमारियों में ही नही बल्कि  अत्यन्त शीत व अत्यन्त गर्मी से उत्पन्न रोगो में भी किया जाता है । फेफड़े तथा मस्तिष्क रोग शोथ के कारण होते है और ' आन्त्र - शोथ ' तथा पेट के रोग ग्रीष्म काल में होते है । जब रक्त - प्रधान व्यक्ति एकदम गर्मी खा जाता हैं तब लू से सिर दर्द व गर्मी से पेट में दस्त आदि अनेक तकलीफ उत्पन्न हो जाते हैं । इनमें एकोनाइट लाभप्रद औषधि है । बच्चों के पेट की बीमारियाँ गर्मी की वजह से होती है और अचानक , प्रबल वेग आई हो तो एकोनाइट उपयोगी होती है । 

>> स्त्रियों तथा बच्चों के रोगों मे क्योंकि वे भय के शिकार रहते हैं - पुरुषों की अपेक्षा बच्चों तथा स्त्रियों के रोगों मे एकोनाइट ज्यादा असरकारक व उपयोगी होती है । क्योंकि बच्चे तथा स्त्रियाँ भय के शिकार जल्दी होते है इसलिये उनके भय - जन्य रोगों मे इसका विशेष उपयोग है । स्त्रियों में प्राय सर्दी लगने या भय के कारण जरायु तथा डिम्ब - ग्रन्थि का शोथ हो जाता है जिससे मासिक धर्म रुक जाता है । कमी - कभी भय से गर्भपात  की सम्भावना भी रहती है । बच्चों में एकोनाइट तभी काम करता है जब रोग भय से उत्पन्न हुआ हो । 

>> नव - जात शिशु को  मूत्र न आने पर - जिस बच्चे आघात लगा हो और इस एकदम लगे धक्के के कारण उसकी नवीन - परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रिया मे रुकावट आ जाती है । प्राय उसे पेशाब नही उतरता । तो एकोनाइट की एक मात्रा समस्या को हल कर देती है । 

>> जिस तरफ़ लेटे उस तरफ चेहरे पर पसीना आना - एकोनाइट का मुख्य लक्षण यह भी है कि रोगी जिस तरफ लेटता है उसी तरफ चेहरे पर पसीना आता है । अगर वह करवट बदलता है तो पहला पसीने वाला भाग सूख जाता है, और दूसरी तरफ पसीना आने लगता हैं ।

>> श्वास कष्ट मे पसीना आना - कमी कभी ठंड,  भय या ' शौक ' के कारण फेफडों की छोटी छोटी श्वास - प्रणालिकाए संकुचित हो जाती हैं और रोगी को दमे जैसी शिकायत हो जाती है । ऐसा श्वास - कष्ट  स्नायु - प्रधान , रक्त - प्रधान स्त्रियों को अधिक होता है । उनकी श्वास जल्दी जल्दी चलता है , घबराहट होती है , श्वास लेने में प्रयास करना पडता है , श्वास एणालिकायें सूखी होने लगती हैं । ऐसे में एकोनाइट लाभप्रद होती हैं ।

अल्पकालिक औषधि- इसके प्रयोग में यह ध्यान रखना चाहिये कि यह दीर्घकालिक औषधि नहीं है । इसकी क्रिया थोडे समय तक ही रहती है , इसलिये इसे दोहराया जा सकता है । 

एकोनाइट तथा सल्फर का पारस्परिक संबंध - एकोनाइट तथा सलफ़र का पारस्परिक सम्बन्ध विशेष है । सल्फर में एकोनाइट के अनेक लक्षण पाये जाते हैं । जिन  नवीन लक्षणों में एकोनाइट दिया जाता है और लक्षण पुराने हो जाए तो सल्फर का उपयोग किया जाता है । जब कोई ऐसा रोग मनुष्य को अचानक व प्रबल वेग से आया हो तो उसे एकोनाइट ठीक कर देता हैं । अगर शरीर मे उस रोग के बार - बार आने की प्रवृत्ति रहती है तो सल्फ़र ठीक करती है । 

