शनिवार, 6 मार्च 2021

आर्सेनिकम आयोडेटम ( ARSENICUM IODATUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

आर्सेनिकम आयोडेटम ( ARSENICUM IODATUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक विवरण-

  • नाक या कान से लगने वाला अत्यधिक पीला स्राव 
  • यक्ष्मा रोग की प्रारंभिक अवस्था 
  • आर्सेनिकम आयोडेटम के कारण शीत तथा आयोडीन के कारण ऊष्ण प्रधान प्रकृति 
  • हृदय के रोग में फायदेमंद

आर्सेनिकम आयोडेटम की प्रकृति- खुली हवा में रहने से रोग के लक्षणों में कमी होती हैं। शुष्क हवा में, बंद कमरे में रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

नाक या कान से लगने वाला अत्यधिक पीला स्राव - साधारण जुकाम तथा पुराने जुकाम में इस औषधि का विशेष लाभ होता हैं । इसका स्राव अधिक नीला - पीला व पस जैसा होता हैं । जहां लगता है वहां काटता हैं । जब जुकाम क्रोनिक हो जाए तब आर्सेनिकम आयोडेटम अच्छा काम करती है । 

यक्ष्मा रोग की प्रारंभिक अवस्था - यक्ष्मा प्रकृति के रोगियों के लिये यह विशेष उपयोगिता रखती हैं । रोगी को तुरन्त ठंड लगकर जुकाम हो जाती है और लगातार नाक की शिकायत बनी रहती हैं । टी ० बी ० के रोगी में रक्त हीनता व पीलापन पाया जाता हैं, वज़न कम होता जाता है ।  जब यक्ष्मा रोग की प्राथमिक अवस्था हो , दोपहर को तापमान बढ़ जाता हो , पसीना आता हो , शरीर क्षीण हो रहा हो , इनके साथ अतिसार की शिकायत हो और खांसी रहती हो तो यक्ष्मा के इलाज के लिये यह प्रसिद्ध औषधि हैं । 

आर्सेनिक के कारण शीत तथा आयोडीन के कारण ऊष्ण प्रधान प्रकृति - अगर ठंड ज्यादा न हो तो रोगी खुली हवा पसन्द करता है , कमरे का दरवाजा व खिड़कियां खुली रखनी चाहता हैं, वह ठंडा पानी भी पसन्द नही करता और स्नान करने से उसे ठंड लग जाती हैं। इस औषधि में आर्सेनिक और आयोडीन का मिश्रण हैं। इसलिये इसके कई रोगी आर्सेनिक के कारण शीत प्रधान , और आयोडीन के कारण ऊष्ण प्रधान होते हैं। इसलिये यह दवा शीत व गरम दोनों प्रकृति की है, परन्तु मुख्य रूप से यह गरम प्रकृति की औषधि हैं । 

हृदय के रोग में फायदेमंद - हृदय के रोगों में आर्सेनिक आयोडेटम व कैटिगस दोनों दवा उपयोगी मानी गई हैं। इस दवा से हर प्रकार हृदय के रोगी ठीक हो जाते हैं । 

आर्सेनिक आयोडेटम की शक्ति व प्रकृति - यक्ष्मा में इस दवा का प्रयोग 4x शक्ति से शुरु करना चाहिए , औषधि ताजी होनी चाहिए और रोशनी से बचाकर रखना चाहिए । साधारण रोगों में 2 या 3 शक्ति की दवा का प्रयोग करना चाहिए । यह औषधि ' गर्म' प्रकृति की हैं ।


एरम ट्रिफाइलम औषधि ( ARUM TRIPHYLLUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फ़ायदे

एरम ट्रिफाइलम औषधि ( ARUM TRIPHYLLUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार से विश्लेषण-

  • होंठ और नाक को लगातार नोचने की इच्छा 
  • भयंकर खुश्क या बहता हुआ जुकाम 
  • गला बैठ जाना

एरम ट्रिफाइलम औषधि की प्रकृति -   भाषण देने, गायन, ठंडक से और गर्मी से ठंडक में आने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

होंठ और नाक को लगातार नोचने की इच्छा- किसी भी रोग में होंठ और नाक को लगातार नोचने की इच्छा हो , नोच कर रोगी खून तक निकाल लेता हैं। फिर भी कुरेदना बंद नहीं करता , इस अवस्था में एरम ट्रिफाइलम औषधि काम आती हैं ।  होंठ , मुख का खोल तथा नाक आदि की त्वचा छिल जाती है , खून निकलने लगता है , रोगी छिली जगह को भी नोचता रहता है , ऐसा करने से उसे दर्द होता है , परन्तु नोचने से नही रुकता । होंठ या नाक में ऐसी प्रबल खुजली  होती होती हैं, कि रोगी उस स्थान को नोचे बगैर चैन अनुभव न करता। होंठ से , नाक से खून बहे और वह फिर भी उस स्थान को नोचता रहै, यह " विशिष्ट - लक्षण ' हैं।  

भयंकर खुश्क या बहता हुआ जुकाम - इस औषधि में भयंकर जुकाम पाया जाता है । नाक बन्द हो जाती है , खासकर बांई नाक । रोगी मुख से सांस लेने को मजबूर हो जाता हैं । रात को लगातार छीकें आती हैं । यदि जुकाम खुश्क न होकर बहने वाला हो , तो नाक का पानी त्वचा के जिस भाग पर से बहता है वहाँ लाल निशान पड़ जाता है , नाक को रोगी अन्दर और बाहर से  छीलता रहता हैं । नाक से पानी बहने पर भी नाक बन्द रहती है । अत: इन लक्षणों में एरम ट्रिफाइलम औषधि लाभप्रद होती हैं।

गला बैठ जाना - गवैये , व्याख्याता , वकील या भाषण देने वाले जब तीन चार घंटे तक बोल कर ठंडे स्थान पर जाते हैं , तब हवा के लगने में उनका गला बैठ जाता हैं, तो एरम ट्रिफाइलम उन्हें अपना काम जारी रखने में सामर्थ्य प्रदान करती हैं , गला खुल जाता है । गला बैठने के लक्षण में एरम ट्रिफाइलम कारगर औषधि हैं।

एरम ट्रिफाइलम शक्ति व प्रकृति - यह औषधि निम्न शक्ति में अच्छा परिणाम नहीं देती और न ही इसे बार - बार देना चाहिए । क्योंकि इससे कुफल होता है । उच्च शक्ति मे ज्यादा कारगर लाभप्रद होती है ।


शुक्रवार, 5 मार्च 2021

आर्सेनिकम ऐल्बम ( ARSENICUM ALBUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फ़ायदे

आर्सेनिकम ऐल्बम ( ARSENICUM ALBUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन-

  • बैचेनी, घबराहट , मृत्यु भय और बेहद कमज़ोरी 
  • मृत्यु के समय की बैचेनी में आर्सेनिकम ऐल्बम शांत मृत्यु लाती हैं या मृत्यु से बचा लेते हैं 
  • जलन में गर्मी से आराम  
  • बार - बार व थोड़ी - थोड़ी प्यास लगना 
  • बाह्य त्वचा, अल्सर तथा गेंग्रीन पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव 
  • श्लैष्मिक झिल्ली पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव ( आँख , नाक , मुख , गला , पेट , मूत्राशय से जलने वाला स्राव ) 
  • समयानन्तर व पर्याय क्रम  के रोग 
  • रात्रिकालीन या दोपहर के बाद रोग का बढ़ना  
  • सफाई पसन्द स्वभाव

आर्सेनिकम ऐल्बम की प्रकृति - गर्मी से , गर्म पेय से, गर्म भोजन इच्छा, दमे में सीधा बैठने से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि ठंड , बर्फ , ठंडा पेय , ठंडा भोजन नापसन्द, दोपहर व मध्यरात्रि को रोग बढ़ना , 14 दिन बाद या साल भर बाद रोग का फिर से आक्रमण, अवरुद्ध स्राव या दाने और बरसात के मौसम में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

बैचेनी, घबराहट, मृत्यु भय और बेहद कमज़ोरी - बेचैनी इसका मुख्य लक्षण हैं । उसे कही पर भी चैन व आराम नहीं मिलता । रोगी कभी यहाँ बैठता है , कभी वहाँ । कभी यहाँ लेटता है, कभी वहाँ , कभी इस कुर्सी पर बैठता है , कभी दूसरी पर ।  इस प्रकार की बैचेनी में यह दवा उत्तम हैं । रोग की शुरुआत में जो बेचैनी होती हैं, उसमे एकोनाइट दे सकते हैं, परन्तु जब रोग जब बढ़ जाता है तब बैचेनी के लिये यह औषधि अधिक उपयुक्त होती हैं । इस बैचेनी में रोगी घबरा जाता है , कि उसे मृत्यु का भय लगने लगता हैं ।  रोगी लगातार कमजोर होता जाता हैं।  इस कमज़ोरी के कारण रोगी अब चल फिर भी नहीं सकता। जब कमज़ोरी बैचेनी का परिणाम हो , तब पूर्व बैचेनी और वर्तमान कमज़ोरी के लक्षणों के आधार पर आर्सेनिक ऐल्बम दी जाती हैं । बच्चों की बेचैनी में देखना चाहिए कि बच्चा कभी माँ की गोद में जाता हैं , कभी नर्स की गोद में , कभी बिस्तर पर,  किसी हालत में उसे चैन नही पड़ता , तो आर्सेनिकम ऐल्बम ही उसे ठीक कर सकती हैं । 

बैचेनी में एकोनाइट और आर्सेनिकम ऐल्बम की तुलना - एकोनाइट का रोगी बलिष्ठ और तन्दुरुस्त होता हैं। उसको अचानक रोग होता हैं, और उसे भी मौत भय रहता हैं, परन्तु वह शीघ्र ही दवा के प्रयोग से ठीक हो जाता हैं। आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी मौत के मुख से निकल भी आया तो भी उसे पूरी तरह स्वस्थ होने में देर लगती हैं । रोग की प्रथमावस्था में एकोनाइट के लक्षण होते हैं , रोग की भयंकर अवस्था में आर्सेनिकम ऐल्बम के लक्षण होते हैं। 

मृत्यु के समय की बैचेनी में आर्सेनिकम ऐल्बम शांत मृत्यु लाती हैं या मृत्यु से बचा लेते हैं - मृत्यु सिर पर खड़ी होने पर सारा शरीर निश्चल हो जाता हैं , शरीर पर ठंडा पड़ जाता हैं और चिपचिपा पसीना आ जाता हैं । ऐसा हैजा या किसी भी अन्य रोग में भी हो सकता हैं । इस समय दो ही रास्ते होते हैं, या तो रोगी की शांति से मर जाए , या वह मौत के मुख से बाहर निकल आए । ऐसे में होम्योपैथी की दो दवाए  आर्सेनिकम ऐल्बम और कार्बोवेज ठीक कर सकती हैं। ऐसे समय दोनों में से उपयुक्त दवा की उच्च - शक्ति की एक मात्रा या तो रोगी को मृत्यु के मुख से खींच लाती हैं , या उसे शान्तिपूर्वक मरने देती हैं ।  

जलन में गर्मी से आराम - आर्सेनिकम ऐल्बम का यह ' विशेष लक्षण है कि जलन होने पर भी गर्मी से उसे आराम मिलता हैं । फेफड़े में जलन हो तो रोगी सेक करना चाहेगा , पेट में जलन हो तो वह गर्म चाय , गर्म दूध पसन्द करेगा , ज़ख्म में जलन हो तो गर्म पुलटिस लगवायेगा , बवासीर की जलन हो तो गर्म पानी से धोना चाहेगा । इसमें अपवाद मस्तिष्क की जलन है , उसमे वह ठंडे पानी से सिर धोना चाहता हैं । आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी सारा शरीर कम्बल से लपेटे रखता हैं, परन्तु सिर उसका ठंडी हवा चाहता हैं । 

आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी शीत प्रधान होता है , परन्तु शीत प्रधान होते हुए भी उसे जलन होती है , और जलन में उसे गर्मी से आराम मिलता हैं । यह इसका सर्वांगीण और व्यापक लक्षण हैं । सिर दर्द में उसे ठंडक से आराम मिलता हैं । यह सर्वांग और एकांग का परस्पर विरोध हैं । इस प्रकार ध्यान देना होगा कि अंगो के " विशिष्ट लक्षण ' का उस औषधि के उस अंग के विशिष्ट लक्षण से साम्य है या नहीं , और व्यक्ति के जो विशिष्ट लक्षण हैं उनका उस औषधि का उस व्यक्ति पर पाये जाने विशिष्ट लक्षणों से साम्य है या नहीं और जिन औषधियों में सर्वांग और एकाग के लक्षणों में विरोध है उसे ध्यान में रखते हुए सर्वांग के व्यापक लक्षणों को प्रधानता देनी चाहिए । 

मस्तिष्क की गर्मी को ठंडे पानी से आराम मिलता है , तो भी खोपड़ी की जलन , जो वाय के कारण होती है , उसे गर्मी से ही आराम मिलता हैं । वह खोपड़ी को कपड़े से लपेटे रखता हैं । जलन के साथ दर्द भी हो , अगर उसमे गर्म सेक से आराम मिले , तो आर्सेनिकम ऐल्बम अच्छी दवा हैं । यदि जलन के साथ सिर दर्द, आखो में दर्द , नाक में दर्द , गले में, पेट में, आतों , बवासीर के मस्सो में , मूत्राशय में, गर्भाशय में , डिम्ब कोष में , जननेन्द्रिय में, छाती में , स्तन में, हृदय में , मेरूदंड में , जख्म में , त्वचा में कही भी हो सकता हैं । ऐसा लगता हैं कि धमनियों में बहते रूधिर में आग लगी गई हो । ऐसे लक्षणों में अगर गर्मी से आराम मिलता हो तो आर्सेनिकम ऐल्बम ही सबसे उपयुक्त औषधि हैं । 

बार - बार व थोड़ी - थोड़ी प्यास लगना - इस औषधि में बार - बार व थोड़ी - थोड़ी प्यास लगना इसका खास लक्षण हैं , परन्तु इस प्यास की एक विशेषता हैं । रोगी बार बार पानी पीता हैं और थोड़ा- थोड़ा पीता हैं । प्राय देखा जाता हैं कि रोग में एक अवस्था आगे चल कर दूसरी विरोधी अवस्था में बदल जाती हैं ।  प्रारंभ में प्यास , और रोग के बढ जाने पर प्यास की कमी आर्सेनिकम ऐल्बम का ही लक्षण हैं ।   

बाह्य त्वचा, अल्सर तथा गेंग्रीन पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव - आर्सेनिकम ऐल्बम के रोगी की त्वचा सूखी , मछली के छिलके के समान होती है , उसमें जलन होती है । फोडे - फुंसियां आग की तरह जलती हैं । सिफिलिस के अल्सर होते हैं जो बढ़ते चले जाते हैं , ठीक नहीं होते उनमें जलन और सडंन होने लगती हैं । अगर शोथ के बाद फोड़ा बन जाए और सड़ने लगे या गेंग्रीन बनने लगे तो यह औषधि बहुत लाभप्रद हैं । 

श्लैष्मिक झिल्ली पर आर्सेनिकम ऐल्बम का प्रभाव ( आँख , नाक , मुख , गला , पेट , मूत्राशय से जलने वाला स्राव ) - आर्सेनिकम ऐल्बम के रोगी का स्राव जहाँ लगता हैं , वहा जलन पैदा करता हैं। जैसे - 

>> जुकाम में जलन - जिसे जुकाम से पानी बहता हो तो वो होठों पर लगने पर जलन पैदा कर देता हैं , नाक में भी जलन करता है , नाक छिल जाता है, अगर रोगी को गरम पानी से आराम मिले तभी यह दवा ले। 

>> मुख के छालो में जलन - जब मुख में छाले पड़ जाए और उनमें जलन हो , और गरम पानी से लाभ हो तो इस औषधि का उपयोग करे । 

>> गले में टांसिलों में शोथ व जलन - गले मे जलन और शोथ के साथ गर्म पानी के सेक से आराम मिलने पर अन्य लक्षणों को ध्यान में रखते हुए यह दवा उपयोगी हैं ।

>> पेट में शोथ व जलन - पेट का अत्यंत नाजुक होना , एक चम्मच ठंडा पानी पीने से भी उल्टी हो जाना , गर्म पानी से थोड़ी देर के लिये आराम मिलना, पाचन प्रणाली में सूजन । जो भी खाए उल्टी कर दे और जलन होना , बाहर से गर्म सेक से आराम मिलना । रोगी इतना बेचैन हो जाता है कि टहलने फिरने से भी उसे चैन  नही मिलता और अंत में इतना शिथिल हो जाता है कि वह बिलकुल भी चल-फिर नही सकता ।  

>> मूत्राशय में शोथ व जलन - मूत्राशय में जबरदस्त शोथ हो , बार - बार पेशाब आता हो , मूत्र में रक्त मिला हो , रक्त के थक्के भी आ रहे हो । और साथ ही रोगी को शुरू में बेचैनी रही हो , घबराहट , मृत्यु - भय,बेहद कमजोरी हो और सेक से रोगी को आराम मिलता था , तब रोगी को आर्सेनिकम ऐल्बम दी जाती हैं।  

समयानन्तर व पर्याय क्रम  के रोग - रोग का समयानन्तर से  प्रकट होना इस औषधि का विशिष्ट - लक्षण हैं । इसी कारण मलेरिया ज्वर में यह विशेष उपयोगी दवा हैं । जब हर दूसरे दिन , चौथे दिन , सातवें या पन्द्रहवें दिन ज्वर आता हैं । सिर - दर्द भी हर दूसरे दिन , हर तीसरे , चौथे , सातवें या चौदहवें दिन आता हैं । रोग जितना पुराना होता है उतना ही उसके आने का व्यवधान लम्बा होता हैं । अगर रोग नया है तो रोग की उत्पत्ति हर तीसरे या चौथे दिन होता है , अगर पुराना है तो सातवें दिन , अगर रोग सोरिक है तो चौदहवें और पंद्रहवे दिन । इस दृष्टि से मलेरिया में आर्सेनिकम ऐल्बम अधिक उपयुक्त दवी हैं । 