एकोनाइट  शक्ति तथा प्रकृति - स्नायु शूल में मदर टिंचर की एक बूंद ३ से ३० शक्ति में दी जाती हैं । यह औषधि दीर्घ - गामी नही है और नवीन रोगों में ही इसका बार - बार प्रयोग होता है ।

इथूजा ( AETHUSA ) औषधि के व्यापक लक्षण तथा मुख्य रोग और गुण व फायदें

इथूजा ( AETHUSA ) औषधि के  व्यापक  लक्षण तथा मुख्य रोग और गुण व फायदों को विस्तार जानेंगे ।

  • बच्चे का दूध पीकर उल्टी कर, सो जाना 
  • कब्ज के साथ सब्ज और पीले दस्त 
  • निम्न रोगों का इलाज न होने पर रोग का हैजे में बदल जाना 
  • परीक्षा के समय की थकावट व एकाग्रता में कमी
  • बच्चों में ऐंठन 
  • अन्य लक्षण - ज्वर में गर्मी लगने पर भी प्यास नहीं लगना, गर्दन के चारों ओर ग्रन्थियों की माला उभर आना , तेज कय , तेज अकड़न , तेज दर्द , 

इथूजा औषधि की प्रकृति - खुली हवा में और लोगों से मिलने जुलने से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं । प्रात काल 3 से 4 बजे के बीच, सांयकाल को, ग्रीष्म ऋतु में, दूध पीने के बाद, कय , दस्त और ऐंठन के बाद, बच्चे के दांत निकलते समय और बार - बार खाने से रोग के लक्षणों में वृद्धी होती है।

बच्चे का दूध पीकर उल्टी कर सो जाना - इथूजा बच्चों की मित्र औषधि मानी जाती है । बच्चों के अनेक रोगों मे लाभप्रद होती है । बच्चा जब भी दूध पीता हैं और तुरन्त बाद उलटी कर देता है । अगर कुछ समय तक वह दूध को पेट में रख भी लेता है, तो कुछ देर बाद फटे हुऐ दूध जैसी उलटी कर करता जिसका रंग कुछ नीले जैसा होता है । उल्टी करने से उसे जो कमजोरी और थकावट होती है, जिसके कारण वह सो जाता हैं। परन्तु थोड़ी देर बाद जाग कर भूख से रोने  लगता है । माँ उसे फिर दूध पिला देती है, वह फिर उल्टी कर देता है, और अगर कुछ देर दूध पेट मे रहा तो दही जैसी उल्टी कर देता है । ऐसा प्राय दो कारणों से होता है या तो बच्चे के पेट मे कुछ ख़राबी होती है, या जब उसके दांत निकल रहे होते हैं । बच्चे का दूध को न पचा पाना इथूजा का लक्षण है । इन लक्षणों में यह औषधि लाभप्रद होती है ।

दूध हजम न कर पाने मे इथूजा तथा कैल्केरिया की तुलना - इथूजा की तरह कैल्केरिया में भी बच्चा दूध पीकर जमे हुए दही की तरह उल्टी कर देता है , परन्तु इथूजा में बच्चा उल्टी करने के बाद फिर दूध पीने लगता है जबकि कैल्केरिया में बच्चा उल्टी करने के बाद दूध नहीं पीता । कैल्केरिया में बच्चे के सिर पर पसीना आता है और उसके शरीर से खट्टी बदबू आती हैं।  इथूजा में बदबू नहीं होती । 

कय के साथ साथ सब्ज़ और पीले दस्त आना -  ग्रीष्म ऋतु में कभी - कभी कय के साथ सब्ज़ और पीले रंग के दस्त आते हैं । यह जरूरी नहीं कि दस्त आयें ही , परन्तु यह देखा गया है कि बच्चों को कय के साथ सब्ज़ अथवा पीले रंग के दस्त भी आ जाते है ।

निम्न रोगों का इलाज न होने पर हैजे की शिकायत - जब बच्चे के दूध पीते ही उल्टी आ जाय, उल्टी आने पर थक कर बेजान होकर सो जाय , उठकर फिर दूध के लिये रोने लगे , सब्ज़ के साथ पीले दस्त आने लगें, इन लक्षणों में इलाज न होने पर हैजे की शिकायत हो जाती है और बच्चा मरणासन्न अवस्था में हो जाता है । इन शिकायतों मे इथूजा बच्चे की परम मित्र और लाभप्रद मानी जाती  है । 

परीक्षा के समय थकावट और एकाग्रता में कमी - इथूजा के लक्षणों में रोगी कुछ पढ़ नहीं पाता , मानसिक कार्य नहीं कर पाता, मस्तिष्क शांत नही रहता। अर्थात विद्यार्थी परीक्षा के समय ऐसी मानसिक दशा अनुभव करता हैं, विद्यार्थी कितना भी प्रयत्न करें मन कुछ भी ग्रहण नहीं करता । उस समय की इस थकावट को इथूजा दूर कर देती है ।

इथूजा , अर्जेन्टम नाइट्रिकम तया जेलसीमियम की एकाग्रता की कमी मे तुलना - मानसिक थकावट मे होम्योपैथिक की तीन दवाओं की तरफ ध्यान जाता है । इथुजा मे तो दिमाग पढ़ते हुए थकता है और आगे काम नहीं करता जैसा  परीक्षा से पहले हुआ करता है । अर्जेन्टम नाइट्रिकम मे घबराहट , चिन्ता , परीक्षा मे फेल होने की आशका होती है। साधारण से घबराहट से ही दस्त आ जाता है और अपनी असमर्थता की पूर्व कल्पना के भय से घबराहट होने लगती है। जेलसीमियम मे भी अर्जेन्टम नाइट्रिकम जैसा लक्षण होता है। इथूजा मस्तिष्क की थकावट को सूचित करता है , मस्तिष्क की काम करने में असमर्थता का द्योतक है ।  अर्जेन्टम नाइट्रिकम मानसिक तनाव , घबराहट और आशंका का द्योतक है । इनके अलावा इथुजा में पेट की शिकायत व उल्टी की शिकायत होती है । अर्जेन्टम नाइट्रिकम मे पेट मे हवा भरी होती है जो बदहज़मी का कारण होती है, ऐसा लगता है कि पेट फूट जायगा । इथूजा तथा अर्जेन्टम दोनो मे दस्त और हरा आव आता है । अर्जेन्टम का रोगी मीठे का शौकीन होता है , परन्तु मीठा नही खा पाता , बल्कि मीठे से उसकी शिकायतें बढ़ जाती हैं । 

ऐंठन में - बच्चों की ऐंठन में इथूजा बहुत लाभ पहुँचाता है ऐंठन के समय बच्चा मुट्ठी बांद लेता है। उसकी आखें नीचे तरफ फिरी रहती हैं और चेहरा लाल हो जाता है, पुतलिया फैल जाती हैं, मुख से झाग निकलने लगती है।

इथूजा औषधि के अन्य लक्षण

  • ज्वर मे गर्मी लागने पर भी प्यास बिल्कुल नहीं लगती है ।
  • गर्दन के चारो तरफ ग्रथियो की माला - सी उभर आती है ।
  • तेज़ कय, तेज़ अकडन, तेज़ दर्द - सब शिकायतो मे तेजी होना । 

इथूजा औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - यह औषधि 3 , 30 , 200 की शक्ति में उपलब्ध है और यह उष्ण प्रधान औषधि है । औषधि का सेवन चिकित्सक की देखरेख व सलाह से ही करे । 


रविवार, 11 अक्तूबर 2020

एसक्यूलस ( AESCULUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग और गुण व फायदें

एसक्यूलस ( AESCULUS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग और गुण व फायदों का तुलनात्मक विश्लेषण विस्तार से जाने-

  • मलद्वार शिराओं में रक्त - संचय , ( बवासीर में, गले , पेट , फेफड़े , आँख आदि की शिराओं में रक्त संचय से फूला हुआ अनुभव करना
  • कमर के नीचे की हड्डी में दर्द ( त्रिकास्थि ) जिसे चिनका पड़ जाना कहते हैं 
  • दर्द का स्थान परिवर्तन होना