>> ' समयानन्तर ' का सिरदर्द  - मलेरिया की तरह आर्सेनिकम ऐल्बम में ऐसा सिरदर्द होता है जो हर दो सप्ताह के बाद आता है । रोगी बेचैन रहता है , घबराता हैं । नए रोग में पानी बार - बार पीता है, लेकिन पुराने रोग में प्यास नहीं लगती , सिर पर ठंडा पानी डालने से आराम मिलता है और खुली हवा में घूमना चाहता है, मध्य रात्रि में एक से दो बजे तकलीफ होती है , कभी - कमी यह तकलीफ दोपहर के एक से दो बजे से सिरदर्द शुरू होकर सारी रात रहता हैं । समयानन्तर आने वाले इस सिरदर्द में अन्य लक्षणों को भी देखकर आर्सेनिकम ऐल्बम देना लाभकारी होता हैं ।  

रात्रिकालीन या दोपहर के बाद रोग का बढ़ना - आधी रात के बाद या दोपहर को एक से दो बजे के बाद रोग ( दमे ) का बढ़ना इसका चरित्रगत लक्षण हैं ।  बुखार , खांसी , हृदय की धड़कन किसी भी रोग में मध्य - रात्रि या दोपहर में रोग का बढ़ना आर्सेनिकम ऐल्बम का लक्षण हैं । 

सफाई पसन्द स्वभाव - रोगी का स्वभाव सफाई पसंद होता है । वह गंदगी या अनियमितता को बर्दाश्त नहीं कर सकता । अगर उसे किसी बात से परेशानी है और जबतक वह परेशानी ठीक नही हो जाती तबतक परेशान रहता हैं । 

आर्सेनिकम ऐल्बम औषधि के अन्य लक्षण 

>> हैजे का दस्त , डायरिया , डिसेंट्री - इस रोग मे कैम्फर , क्यूप्रम और वेरेट्रम ऐल्बम देना चाहिए ।  परन्तु इन तीनों के अलावा आर्सेनिकम ऐल्बम भी हैजे की अच्छी दवा हैं । पानी की तरह पतला दस्त , काला और दुर्गन्धयुक्त दस्त , बेचैनी , प्यास , मृत्यु - भय , कमजोरी आदि लक्षण होने पर यह औषधि उपयोगी हैं । आर्सेनिकम ऐल्बम के डायरिया और डिसेन्ट्री में घबराहट , दुर्गन्धयुक्त मल , बेचैनी और अत्यंत कमजोरी प्रधान लक्षण है । कमजोरी इतनी हो जाती है कि मूत्र और मल अपने आप निकल जाता हैं । ऐसी स्थिति भी आ जाती है कि रोगी मृतप्राय हो जाता है , सिर्फ सांस चलती है । मल लगता हुआ , जलन के साथ निकलता है । डिसेन्ट्री में ऐंठन होती है , टट्टी जाने की इच्छा बनी रहती है , आंतों में , गुदा में अत्यंत बेचैनी अनुभव होती हैं, दर्द इतना होता है कि रोगी मृत्यु के अलावा कुछ  नहीं सोच सकता । 

>> रक्तस्राव - आर्सेनिकम ऐल्बम रक्तस्राव की औषधि  है । रक्तस्राव किसी भी अंग से हो सकता हैं । अगर इस रक्तस्राव का इलाज न हो, तो कुछ समय बाद यह गेंग्रीन में बदल जाता हैं। उल्टी मे और टट्टी में काला, थक्केदार रुधिर जाने लगता हैं । रक्तस्राव के कष्ट में रोगी बेचैनी की हालत में होता हैं और अत्यधिक क्षीण, दुर्बल दशा में पहुंच जाता है , इस दुर्बलता में उसे ठंडा पसीना आने लगता हैं। रक्तस्राव का ही एक रूप खूनी बवासीर है, इसमें रोगी के मस्सों में खुजली और जलन होती है, इस दशा में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 

>> ज्वर - ज्वर में शीत , ताप और स्वेद - ये तीन अवस्थाए होती हैं । आर्सेनिकम ऐल्बम के ज्वर में शीत अवस्था में प्यास नहीं लगती , ताप अवस्था में थोड़ी प्यास लगती है , स्वेद अवस्था में खूब प्यास लगती है , जितना पसीना आता है, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती हैं । अगर समयानन्तर ज्वर हो ( मलेरिया ) तो इन लक्षणों में आर्सेनिकम ऐल्बम ज्वर को जल्दी ठीक कर देती हैं।  

>> खांसी या श्वास कष्ट -  खांसी आने के बाद श्वास कष्ट होने पर इस औषधि से लाभ होता है ।  खुश्क खांसी जिसमें रोगी थोड़ी - थोड़ी देर में खांसता हैं, जो ठीक होने में नही आती , न कफ बनता है , न निकलता है । ऐसी खांसी में आर्सेनिकम ऐल्बम से लाभ होता हैं ।

>> आर्सेनिकम ऐल्बम का रोगी शीत प्रधान होता है, वह गरम वातावरण चाहता हैं । हर समय गर्म कमरे मे रहना चाहता है । 

आर्सेनिकम ऐल्बम की शक्ति व प्रकृति - पेट , आंतो तथा गुर्दे की बीमारियों में निम्न शक्ति लाभ पहुँचाती है, स्नायु संबंधी बीमारियों तथा दर्द के रोगों में उच्च शक्ति लाभप्रद होती है । अगर सिर्फ त्वचा के बाह्य रोगों में 2x व 3x  उपयुक्त होती हैं, जिसे दोहराया जा सकता हैं । दमे मे 30 शक्ति और पुरानी बीमारी में 200 शक्ति लाभदायक होती हैं । यह औषधि ' सर्द ' प्रकृति की हैं ।


गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

आर्निका मौन्टेना ( ARNICA MONTANA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

आर्निका मौन्टेना  ( ARNICA MONTANA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन-

  • चोट से शरीर में कुचले जाने सा अनुभव 
  • चोट लगने से किसी भी पुराने रोग की उत्पत्ति
  • बिस्तर का कठोरपन के कारण करवटें बदलते रहना 
  • टाइफॉयड में आर्निका मौन्टेना के लक्षण व फायदें
  • गठिया रोग में आर्निका मौन्टेना के लक्षण व फायदें
  • गर्भावस्था व प्रसव के बाद आर्निका मौन्टेना के फायदें 
  • किडनी , ब्लैडर , लिवर व न्यूमोनिया में आर्निका मौन्टेना का उपयोग

आर्निका मौन्टेना औषधि की प्रकृति - सिर नीचा करके लेटने व अंग फैलाकर लेटने से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि शरीर पर चोट या रगड़ से, खाने से,  शारीरिक व मानसिक आघात से, शारीरिक श्रम, मोच, हिलने - डुलने और वृद्धावस्था में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

चोट से शरीर में कुचले जाने सा अनुभव - जब चोट के कारण ऐसा अनुभव हो कि सारा शरीर कुचल गया हैं , शरीर को हाथ लगाने से ही दर्द होता है । ऐसा सारे शरीर में किसी अंग में हो सकता हैं । रोगी किसी को भी अपना अंग छूने नहीं देता । चोट लगने में सबसे पहले आर्निका मौन्टेना की तरफ ध्यान जाता हैं, और ज्यादा असरकारक मानी जाती हैं।  

चोट लगने से किसी भी पुराने रोग की उत्पत्ति - अगर चोट लगने से कोई भी पुराना रोग शुरु हुआ हो, चाहे चोट लगे कितने ही वर्ष बीत गये हो, उसे आर्निका मौन्टेना ठीक कर देती हैं । जैसे- चोट लगने के बाद मृगी आना , ऐंठन , हृदय की धड़कन , नकसीर , गठिया आदि रोग हो तो आर्निका मौन्टेना देना चाहिये । जिन लोगों के शरीर पर किसी शारीरिक घाव का प्रभाव बना रहे , चाहे वह घाव सामान्य ही क्यों न हो, उसमें  आर्निका मौन्टेना लाभ पहुँचाती हैं। 

बिस्तर का कठोरपन के कारण करवटें बदलते रहना - रोगी के सारे शरीर में चोट लगने जैसा दर्द होता हैं । रोगी जिस तरफ भी लेटता हैं, उसे बिस्तर कठोर लगता हैं । इस कारण वह मुलायम जगह ढूंढने के लिये करवटें बदलता रहता हैं । 

टाइफॉयड में आर्निका मौन्टेना के लक्षण व फायदें -  ज्वर में जब टाइफॉयड के लक्षण प्रकट होने लगें । जैसे- जब जीभ चमकदार हो जाए, दातों और होठों पर दुर्गन्धयुक्त मल जमने लगे , जी घबराए और संपूर्ण शरीर में कुचले जाने जैसी पीड़ा हो, तब आर्निका मौन्टेना देने से टाइफॉयड़ की तरफ जाने से रोगी बच जाता हैं। टाइफॉयड़ की दूसरी औषधि बैप्टीशिया हैं। परन्तु दोनों के लक्षण एक  जैसे हो सकते हैं , परन्तु दोनों में अन्तर हैं । 

गठिया रोग में आर्निका मौन्टेना के लक्षण व फायदें - पुरीने से पुरीने गठिया का रोगी जोड़ों में नाजुकपन व दर्द अनुभव करता हैं। जोड़ों के दर्द में आर्निका मौन्टेना की एक खुराक देने से तकलीफ दूर हो जाती हैं । 