एसक्यूलस औषधि की प्रकृति- लक्षणों में कमी- बवासीर का खून निकलने और ठह से रोग के लक्षणों कमी आती हैं। लक्षणों मे वृद्धि - प्रात काल रोग का बढ़ना, ठंडी हवा मे सास लेने,  शौच या पेशाब के बाद और हिलने - डुलने तथा घूमने से लक्षणों में वृद्धि होती हैं ।

मलद्वार की शिराओं में रक्त संचय ( बवासीर ) - मानव शरीर मे दो प्रकार की रक्त वाहिनियाँ होती है - 'धमनिया और शिराएँ ' । धमनियों मे शुद्ध  रक्त बहता हैं और शिराओ मे अशुद्ध रक्त । यह रक्त पहले हृदय मे इकट्ठा होता है , वहा से शुद्ध होने के लिये फेफडों में जाता है, वहा से ऑक्सीजन लेकर व शुद्ध होकर फिर हृदय में आ जाता हैं और वहा से धमनियों द्वारा पुन शरीर में संचार करता है । जब शरीर की मांसपेशियाँ ढीली पड़ जाती हैं, तब शिराओं में कमजोरी आ जाती है। और जहाँ शिराओं का समूह अधिक तौर से होता है, वहाँ अशुद्ध रक्त ले जाने वाली इन शिराओं मे अशुद्ध रक्त इकट्ठा होता है । अशुद्ध रक्त के एक स्थान पर इसी सचय को ' शिरा रक्त संचय '  कहते हैं । इसी ' शिरा रक्त संचय ' से बवासीर की उत्पत्ति होती है । 

बवासीर दो प्रकार की होती है- बादी बवासीर और खूनी बवासीर। यह औषधि बादी बवासीर में अधिक उपयोगी है । बवासीर मे कभी खून आता है और कभी नही आता । एसक्यूलस बादी बवासीर में , जिसमे खून नही आता उसमें अधिक कारगर होती है । परन्तु खूनी बवासीर में भी यह लाभदायक होती है । इस दवा का कार्य क्षेत्र अधिक विस्तृत नही है , परन्तु बवासीर तथा जहाँ - जहाँ शिराओ मे रक्त संचय की शिकायत हैं, वहाँ - वहाँ इसका कार्य निस्मन्दिग्ध हैं । क्योंकि एसक्यूलस का प्रभाव ' शिराओ ' पर होता है इसलिये जहाँ - जहाँ लाल - नीले रंग का रुधिर दिखे , बवासीर के मस्सो में , घाव में या कही भी , वहाँ वहाँ यह औषधि उपयोगी है । 

खूनी बवासीर में कोलिनसोनिया उत्कृष्ट औषधि है । कोलिनसोनिया से लाभ होने के बाद जो कुछ शेष रहता है, उसे एसक्यूलस पूरी तरह ठीक कर देती है । इसी प्रकार नक्स वोमिका तथा सल्फर से जब रोग मे कमी आ जाए, और बवासीर मे पूरा लाभ न हो , तब एसक्यूलस बचे हुए रोग को ठीक कर देती है । 

रक्त - संचय के कारण किसी अंग में भारीपन - रक्त संचय से भारीपन इस औषधि का विशेष लक्षण है। बवासीर में गुदा की शिराओं मे नीला रक्त संचित हो जाता हैं, इसलिये वहाँ पर रोगी को भारीपन का अनुभव होता है। मलद्वार में भारीपन अनुभव करना इस औषधि का विशेष लक्षण है । 

मलद्वार में तिनके जैसी चुभन का अनुभव होना - मलद्वार नीचे की ओर होता है , इसलिए शिराओं में संचित अशुद्ध रक्त ऊपर की तरफ नही लौटता , तब रोगी को चुभन अनुभव होती है । जिन व्यक्तियों की रुधिर नाड़ियाँ अधिक फूली होती है , उन्हें विशेष तौर से ऐसी चुभन अनुभव होती हैं । 