गर्भावस्था व प्रसव के बाद आर्निका मौन्टेना के फायदें - गर्भावस्था में माता के जरायु तथा कोख में नाज़ुकपन आ जाता हैं। जिससे भ्रूण के हिलने - डुलने से भी गर्भाशय में दर्द होने लगता हैं और रात को नींद नही आती । इस दशा में आर्निका मौन्टेना की 200 शक्ति की एक मात्रा देने से दर्द शांत हो जाता हैं । इसी प्रकार प्रसव के बाद आर्निका मौन्टेना की उच्च शक्ति की एक मात्रा देने से सेप्टिक होने का खतरा नही रहता । प्रसव के बाद माता को मूत्र न आने पर भी आर्निका मौन्टेना उपयोगी होती हैं । 

किडनी , ब्लैडर , लिवर व न्यूमोनिया में आर्निका मौन्टेना का उपयोग - यदि टीबी , अल्सर, कैंसर या न्यूमोनिया, ये रोग जिस प्रकिया से गुजरते हैं , उस प्रक्रिया में गुजरते हुए ये घातक रोग हो जाते हैं । इसी आधार पर इसे आर्निका मौन्टेना का गुण समझ लिया जाता है । अगर गुर्दे , मूत्राशय , यकृत् आदि के रोग में शरीर के शोथ के साथ संपूर्ण शरीर में कुचले जाने की अनुभूति हो , तो आर्निका मौन्टेना अवश्य लाभ करती हैं । होम्योपैथिक में रोग का इलाज नहीं होता , रोगी का इलाज होता हैं।  

आर्निका मौन्टेना औषधि के अन्य लक्षण 

> ज्वर में आर्निका मौन्टेना के रोगी का सिर तथा शरीर का ऊपरी हिस्सा गर्म होता है और हाथ पैर तथा नीचे के भाग ठंडे होते हैं । 

> अपेन्डिसाइटिस में अगर चिकित्सक को ब्रायोनिया , रसटॉक्स , वेलाडोना और आर्निका मौन्टेना की पूरी जानकारी हो , तो रोगी को सर्जन के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती । लेकिन रोग का बार - बार आक्रमण न होता हो । 

> मानसिक लक्षण - आर्निका मौन्टेना का रोगी किसी को अपने पास नहीं आने देता, क्योंकि वह किसी से बातचीत नही करना चाहता और उसका शरीर कुचले जाने के दर्द से इतना व्याकुल होता हैं, कि किसी के छूने से भी डरता हैं । वह बात इसलिये नहीं करता क्योंकि वह चिड़चिड़ा , दुखी , शोकाकुल , भयभीत रहता हैं , वह मानता है कि वह किसी भयानक रोग से पीड़ित हैं । आर्निका मौन्टेना के रोगी को रात को सपने में मृत्यु का होता हैं । रात को तरह - तरह के डरावने सपने आते है, तो आर्निका मौन्टेना लाभप्रद होती हैं । 

आर्निका मौन्टेना औषधि की शक्ति - यह औषधि 3, 30, 200 व 1000 की शक्ति में उपलब्ध हैं ।


शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

अर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि के ( ARGENTUM NITRICUM ) व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

अर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि के ( ARGENTUM NITRICUM ) व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें विस्तार पूर्वक -

  • शरीर दुबला पतला, बुढ़ापे जैसी झुर्रियां, नीचे का धड़ दुबला 
  • नीचे से ऊंचे मकानों और ऊपर से नीचे देखने पर डर लगना
  • किसी बात से घबराहट होना  
  • कहीं जाने की घबराहट में दस्त आना और मानसिक श्रम से रोग 
  • मीठा खाने की इच्छा परन्तु मीठे से पेट खराब होना, हरे घास जैसे दस्त आ जाना 
  • पेट में हवा की अधिकता व अपचन 
  • गले मे फांस जैसी चुभन 
  • आँख के रोग  
  • दायीं करवट लेटने से धड़कन 
  • गला बैठना और गले में दर्द 
  • अर्जेन्टम नाइट्रिकम का रोगी ऊष्णता प्रधान होता हैं

अर्जेन्टम नाइट्रिकम की प्रकृति -  ठंडी हवा , ठंडे स्नान से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं।  जबकि खुली हवा में, घबराहट से , इंतजार से, मानसिक श्रम से , मीठा खाने से , बंद कमरे में , भीड़ में और दायीं करवट लेटने से रोग के  लक्षणों में वृद्धि होती हैं।


शरीर दुबला पतला, बुढ़ापे जैसी झुर्रियां, नीचे का धड़ दुबला - इस दवा का रोगी दुबला - पतला , जवानी में बुढ़ापा, क्षीण शरीर , चेहरे पर झुर्रियां , प्रतिदिन दुबला होता जाना। इसके रोगी का निचला धड अधिक दुबला हो जाता हैं। सूखे के रोग में यह औषधि लाभ पहुँचाती हैं। 


नीचे से ऊंचे मकानों और ऊपर से नीचे देखने पर डर लगना - इसका रोगी ऊचे - ऊचे मकानों को देखने से डर जाता है, शरीर कांपने लगता हैं , और पसीना आने लगता हैं । इसी प्रकार ऊँची जगह से नीचे देखने पर भी डर जाता हैं ।  ऊँची जगह पर बैठे हुए सोचने लगता हैं कि यहाँ से गिर पड़ना कितना भयानक होगा । कभी - कभी यह विचार उस पर इतना हावी हो जाता हैं, कि वह सचमुच इस ऊंचाई से नीचे जा गिर जाता हैं । मृत्यु का भय उसे घेरे रहता हैं और अपनी मृत्यु के समय की भविष्यवाणी कर देता हैं । 


किसी बात से घबराहट होना - जब कोई काम करना होता है, जब तक वह काम नहीं हो जाता , तब तक वह मस्तिष्क की कमजोरी के कारण घबराता रहता हैं । उसका जी घबराता रहता है । रात को नींद नहीं आती । अगर किसी से मिलने जाना हो, जब तक मिल नहीं लेता तब तक का समय घबराहट में बीतता हैं । घबराहट में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 


कहीं जाने की घबराहट में दस्त आना और मानसिक श्रम से रोग - अगर रोगी किसी शादी में , सिनेमा देखने , मंदिर में, रोजमर्रा के अलावा किसी अन्य काम को करना हैं , तो भय और चिन्ता उसे इतना व्याकुल कर देती हैं, कि शौच जाना पड़ जाता हैं । किसी - किसी को तो दस्त भी आ जाता हैं । ये सब स्नायु मंडल की कमजोरी के लक्षण हैं । इस औषधि में मानसिक श्रम से उत्पन्न रोग पाए जाते हैं । उदाहरणार्थ - मानसिक श्रम से रोग मस्तिष्क की इसी कमजोरी का परिणाम हैं, कि इस औषधि में असाधारण मानसिक श्रम से या देर तक मानसिक कार्य करते रहने से कई रोग हो जाते हैं । उन्हें यह दवा दूर कर देती है । मानसिक श्रम से मन की थकान, सर्वांगीण थकान , कमजोरी , सुन्नपन , पक्षाघात , हृदय की धड़कन , कंपन आदि स्नायविक रोग हो जाते हैं, पेट में गैस भर जाती हैं, खाना हजम नहीं होता, ऐसे रोगी इस औषधि से ठीक हो जाते हैं । 


मीठा खाने की इच्छा परन्तु मीठे से पेट खराब होना, हरे घास जैसे दस्त आ जाना - इसके रोगी को मीठे खाने की अधिक इच्छा होती हैं, परन्तु मीठा उसे नुकसान पहुंचाता है, उसका पेट खराब हो जाता हैं , पेट में हवा भर जाती है , खट्टी डकारें आने लगती हैं, वह मीठे को पचा नहीं पाता , उसे  दस्त आने लगते हैं । मीठे का इस रोगी पर इतना खराब प्रभाव पड़ता हैं कि माता अगर मिठाई की शौकीन होती हैं , तो उसके दूध पीते बच्चे को दस्त आने लगता हैं ।  दस्तो पर ध्यान न देकर इसके सर्वांगीण व व्यापक लक्षण पर ध्यान देकर इस दवा प्रयोग लाभप्रद होता हैं । 


पेट में हवा की अधिकता व अपचन - पेट मे हवा भरना इस औषधि का प्रमुख लक्षण हैं । पेट में हवा गड़गड़ाती है, जिसे रोगी निकाल नहीं पाता । जब हवा निकलती हैं, तो अधिक मात्रा में निकलती हैं । हवा से पेट ऐसे फूल जाता है, जैसे फट जाएगा । हवा के इस लक्षण के कारण रोगी अपचन का शिकार हो जाता हैं । अर्जेन्टम नाइट्रिकम के रोगी के पेट में दर्द होता हैं। यह दर्द एक स्थान से पेट में  चारों तरफ जाता हैं । यह दर्द धीरे - धीरे उठता है और धीरे - धीरे ही कम हो जाता हैं । यह दर्द आइस क्रीम या ठंडी वस्तुएँ खाने से होता है । जब यह दर्द बहुत बढ़ जाता हैं तब रोगी लेसदार श्लेष्मा को वमन करता हैं । रोगी को ज़ोर - ज़ोर की डकारें आने लगती हैं । अगर इन लक्षणों पर यह दवा दी जाए , तो पेट की शोथ व अल्सर भी ठीक हो जाता हैं । अगर रोगी मीठा खाता हो , और तब ये उपद्रव उत्पन्न हो , तो  यह औषधि अधिक लाभ करता हैं । 


गले मे फांस जैसी चुभन - इस औषधि में गले की शोथ के लक्षण के साथ निगलते समय गले में फांस की - सी चुभन का होती हैं । यह लक्षण हिपर तथा नाइट्रिक एसिड में भी हैं , सिर्फ अंतर यह है कि अर्जेन्टम नाइट्रिकम का रोगी ऊष्णता प्रधान है , ठंडा कमरा,ठंडा पेय व ठंडी हवा पसन्द करता हैं।  हिपर का रोगी गर्म चीज़ पीना, गर्म कपड़े पसंद करता हैं, ठंड से डरता हैं । गले में ऐसी चुभन होती हैं, जैसे मछली की हड्डी अटकी हो । गले मे फांस की चुभन कई दवाइयों में हैं । अगर गले में पुराना अल्सर हो , तो अर्जेन्टम नाइट्रिकम बहुत उपयोगी औषधि हैं । गले की खराश, दर्द , गाढ़ा कफ जिसे बार - बार खरखराना पड़ता हैं, तो  इममे यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 


आँख के रोग - स्त्रियाँ सीने - पिरोने में आंख पर बहुत जोर देती हैं, इस से आँख पर बोझ पड़ता हैं और आँखे दुखने लगती हैं। छोटे अक्षरों को पढ़ने से भी आंखें थक जाती हैं । ऐसी अवस्था में इस औषधि से लाभ होता है । रोगी पढ़ते समय पुस्तक को पास से न देखकर बूढों की तरह दूर से देखता हैं । अर्जेन्टम नाइट्रिकम का सबसे ज्यादा लाभ आँख आने पर होता हैं, जब आंख लाल हो जाए और उसमे से गीद निकलने लगे है । आँख की भीतरी सूजन , जबर्दस्त लाली , आँख से पस का प्रवाह , आँख में धुंध का आ जाना, आँख के किसी भी कष्ट में इस दवा से तुरंत लाभ होता हैं । 


दायीं करवट लेटने से धड़कन - दायीं तरफ लेटने से रोगी की धडकन बढ़ गई ऐसा अनुभव करता हैं । अर्जेन्टम नाइट्रिकम का यह ' विलक्षण - लक्षण ' हैं । यह विलक्षण - लक्षण एलूमेन , बैडियागा , कैलमिया , कैलि नाइट्रिकम , लिलियम टिग , प्लैटिना और स्पंजिया में भी पाया जाता हैं । अर्जेन्टम नाइट्रिकम का यह लक्षण इतना प्रबल हैं कि इसे इसका ' व्यापक - लक्षण ' कहा जाता हैं । यह हृदय से संबंध रखने वाला लक्षण हैं, इसलिये इसका बड़ा महत्व हैं । रोगी कहता हैं कि जब वह दाई करवट लेटता हैं, तब सिर से पैर तक धड़कन होने लगती है । 


गला बैठना और गले में दर्द - गायकों का गला बैठ जाना जिस वजह से वह गा नहीं सकता, गले में दर्द रहना अर्जेन्टम नाइट्रिकम व अर्जेन्टम मेटैलिकम दोनों में होता हैं , परन्तु इस लक्षण में अर्जेन्टम मेटैलिकम का अधिक अधिक कारगर होती हैं । 


अर्जेन्टम नाइट्रिकम का रोगी ऊष्णता प्रधान होता हैं -  अर्जेन्टम नाइट्रिकम ऊष्ण प्रकृति की औषधि हैं । इस औषधि का रोगी ठंडी हवा पसन्द करता है । ठंडा पानी , आइस क्रीम का शौकीन होता हैं | गर्म कमरे मे दम घुटता हैं, दरवाजे और खिड़कियां खोल देना चाहता है । भीड़ वाली जगहों पर सांस लेना कठिन होता हैं, तो यह दवा लाभ पहुँचाती हैं । 


अर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि के अन्य लक्षण 


> चक्कर आना - ऊंची अट्टालिकाओं को देखने में चक्कर आ जाता हैं , कम्पन्न और कमज़ोरी अनुभव करता हैं । ये सभी लक्षण जेलसीमियम में भी पाये जाते हैं, परन्तु नई बीमारी में जेलसीमियम और  पुरानी बीमारी में अर्जेन्टम नाइट्रिकम दी जाती हैं । 


> अघसीसी का दर्द  - अघसीसी के दर्द में यह अत्युत्तम औषधि हैं । रोगी यह अनुभव करता है कि सिर फैल गया है और बड़ा हो गया हो । सिर को लपेटने से रोगी को आराम मिलता हैं । 


> रोगी अनुभव करता है कि हर बात में देरी हो रही हैं । सब काम जल्दी - जल्दी करना चाहता हैं और चलने की जगह भागता हैं । 


> दिन - रात मूत्र  निकलता रहता हैं । मूत्र निकलने का लक्षण कॉस्टिकम में भी होता हैं । 


> संभोग के समय उत्तेजना जाती रहती हैं । एगनस , कलैडियम , सिलेनियम में भी यह लक्षण हैं । 


अर्जेन्टम नाइट्रिकम की शक्ति व प्रकृति - यह औषधि 3 , 30 , 200 की शक्ति में उपलब्ध हैं । यह औषधि ' गर्म ' प्रकृति की हैं ।


बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

अर्जेन्टम मेटैलिकम औषधि( ARGENTUM METALLICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

अर्जेन्टम मेटैलिकम औषधि( ARGENTUM METALLICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन -

  • स्नायु, स्नायु परिवेष्टन, कुरकुरी हड्डियाँ पेशी बन्धनों पर क्रिया 
  • विद्यार्थियों, विचारको व व्यापारियों की मानसिक थकावट 
  • स्वर का लोप होना  
  • फेफड़े , गले , योनिद्वार , मूत्रद्वार , आँख से भूरे रंग का स्राव 
  • सोने पर बिजली के धक्के जैसा अनुभव  
  • बहुमूत्र , खुश्क मुख , भरपेट खाने के बाद भी भूख , गिट्टो में सूजन 
  • दुर्व्यसनों से नपुसंकता व स्वप्नदोष

अर्जेन्टम मेटैलिकम औषधि की प्रकृति - सिर लपेटने से, चलने - फिरने से , गति से रोग के लक्षणों मे कमी होती हैं। बोलने से , मानसिक श्रम से, दोपहर को,  ठंड से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।


स्नायु, स्नायु परिवेष्टन, कुरकुरी हड्डियाँ पेशी बन्धनों पर क्रिया - स्नायु जिस मार्ग से जाता है उस पर दर्द होता है । शरीर में अनेक स्थानों पर कुरकुरी हड्डियाँ होती है जिन्हें कार्टिलेज कहते हैं, इसमें इनमें दर्द होता हैं । जोड़ों की हड्डियों मे दर्द व गठिये में यह विशेष लाभ करती हैं । कई रोगियों के नाक के भीतर की हड्डी बढ़ जाती है जिससे सास लेने मे कष्ट होता हैं । सर्जन चिकित्सक इस हड्डी की सर्जरी करते हैं, परन्तु अर्जेन्टम मेटैलिकम से यह ठीक हो जाती हैं । जहाँ - जहाँ कार्टिलेज बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। वहाँ - वहाँ इस औषधि का प्रयोग होता है । कभी - कभी आँख की पलके भी मोटी हो जाती हैं,  हड्डी जैसी बन जाती हैं । उस रोग में भी इस औषधि से लाभ होता हैं । 


विद्यार्थियों, विचारको व व्यापारियों की मानसिक थकावट - इस औषधि की मुख्य विशेषता व लक्षण यह हैं कि इसका मानसिक शक्तियों पर प्रभाव पड़ता हैं । जैसे- इसमें रोगी की स्मरण शक्ति, विचार शक्ति का ह्रास होता हैं । विद्यार्थियों , विचारकों , पढने लिखने वाले , व्यापारी आदि जो लोग मानसिक श्रम करते हैं। इनकी विचार शक्ति इतनी गिर जाती हैं, कि वे थोड़ा सा मानसिक श्रम करते ही थक जाते हैं, उन्हें चक्कर आने लगते हैं । एक जवान आदमी मानसिक दृष्टि से इतना थका हुआ लगता हैं, कि मानो साठ साल का हो, ऐसे में इस औषधि का उपयोग उत्तम माना जाता हैं । 


स्वर का लोप होना - जब गला बैठ जाता हैं और बोलने व गाने से दर्द महसूस होता हो, तब इस औषधि से विशेष लाभ होता हैं । अगर वह जोर से बोलता हैं,  विद्यार्थी जोर से पढ़ता हैं, तो उसे ख़ासी आने लगती हैं। इन लक्षणों में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 