एसक्यूलस तथा नाइट्रिक एसिड की तुलना - इस औषधि में गुदा मे तिनके जैसी चुभन का अनुभव होता हैं जबकि नाइट्रिक एसिड में शौच करते समय ऐसा अनुभव होता हैं, जैसे गुदा मे कही हड्डी का टुकडा चुभ रहा हो । एसक्यूलस में शौच करने के कुछ घंटे बाद चुभन का दर्द होता है , जबकि नाइट्रिक एसिड मे शौच करते समय और शौच करने के कई घंटे बाद तक यह चुभन का दर्द रहता है । नाइट्रिक एसिड का लक्षण खूनी बवासीर होती है ,जबकि एसक्यूलस का लक्षण नीले रग के बाहर निकले हुए बड़े मस्से होते हैं, जिनमे चाकू से काटने जैसा दर्द होता है । इसमे रोगीं न खड़ा रह सकता हैं , न लेट सकता है , न ही बैठ सकता है ।

मुख, गले, पेट, फेफडे और आँख की शिराओं में फूलापन अनुभव करना - जैसे गुदा की शिराओं में रक्त संचय से फूलापन अनुभव होता है , वैसे मुख की या गले की शिराओं में भी रक्त - संचय के कारण फूलापन अनुभव होता है। इसी प्रकार का अनुभव पेट, हृदय और फेफड़ों में प्रतीत होता हैं। गला नीली शिराओं से भरा दिखना और आँखो की शिराओं में सूजन अर्थात उनमें रक्त संचय से कष्ट उत्पन्न हो जाता हैं। उसके लिये एसक्यूलस बहुत ही उत्तम औषधि हैं। 

कमर के नीचे की त्रिकास्यि में दर्द ( चिणक पड़ना ) - इस औषधि की मुख्य क्रिया गुदा व पीठ के नीचे के स्थान में होती हैं , जिसे त्रिकास्थि कहते हैं । त्रिकास्थि का स्थान रीढ़ की अंतिम हड्डी के ठीक ऊपर होती हैं। चलने - फिरने , हिलने - डुलने तथा झुकने से कमर के नीचे इस हड्डी मे दर्द बढ़ जाना इस औषधि का विशिष्ट लक्षण है । पीठ मे चिणक पड़ जाने पर यह औषधि उपयुक्त मानी जाती है । कमर दर्द की यह अतिउत्तम औषधि है । 

कमर के नीचे दर्द में एसक्यूलस तथा एगैरिकस की तुलना - कमर के नीचे दर्द दोनों औषधियों का लक्षण है , परन्तु एगैरिकस मे कमर दर्द बैठी हुई हालत में होता है और चलते - फिरने से चला जाता हैं । जबकि एसक्यूलस मे यह दर्द बैठी हुई हालत से उठने या झुकने या चलने फिरने से होता है । रोगी एक तरह का लंगड़ापन अनुभव करता है और यह अनुभव कूल्हे या टांग तक होता है । 

दर्द का स्थान परिवर्तित होना - इस औषधि में दर्द स्थान परिवर्तित करता रहता हैं । कभी - कभी ये दर्द स्नायु मार्ग पर होता हैं । पल्सेटिला तथा कैली कार्ब में भी दर्द इस तरह स्थान परिवर्तन करता  है । पल्सेटिला तथा एसक्यूलस दोनों ही ऊष्णता प्रधान औषधियाँ हैं , दोनों के रोगी ठंड को पसंद करता हैं और दोनों में ही दर्द स्थान परिवर्तन करता हैं। लेकिन दोनों औषधियाँ ऊष्णता  प्रधान होने पर भी रोगी दर्द की हालत में गर्मी को पसंद करता हैं। इसी प्रकार सिकेल का रोगी भी ऊष्णता प्रधान होता है लेकिन ठंड को पसन्द करता है जबकि  दर्द की हालत में गर्मी चाहता है । कैम्फर का रोगी भी दर्द की हालत में बंद कमरा चाहता है , परन्तु दर्द कम होते ही कपड़े उतार देता है । रोगी का ऊष्णता प्रधान होने के कारण ठंड को पसंद करना ' व्यापक ' लक्षण है , और दर्द की हालत में गर्मी पसंद करना ' एकागी ' लक्षण है । इन लक्षणों में यह व्यापक उचित औषधि हमें