फेफड़े, गले, योनिद्वार, मूत्रद्वार, आँख से भूरे रंग का स्राव - इस औषधि के लक्षणों में श्लैष्मिक झिल्ली के स्थानों से जो स्त्राव निकलता हैं। वह गाढ़ा, चिकना तथा भूरे रंग का होता हैं । गले से भूरे रंग का कफ़ निकलता हैं। इसके अलावा योनिद्वार से, मूत्रद्वार से और आँख से भूरा स्त्राव निकलता हैं , यहाँ तक कि जख्मों से भी यह स्त्राव निकलता हैं । कभी कभी यह पीले रंग का भी हो जाता हैं। राजयक्ष्मा रोग में खांसने पर भी भूरे रंग का कफ निकलता हैं। बोलने, हंसने या गर्म कमरे में रहने से कफ बढ़ जाता हैं। यह खुश्क कफ रोगी को बार - बार खांसने से परेशान करता हैं। इस दवा के सेवन से यह तकलीफ ठीक हो जाती हैं । 


सोने पर बिजली के धक्के जैसा अनुभव -  इस औषधि के बारे में इस बात पर बल दिया जाता हैं, कि रोगी जब सोने के लिये लेटता हैं तब सिर से पांव तक बिजली का  धक्का महसूस करता हैं । ये धक्के एक बार , दो बार , कभी - कभी सारी रात भी लगते रहते हैं । अंगों में फड़कन, ऐठन होती है इन लक्षणों में यह औषधि लाभ पहुँचाती हैं। 


बहुमूत्र, खुश्क मुख , भरपेट खाने के बाद भी भूख , गिट्टो में सूजन - बहुमूत्र रोग में जब मुख सूखा रहता हो , पेशाब बार - बार आता हो , भर पेट भोजन कर लेने के बाद भी भूख लगती हो और गिट्टो में सूजन रहती हो तो यह औषधि लाभदायक होती हैं। 


नपुसंकता व स्वप्नदोष - हस्तमैथुन जैसे आदि दुष्कर्मों से रोगी नपुंसक बन जाता हैं । और रोगी स्वप्नदोष का शिकार हो जाता हैं । इसमें यह दवा लाभप्रद होती है । 


इस औषधि के अन्य लक्षण 


> रोगी शीत प्रधान होता हैं, सर्दी से डरता हैं, गर्म कपड़े लपेटे रखता हैं। उसको दर्द में गर्म सेक से आराम मिलता हैं और सिर दर्द में कपड़ा बांधने से आराम मिलता हैं । 

> इस औषधि का विशेष लक्षण यह है कि दोपहर को शिकायतें शुरु होती हैं । सिर दर्द भी ऐसे ही दोपहर को ठीक अपने समय पर होता हैं। 

> आधा सिर दर्द - सिर के आधे हिस्से में दर्द होता हैं। सिर दर्द धीरे - धीरे शुरू होता हैं, परन्तु जब अपने शिखर पर होता हैं, तब एकदम समाप्त हो जाता हैं ।

> पुरुषों में दायें पोते और स्त्रियों में बायें डिम्बकोश में कठोरता पायी जाती हैं। 

> मृगी का रोगी मृगी के दौरे के उतरते ही कूद पड़ता हैं, जो भी निकट होता हैं उसे मारने लगता हैं । 


अर्जेन्टम मेटैलिकम औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - यह औषधि 6, 30, 200 की शक्ति में उपलब्ध हैं । यह शीत प्रकृति की औषधि हैं।


सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

ऐपोसाइनम औषधि ( APOCYNUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदे

ऐपोसाइनम औषधि ( APOCYNUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन -

  • शोथ में सर्दी से शिकायते बढ़ना  
  • रोगी पानी खूब पीने पर भी पेशाब व पसीना न आना
  • जलघर रोग में लाभप्रद  
  • बच्चों के सिर में पानी का भरना 
  • शोथ में बिमारी का लम्बा चलना

ऐपोसाइनम औषधि प्रकृति - गर्मी से रोग के लक्षणों में कमी आती हैं। ठंडे मौसम में, ठंडे पानी से, कपड़े उतारने से रोग के लक्षणों मे वृद्धि होती हैं।


शोथ में सर्दी से शिकायतें बढ़ना - शोथ में एपिस मेलिफिका तथा ऐपोसाइनम के लक्षणों में समानता हैं । शोथ के लक्षणों में इतनी समानता है कि अगर ' सर्दी से रोग का बढ़ना ' इस लक्षण को छोड़ दिया जाए , तो चिकित्सक एपिस मेलिफिका दे देते हैं । परन्तु एपिस मेलिफिका तथा ऐपोसाइनम में प्रमुख अंतर यह है कि एपिस मेलिफिका का शोथ गर्मी से बढ़ता और ठंड से घटता हैं, जबकि ऐपोसाइनम का शोथ गर्मी से घटता और ठंड से बढ़ता हैं । समान लक्षण में औषधि का चुनाव उसकी प्रकृति से करना चाहिए कि वह शीत प्रधान है या ऊष्ण प्रधान । 


रोगी पानी खूब पीने पर भी पेशाब व पसीना न आना -  ऐपोसाइनम का रोगी खूब पानी पीता है , परन्तु उसे पसीना और पेशाब बिल्कुल भी नही आता । रोगी सोचता है कि अगर उसे पसीना आ जाए तो वह ठीक हो सकता हैं ।  यह पानी उसके शरीर के कोष्ठको में भर जाता है और इसी से शोथ होती है । इसी शोथ और जल संचय के कारण रोगी ठंड को बर्दाश्त नही कर पाता हैं, तो ऐपोसाइनम ठीक कर देती हैं।


जलघर रोग में लाभप्रद - जलघर रोग में जब एपिस , ऐपोसाइनम , डिजिटेलिस दवाए काम नही करती हैं , तो वहा ब्लैटा ओरियेन्टेलिस अच्छा काम करती हैं । ग्लैटा ओरियेन्टेंलिस विशेष कर दमे में दी जाती हैं । इसकी 2-3 बूंद बार - बार देनी होती है । 


बच्चों के सिर में पानी का भरना - शरीर के किसी अंग में पानी का भर जाना इस औषधि का चरितगत, सर्वांगीण और व्यापक  लक्षण हैं । इसी आधार पर हाइड्रोसेफेलस रोग में ( बच्चे के सिर मे पानी जमा होना ) यह औषधि अच्छा लाभ करती हैं । 


शोथ में बिमारी का लम्बा चलना - कई बार बीमारी बहुत लम्बी चलती हैं। बीमारी के लक्षण जल्दी नहीं जाते, रोगी अत्यंत निर्बल , क्षीण और रक्तहीन हो जाता हैं । प्यास लगती हैं परन्तु पेशाब और पसीना बहुत कम आता हैं, शोथ के लक्षण दिखने लगते हैं । प्राय: टाइफॉयड आदि में जो लक्षण देर तक ठीक नही होते । ऐसी अवस्था में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 


ऐपोसाइनम की शक्ति व प्रकृति - यह औषधि 3,6 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । यह औषधि शीत  प्रकृति की हैं ।


मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

एपिस मेलिफिका औषधि ( APIS MELLIFICA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

एपिस मेलिफिका औषधि ( APIS MELLIFICA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विषलेशणात्मक वर्णन - 

  • किसी अंग मे भी शोथ व सूजन
  • मधुमक्खी के डंक मारने जैसा दर्द और जलन 
  • प्यास न लगना 
  • मानसिक - आघात से उत्पन्न रोग 
  • पहले , दूसरे या तीसरे महीने गर्भपात की आशंका
  • ज्वर में शीतकाल में कपड़ा उतार फैकना और शीतकाल में प्यास लगना 
  • ज्वर में 3 बजे दोपहर जूडी से बुखार 

एपिस मेलिफिका की प्रकृति - ठंडी हवा से, ठंडे पानी से नहाने से और कपड़े उतार देने से रोगी के  लक्षणो में कमी आती हैं । जबकि गर्म कमरे में, आग के सेक से , सोने के बाद और तीन से छः बजे के बीच रोगी के लक्षणों में वृद्धि होती हैं।


किसी अंग में शोथ व सूजन - गुर्दा, आँख आदि में होने वाले शोथ व सूजन में कारगर औषधि हैं। शोथ दायीं तरफ से बांयी तरफ की ओर होता हैं। यह औषधि मधुमक्खी के डंक से तैयार होती हैं । इसमें वे लक्षण होते हैं, जो मधुमक्खी के डंक में होते हैं । शोथ व सूजन इस औषधि का प्रमुख लक्षण हैं । यह शोथ सम्पूर्ण शरीर के भिन्न - भिन्न अंगों में हो सकती हैं । यह शोथ की बहुत ही कारगर औषधि हैं।


> गुर्दे पर प्रभाव - वैसे तो एपिस मेलिफिका की शोथ किसी भी अंग में हो सकती हैं , लेकिन मुख्य तौर पर इसका प्रभाव गुर्दे पर पड़ता हैं। जिसके कारण शरीर मे जहाँ - जहाँ सेल्म हैं , वहा - वहा पानी भर जाने के कारण शोथ हो जाती हैं। जैसे- मुँह , जीभ और आँख की पलक सब सूज जाते हैं ।  


> आँख का प्रदाह - आँख प्रदाह में मधुमक्खी के डंक मारने जैसी टीस हो तो इस औषधि का प्रयोग किया जाता हैं। 


मधुमक्खी के डंक मारने जैसा दर्द और जलन - मधुमक्खी के काटने जैसा शोथ होना , जहाँ काटा है, वहा दर्द व जलन होती हैं । इस जलन मे ठंडक से आराम मिलती हैं, इसलिये एपिस मेलिफिका की शोथ में रोगी गर्मी सहन नही करता , ठंडक चाहता हैं ।  


> डंक चुभने जैसा दर्द , सूजन , जलन और ठंडक से आराम - इन लक्षणों में यदि पित्ती उछलना , चेचक , खसरा , कैन्सर , डिम्बकोष की सूजन आदि रोगों में क्यो न पायें इस औषधि से लाभ होता हैं । 


> बाहरी त्वचा पर छोटी - छोटी फुन्सियाँ - हम अभी शरीर की आंतरिक झिल्लियों के प्रदाह के कारण रोगी के बार - बार चीख उठने का जिक्र करेंगे , परन्तु शरीर की बाहरी त्वचा पर भी एपिस मेलिफिका का प्रभाव हैं । जब शरीर पर छोटी - छोटी फुन्सियाँ हो जाती हैं, जिन्हे अंग्रेजी में " रेश " कहते हैं । अगर ये दिखें ना भी परन्तु त्वचा पर अंगुली फेरकर से उन्हें अनुभव किया जा सकता हैं । शरीर में यहाँ - वहाँ गांठे पड़ जाती हैं , जो कभी आती हैं कभी चली जाती हैं ।  और ये कभी - कभी शोथ का उग्र रूप धारण कर लेती हैं । इन लक्षणों में एपिस मेलिफिका उपयोगी होती हैं ।  


> रह - रह कर रोगी का चीखना - मस्तिष्क के रोग में रोगी बेहोशी मे ऐसे चीख उठता हैं, जैसे किसी ने डंक मार दिया हो । एपिस मेलिफिका का जैसे शरीर की त्वचा पर शोथ होता हैं, वैसे ही शरीर की आन्तरिक झिल्लियों पर जो मस्तिष्क , हृदय , पेट आदि का आवरण करती हैं, उन पर भी शोथ का प्रभाव होता हैं, और इसलिए इन अंगों के आन्तरिक शोथ पर रोगी डंक मारने जैसा दर्द अनुभव करता है, जिससे वह चीख उठती हैं। 


प्यास न लगना - एपिस मेलिफिका के शोथ में प्यास नही लगती । इसमें जलन होती हैं, लेकिन प्यास न लगती,  यही इसका ' विलक्षण  लक्षण ' हैं । 


मानसिक आघात से उत्पन्न रोग - डर , झुझलाहट औऱ ईर्ष्या आदि से उत्पन्न मानसिक आघात में , विशेषकर शरीर के दाएं भाग के पक्षाघात में इस औषधि का उपयोग लाभप्रद होता हैं । जैसे युवाओं का बच्चों की तरह बेमतलब बोलना व व्यवहार करना।  निरर्थक बात बोलते जाना इस औषधि का मानसिक  कारण होता हैं । 


पहले , दूसरे या तीसरे महीने गर्भपात की आशंका - गर्भवती स्त्री के पहले , दूसरे या तीसरे महीने अगर गर्भपात की आशंका हो , तो यह औषधि इस खतरे को दूर कर देती हैं । कभी - कभी दुर्घटना-वश या गर्माशय की कमज़ोरी के कारण गर्भपात होने की आशंका उत्पन्न हो जाती हैं । किसी भी गर्भपात की आशंका में यह औषधि गर्भपात की प्रवृत्ति को रोक देती हैं । 


ज्वर में शीतकाल में कपड़ा उतार फैकना और शीतकाल में प्यास लगना - यह इस औषधि का ' विलक्षण - लक्षण '  है कि ज्वर में शीतकाल में सब कपड़े उतार फेंकता हैं, और शीतकाल अवस्था में प्यास भी लगती हैं। जबकि इसमें प्यास न लगने का लक्षण होता हैं।


दोपहर 3 बजे जूड़ी से बुखार आना - इसके ज्वर में रोगी को दोपहर 3 बजे सर्दी लगकर बुखार आता हैं ।  ज्वर के इस लक्षण में एपिस मेलिफिका औषधि का उपयोग लाभप्रद होता हैं।


एपिस मेलिफिका औषधि की शक्ति व प्रकृति - शोथ के रोग में निम्न शक्ति तथा अतिसार और आँखों की बीमारी में 30 तथा ज्वर में 200 शक्ति का उपयोग किया जाता हैं । यह धीरे धीरे क्रिया करती हैं। इसलिये दवा को जल्दी नही बदलनी चाहिये । यह औषधि ' गर्म '  प्रकृति की हैं ।


रविवार, 7 फ़रवरी 2021

ऐन्टिमोनियम टार्ट औषधि ( ANTIMONIUM TART ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

ऐन्टिमोनियम टार्ट औषधि ( ANTIMONIUM TART ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें जानते हैं -

  • फेफड़े में श्लेष्मा के जमा हो जाने कारण घड़ - घड़ आवाज परन्तु उसे निकाल न पाना 
  • वमन तथा कमज़ोरी के कारण निंदासापन होना तथा ठंडा पसीना आना  
  • बच्चों की पसलियां चलना
  • श्वास रोग में बिस्तर पर उठकर बैठने से आराम
  • मृत्यु समय को घड़घड़ाहट 
  • चेचक में लाभप्रद
  • ऐन्टिमोनियम टार्ट के अन्य लक्षण
  • ऐन्टिमोनियम टार्ट की शक्ति 

ऐन्टिमोनियम टार्ट की प्रकृति - खांसी में कफ निकलने पर रोगी को आराम होना, बैठने से रोग में कमी, खुली हवा से रोग में कमी। जबकि गर्म कमरे मे रोग का बढ़ना, ठंड से रोग का बढ़ना, नमी से रोग का बढ़ना,  लेटने से रोग का बढ़ना । 


फेफड़े में श्लेष्मा के जमा हो जाने कारण घड़ - घड़ आवाज परन्तु उसे निकाल न पाना - फेफडे मे श्लेष्मा के जमा होने के कारण जब घड़ - घड़ आवाज़ आए , कफ निकलने पर भी न निकले । बच्चों तथा बूढ़ो के फेफडों की ऐसी अवस्था में ऐन्टिम टार्ट कभी कभी रोगी को मौत से बचा लेती हैं। फेफड़े के रोग जैसे - छाती मे कफ भरा हो , घड़ - घड़ कीआवाज आए, जुकाम हो , ब्रोकाइटिस हो , क्रुप हो , कुकर खांसी हो , ब्रोको - न्यूमोनिया हो , न्यूमोनिया हो , प्लूरो - न्यूमोनिया हो , तो  ऐन्टिमोनियम टार्ट प्रमुख औषधि का काम करती हैं । न्यूमोनिया मे खांसी का कम होना बढती हुई कमज़ोरी का लक्षण होता हैं । 


न्यूमोनिया में ऐन्टिमोनियम टार्ट की ब्रायोनिया तथा इपिकाक से तुलना - श्वास प्रणालिका के शोथ में , ब्रोकाइटिस , न्यूमोनिया आदि में शुरूआत में ब्रायोनिया , इपिकाक आदि औषधि से काम चल जाअत्यंत । सास लेने मे दर्द हो , दर्द की तरफ लेटने से आराम हो और ख़ासी भी हो तो ये ब्रायोनिया दी जाती हैं। न्यूमोनिया में श्लेष्मा के साथ घड़ - घड़ आवाज आए और रोगी में श्लेष्मा को निकालने की ताकत हो तो इपिकाक दी जाती हैं । श्लेष्मा के साथ घड़ - घड़ की आवाज हो परन्तु रोगी इतना निर्बल हो जाए कि कफ को निकालने में असमर्थ हो, अन्दर ही घड़ - घड़ करता रहे , तब ऐन्टिमोनियम टार्ट दी जाती हैं । ऐन्टिमोनियम टार्ट की अवस्था आखिर में आती हैं, जब रोगी अत्यंत कमजोर हो जाता हैं ।


वमन तथा कमज़ोरी के कारण निंदासापन होना - एलोपैथीक में ऐन्टिमोनियम टार्ट वमन की औषधि हैं । इसी कारण होम्योपैथिक में भी अधिक उबकाई तथा वमन में इसे दिया जाता हैं, परन्तु  साथ ही निंदासापन भी होना चाहिये । कमज़ोरी इस दवा का व्यापक लक्षण है , इसी कमजोरी के कारण निंदासापन होता हैं । उबकाई तथा वमन इपिकाक में भी है , परन्तु इन दोनो मे भेद यह है कि ऐन्टिमोनियम टार्ट में वमन हो जाने के बाद रोगी निंद्रालु होता हैं और वमन से उसे आराम मिलता है , जबकि इपिकाक मे कय हो जाने के बाद भी जी मिचलाता रहता है , उसे आराम नही मिलता ।