एसक्यूलस मे गुदा के लक्षणों की प्रधानता होती है और पल्सेटिला मे पेट के लक्षणों की प्रधानता होती है । पल्सेटिला की स्त्री मोटी होती है और सिकेल की स्त्री पतली, दुबली , व झुरियो वाली होती है । सिकेल का रोगी ठंड चाहता है , कैम्फर का रोगी भी ठंड चाहता है , परन्तु जब कैम्फर का रोगी कपड़े उतार फेंकता है तब उसे फिर ठंड लगने लगती है । और जब वह कपड़े से अपने को ढ़क लेता है तब उसे एकदम गर्मी लगने लगती है । 

इस औषधि के अन्य लक्षण 

ठंडी हवा से नाक में जुकाम लगना -  ऐसा जुकाम जो आर्सनिक के लक्षणों मिलता हो , जिसमें पतला , पनीला , जलन वाला जुकाम हो और ठंडी हवा में सास लेने से जो नाक मे लगता हो तो ऐसे जुकाम में यह एसक्यूलस उपयोगी औषधि है । 

प्रदर की समस्या में जब कमर कमजोर अनुभव हो, चलने मे टागें थकी - थकी महसूस हो और थोडी दूर चलने मे ही भारीपन प्रतीत हो , तो ऐसे प्रदर को यह औषधि ठीक करती है । 

एसक्यूलस औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - एसक्यूलस औषधि 3, 6, 30 की शक्ति में उपलब्ध है। ( यह औषधि उष्ण प्रधान हैं ) 

एक्टिया रेसिमोसा या सिमिसिफ्यूगा के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, गुण व फायदे

एक्टिया रेसिमोसा या सिमिसिफ्यूगा के व्यापक-लक्षण तथा मुख्य - रोग, गुण व फायदे विस्तार से जानते है- 

  • स्त्री रोग हिस्टीरिया में, 
  • मासिक धर्म तथा जरायु रोग में , 
  • शारीरिक लक्षणों के दबने के बाद मानसिक लक्षण उत्पन्न में, 
  • तीसरे महीने में गर्भपात होना पर, 
  • गठिया ( मासपेशियों, जोडो, सिर व जरायु मे दर्द )
  • एक्टिया रेसिमोसा या सिमिसिफ्यूगा औषधि की प्रकृति
  • गर्म कपड़े पहनने से रोग मे कमी
  • खाने से रोग मे कमी व लक्षणो मे वृद्धि 
  • मासिक धर्म के दिनों मे रोग - वृद्धि
  • जितना अधिक मासिक स्राव, उतना क्लेश बढ़ना 
  • ठंड से रोग का बढ़ना 

इस औषधि की परीक्षा बहुत सीमित में है, परन्तु फिर भी कई रोगों मे यह औषधि लाभप्रद होती है । इसका मुख्य उपयोग स्त्रियो रोगो के उपचार में किया जाता है जिनमे से मुख्य रोग हिस्टीरिया तथा गठिया आदि वात - रोग मुख्य हैं । हम इन पर  विस्तार से चर्चा  करते है । 

हिस्टीरिया के लक्षण - सोते समय मासपेशियो में कंपन्न अनिद्रा - इस रोग से ग्राषित स्त्री बिस्तर पर जिस तरफ लेटती है , उसी तरफ मासपेशियो में कंपन्न होने लगता है । अगर वह पीठ के बल लेटती है तो पीठ और कन्धो की मांसपेशियों में कंपन्न व बेचैनी होना शुरू हो जाता है और दायें , वायें , सीधे - जिस तरह भी वह सोए उसे कंपन्न औए बेचैनी होती है । यह इस औषधि का विलक्षण है । 

मासिक धर्म के समय लक्षणों मे वृद्धि - मासिक धर्म के समय रोगिणी से पूछना चाहिये कि उसके लक्षण मासिक धर्म से पहले या मासिक धर्म के समय बढते हैं ।  मासिक धर्म के बाद स्त्रियों की तकलीफें घट जाती है , परन्तु ऐक्टिया रेसिमोसा यह विशेष लक्षण यह है कि जब मासिक धर्म हो रहा हो, तब स्त्री की तकलीफें बढ़ जाती हैं। और जितना ही अधिक रुधिर होता है उतनी ही तकलीफ होती है । मासिक धर्म के दिनो मे स्त्रिया उदासीन, रुआई, अविश्वासी व बेचैन होती है । इन लक्षणों यह औषधि लाभप्रद होती है और मासिक धर्म के होने से स्त्री की सब तकलीफ़े ठीक  हो जाते हैं । जबकि  लेकेसिस और जिफम मे ठीक इसकी उल्टी प्रतिक्रिया होती है । 