हैजे में उबकाई , निंदासापन और कमजोरी - हैजे में ये तीनों लक्षण पाए जाते हैं। इसलिए ऐन्टिमोनियम टार्ट हैजे की उत्तम औषधि हैं । हैजे मे रोगी को वमन के बाद चैन भी पड़ जाता है । ऐन्टिमोनियम टार्ट में प्यास का न लगना भी इसका मुख्य लक्षण हैं । हैजे की इस अवस्था में प्रत्येक वमन के बाद इस औषधि कि 30 शक्ति की एक मात्रा देने से रोगी ठीक हो जाता हैं । 


बच्चों की पसलियां चलना - बच्चों की पसलियाँ चलने पर यह दवा अमृत का काम करती हैं । इसी के साथ छाती का घड़घड़ करना और निंदासापन का लक्षण भी होना चाहिये । नवजात - शिशु का जब दम घुटे , छाती में घड़घड़ाहट हो , चेहरा नीला पड़ जाए , तब यह दवा उपयोगी होती हैं ।


श्वास रोग में बिस्तर पर उठकर बैठने से आराम - सास की बीमारी में जब रोगी का दम घुटता हो , फेफडों में पर्याप्त श्वास पहुंच नही पा रही हो , लेटे रहने से खांसी बढ़ जाती हो , घड़घड़ाहट हो , श्लेष्मा न निकलता हो , उठकर बैठ जाने से आराम होता हो , तब यह दवा देना लाभप्रद होती हैं । 


मृत्यु समय को घड़घड़ाहट - मृत्यु समय निकट आने पर प्राय सांस रुकने लगती है , फेफडों के अन्दर घड़ - घड़ की आवाज आती हैं, जिसे अँग्रेजी में Death Rattle कहते हैं । उस समय इस दवा के इस्तेमाल से रोगी की बेचैनी दूर हो जाती हैं, और मृत्यु आराम से आती हैं । 


चेचक में लाभप्रद - इस औषधि को देने से पहले चिकित्सक रोगी से पूछता हैं, उसने चेचक का टीका कितनी बार लिया हैं । अगर उसने टीका कई बार लिया गया हैं, तो इस विष का प्रतिशोध करने के लिये मर्क्यूरियस , थूजा या ऐन्टिमोनियम टार्ट दिया जाता है । मामूली चेचक में यह उपयोगी औषधि हैं । 


ऐन्टिमोनियम टार्ट की शक्ति व प्रकृति -  इस औषधि में प्यास नहीं लगती, प्रात: काल 3 बजे दम घुटता हैं , उठकर बैठने से आराम मिलता हैं, थूक में खून निकलता हैं और यह थूक चिपकने वाला होता हैं। यह अन्त समय की औषधि है , जब रोगी का सास घड़घड़ कर रहा हो । यह औषधि 30, व 200 की शक्ति में उपलब्ध हैं ।


ऐन्टिमोनियम क्रूडम औषधि ( ANTIMONIUM CRUDUM ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदें

ऐन्टिमोनियम क्रूडम औषधि ( ANTIMONIUM CRUDUM ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदें को विस्तार पूर्वक विषलेशण - 

  • बच्चा अपरिचित व्यक्ति के छूने या अपनी तरफ ताकने से रोना व चिड़चिड़ापन 
  • चाँदनी में प्रसन्न विचार आना
  • जीभ पर सफ़ेद परत जमना 
  • ग्रीष्म ऋतु का डायरिया  
  • वृद्धावस्था में कब्ज तथा पतले दस्त 
  • बवासीर के मस्सो से आंव आना 
  • गठिया रोग का अन्य रोग में बदल जाना 
  • तलुओं में गट्टे पड़ने से चलने में दर्द 
  • त्वचा पर फुन्सिया

ऐन्टिमोनियम क्रूडम की प्रकृति -  खुली हवा में होने से, गर्म जल में स्नान करने से और आराम करने से रोग के लक्षणों मे कमी आती हैं। जबकि अत्यधिक ठंड से, अत्यधिक गर्मी से, सूर्य या आग की गर्मी से, ठंडे जल से स्नान करने से, खाना खाने के बाद, खटाई से और सिर पर पानी डालने से रोग के लक्षणों में वृद्धी होती हैं।


बच्चा अपरिचित व्यक्ति के छूने या अपनी तरफ ताकने से रोना व चिड़चिड़ापन - ये मानसिक लक्षण बच्चे तथा युवा दोनों में पाए जाते हैं । बच्चा तो इतना चिड़चिड़ा हो जाता है कि अगर कोई अपरिचित व्यक्ति उसकी तरफ देखता है या छू लेता हैं, तो रोने लग जाता हैं । युवा व्यक्ति भी उदास, दुखी व चिड़चिड़ा रहता हैं।  वह इतना दुखी रहता है, कि आत्म हत्या करना चाहता हैं । इन लक्षणों में ऐन्टिमोनियम क्रूडम लाभप्रद होती हैं।


चाँदनी में प्रसन्न विचार आना - ऐन्टिमोनियम क्रूडम का रोगी चाँद की रोशनी से प्रसन्न हो उठता हैं । निराश हताश चित्त की अवस्था कभी कभी उन्माद का रूप धारण कर लेती है, तो रोगी के चित्त  पटल पर चाँद की रोशनी का उत्तेजक प्रभाव पड़ता है । 


जीभ पर सफ़ेद परत जमना -  जिन रोगियों के कष्टो का उद्गम पेट के खराब होने से होता है, उन्हें यह औषधि दी जाती हैं । जीभ पर मोटी सफेद परत - श्लैष्मिक झिल्ली से एक सफेद रस उत्पन्न होता है, जो जीभ पर आकर जम जाता है, तो इस दवा की आवश्यकता होती हैं। बच्चों की पेट की ख़राबी में , पेट की ख़राबी के कारण होने वाले बुखार में , अपचन के कारण बार - बार उल्टी आने से जीभ का सफेद होना इस औषधि का विशिष्ट लक्षण हैं । जीभ की सफेदी अनेक औषधियों में है , लेकिन इस औषधि जितनी मोटी सफेदी किसी दूसरी औषधि में नही हैं । अधिक भोजन के बाद उल्टी या जी मिचलाना , जो खाया है उसका वैसी ही डकार आना और फिर जीभ पर सफेद परत जमना ये सब इस औषधि से जल्दी ठीक हो जाता हैं । 


ग्रीष्म ऋतु का डायरिया - ग्रीष्म ऋतु में पेट की ख़राबी से ऐसे दस्त होने लगते हैं कि पहले ठीक शौच आता है और फिर साथ ही थोड़ा  पनीला दस्त आ जाता है, फिर थोड़ी ही देर बाद दुबारा जाना पड़ता है, तब कुछ और ठोस शौच और साथ पनीला दस्त आता हैं। अंत में पेट खाली हो जाता है और मरोड़ आने लगता हैं ।  इस लक्षण के साथ जीभ की सफेद परत पर भी ध्यान देना होता है । 


वृद्धावस्था में कब्ज तथा पतले दस्त - वृद्धावस्था में प्राय पेट की खराबी से पतले दस्त और बाद में कब्ज , फिर दस्त , फिर कब्ज होते रहते हैं ।  इसमें यह औषधि लाभदायक होती हैं । 


बवासीर के मस्सो से आंव आना - आंव वाली बवासीर के लिए यह उत्तम औषधि हैं । गुदा से निरन्तर आंव के निकलते रहने से अन्दर का कपटा खराब हो जाता है जिससे रोगी परेशान रहता हैं । 


गठिया रोग का अन्य रोग में बदल जाना - कमी - कभी ऐसा देखा गया है कि गठिया एकाएक ही शान्त हो जाता है , परन्तु उसके बाद रोगी निरन्तर उल्टी करने लगता हैं । हाथ - पांव के गठिये का दर्द बदल कर पेट रोग के लक्षण प्रकट होने लग जाते हैं । इसके बाद गठिये वाले पहले लक्षण फिर प्रकट होते हैं । ऐसे लक्षणों में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 


तलुओं में गट्टे पड़ने से चलने में दर्द - पैर के तलुवों मे गट्टे पड़ जाते हैं और तलुवे असहिष्णु हो जाते हैं । तलुवों की इस असहिष्णुता के  विशिष्ट लक्षण के कारण कई गठियाग्रस्त रोगी ठीक हो जाते हैं । 


त्वचा पर फुन्सिया - त्वचा की पर होने वाली फुन्सियॉ जिनमें चुभन व खुजली होती हैं। जिन्हे खुजलाने से त्वचा में कुछ मीठा - मीठा दर्द होता हैं। इन लक्षणों में ऐन्टिमोनियम क्रूडम अद्भुत औषधि हैं । 


इस औषधि के अन्य लक्षण 

  1. यह एक विचित्र  लक्षण है कि हूपिंग कफ में बच्चा अगर आग की तरफ देखे तो खांसी बढ़ जाती हैं। जबकि आग के सेक से खांसी में आराम होता हैं । 
  2. सूर्य के ताप से भी अनेक लक्षण प्रकट होने लगते हैं, गर्म आग के सेक से रोग के लक्षण बढ़ जाते हैं।   
  3. जवानी में बुड़ापे के लक्षण आ जाने पर यह दवा लाभ करती हैं ।


ऐन्टिमोनियम क्रूडम औषधि की शक्ति व प्रकृति - यह औषधि 3, 6, 12, 30, 200 की शक्ति में उपलब्ध हैं । यह शीत प्रधान औषधि हैं।