शारीरिक लक्षणों के दबने पर मानसिक लक्षणों का प्रकट होना तथा मानसिक - लक्षणों के दबने पर शारीरिक लक्षणों का प्रकट होना कभी - कभी रोगी के शारीरिक - लक्षणों को तेज़ दवाओं का प्रयोग कर दबा दिया जाता है , परन्तु इससे मानसिक लक्षणों की उत्पत्ति हो जाती हैं । यह इस औषधि का लक्षण है, इसे कुछ उदाहरणार्थ समझते हैं - 

अगर गठिये रोग को दबा दिया जाता है, तो रोगी का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है , लेकिन कमी - कभी गठिया ठीक भी हो जाता है और मानसिक सन्तुलन भी बना रहता है। परन्तु दस्त की समस्या, पेट मे दर्द , स्त्रियों में जरायु से रुधिर आने जैसी समस्याएं होने  लगती है । इस प्रकार के स्रावो का प्रवाह रोग को शांत रखने का काम करते है , अगर यह स्त्राव - प्रवाह रुक जाए , तो रोगी अशांत, चित और मायूस रहता है ।  

ऐक्टिया रेसिमोसा की रोगिणी कहती है कि उसके सारे शरीर मे दर्द होता है , जिस तरफ भी लेटे उस तरफ की मांसपेशिया फडकने लगती हैं , इस कारण वह रात को सो नही पाती और वह उठ बैठती है। अगले दिन वह अपने शारीरिक कष्ट बारे में कोई बात नही करती, सिर्फ इतना कहती है कि उसका जी घबरा रहा है, कुछ करने का मन नहीं करता, रो रोकर दिल हल्का करना चाहती हैं । शारीरिक लक्षणों के बाद मानसिक लक्षण और मानसिक लक्षणों के बाद शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन ही इस दवा का लक्षण व गुण हैं। इन लक्षणों में यह औषधि बहुत ही कारगर होती हैं ।

ऐक्टिया रेसिमोसा व पल्सेटिला तुलनात्मक विश्लेषण - ऐक्टिया रेसिमोसा के जैसा लक्षण, पल्सेटिला में भी पाया जाता है, पर दोनों में यह फर्क है, कि एक्टिया रेसिमोसा शीत प्रधान औषधि है, पल्सेटिला उष्ण प्रधान औषधि हैं। पल्सेटिला में बीमारी सिर्फ स्थान बदलती है, रूप नहीं । यदि घुटने में कोई दर्द है, तो वह दर्द दूसरे घुटने, भौह या अन्य किसी भी स्थान पर जा सकता है, लेकिन दर्द वैसा ही रहेगा जैसा था, कोई रूप नहीं लेगा। ऐक्टिया रेसिमोसा में दर्द एक मानसिक रूप लेता है जैसे - उदासी, निराशा, रोना आदि। 

इस दृष्टिकोण से ऐक्टिया रेसिमोसा और एब्रोटेनम की तुलना भी की जा सकती है, लेकिन एब्रोटेनम में एक शारीरिक लक्षण दब कर दूसरा शारीरिक लक्षण उत्पन्न होते हैं, मानसिक लक्षण नहीं। उदाहरणार्थ जैसे - एब्रोटेनम में दस्त दबकर गठिया या बवासीर हो जाएगा और कर्णमूल दबकर पोते बढ़ जाएंगे। ऐक्टिया रेसिमोसा का एब्रोटेनम की तुलना में मन व स्नायु मण्डल प अधिक प्रभाव होता हैं।

ऐक्टिया रेसिमोसा और इग्नेशिया की तुलनात्मक विश्लेषण - इग्नेशिया में भी लक्षणों में परिवर्तन पाया जाता हैं यह भी शीत प्रधान औषधि है।  इग्निशिया में बीमारी दुख के कारण होती हैं जैसे- किसी का पति मर गया हो, किसी की पत्नी मर गई हो, या अत्यन्त प्रेम से व्याकुल हो। इस प्रकार दु:ख से उत्पन्न रोगों में इग्नेशिया कारगर होती हैं ।

तीसरा महीने गर्भपात और सहज प्रसव - यदि जिन महिलाओं को हर तीसरे महीने गर्भपात हो जाता है, तो ऐसी स्थिति में उन गर्भावस्था महिला को ऐक्टिया रेसिमोसा 3x हर तीन घंटे बाद देना चाहिए । सैबाइना भी तीसरे महीने के गर्भपात को रोकता है। यदि जिन महिलाओं का गर्भपात पाँचवे या सातवें महीने में होता है, तो सीपिया 30 की प्रति चार घंटे में सेवन करने से गर्भपात नही होता । जिन महिलाओं को प्राकृतिक ही गर्भपात हो जाता है, उन्हें वाइबरनम की 4-5 बूंद प्रतिदिन दिया जाना चाहिए। ऐक्टिया रेसिमोसा के सेवन से प्रसव क्रिया सहज होती हैं और अन्तिम दिनों में सेवन से प्रसव पीड़ा मे कमी आती हैं । कॉलोफाइलम दवा लॉ पावर में प्रसव से एक माह पूर्व से प्रतिदिन देने से प्रसव पीड़ा में कमी आती हैं और प्रसव आसानी हो जाता हैं ।  

गठिया - इसके रोगी शीत प्रधान होते हैं, उनके शरीर में गठिया रोग ठंड के कारण उत्पन्न होते है। इसके रोगी की केवल मांसपेशियाँ और जोड़ों में ही नही बल्कि नसों में, स्नायु मार्ग में,यकृत व जरायु में लगभग शीत से पूरे शरीर में दर्द होता है। लेकिन सिर में वह ठंडी हवा चाहता है। 

शीत प्रधान रोगी - यह रोगी का 'व्यापक' रूप हैं और सिर में ठंडी हवा की इच्छा - यह रोगी का 'अकागी' रूप है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि जब रोगी का शारीरिक दर्द दब जाता हैं, तो फिर मानसिक लक्षण प्रकट हो जाते हैं। और मानसिक लक्षण प्रकट होने से शारीरिक लक्षण दब जाते हैं। इस दृष्टिकोण से इसे 'मूर्छा व वात ग्रस्त प्रकृति' का एक रोगी कहा जा सकता है। 

इस दवा के अन्य लक्षण 

  • प्रसव के बाद ठंड लग जाने से पागलपन जैसी हरकते व डिलीरियम हो जाना। 
  • प्रसव के बाद जरायु के नियमित सकोचन के न होने से मैले पानी न निकलने पर इस औषधि को दिया जाता है। 
  • जरायु मे अगर दर्द कभी इस और कभी उस ओर होता है, तो इस औषधि की सेवन की सलाह दी जाती है। यदि यह दर्द दाईं तरफ से बाई तरफ जाए तो लाइकोपोडियम दी जाती है और यदि बाई ओर से दाई तरफ जाए तो इपीकाक या लेकेसिस लेने की सलाह दी जाती है  जाता है। 
  • मासिक धर्म की खराबी के कारण स्नायु शूल मे लाभदायक होती है। 
  • एक्टिया रेसीमोसा का सिर दर्द आँख से शुरू होकर सिर की चोटी या गुध्दी तक फैला होता है। और स्पाइजेलिया का सिर दर्द इसका ठीक विपरीत होता है। एक्टिया रेसीमोसा का सिर दर्द रात से अधिक होता है, जबकि  स्पाइजेलिया  सिर दर्द दिन को अधिक होता है, सूर्योदय से शुरू होकर सूर्यास्त तक बना रहता है। और यदि प्रतिदिन दर्द एक ही समय बाई आँख के ऊपर हो तो सिड्रन बहुत ही उपयोगी साबित होती है । 

एक्टिया रेसीमोसा की पावर व प्रकृति - यह दवा 30, 200, 1000 व उच्च शक्ति में अच्छी तरह से काम करती है। यह औषधि शीत प्रकृति की होती है । इसका सेवन चिकित्सक सलाह से ही करे ।