मंगलवार, 25 मई 2021

चिनिनम सल्फ्यूरिकम ( CHININUM SULPHURICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

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चिनिनम सल्फ्यूरिकम ( CHININUM SULPHURICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें विस्तार से जानकारी -

चिनिनम सल्फ्यूरिकम कुनीन का दूसरा नाम हैं । यह औषधि शुद्ध कुनीन होती हैं । एलोपैथी में हर किस्म के मलेरिया को ठीक करने लिए कुनीन दी जाती हैं । परन्तु कुनीन का अपने ढंग का ज्वर होता हैं, जिसमें चिनिनम सल्फ्यूरिकम उच्च शक्ति में कुनीन के दोषों को उत्पन्न किए बगैर ही ज्वर को ठीक कर देती हैं । कुनीन की थोड़ी मात्रा के सेवन से यदि मलेरिया ठीक नहीं होता , तो डॉक्टर इसकी मात्रा को बढ़ा देते हैं । जिससे बुखार उतरने के बजाय दब जाता हैं और अन्य लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं । कान बहरे हो जाते हैं , भूख लगनी बंद हो जाती है , शरीर में क्षीणता , दुर्बलता आ जाती है , खून की कमी हो जाती हैं । 

चिनिनम सल्फ्यूरिकम में सवेरे 10, 11  बजे लगभग और तीसरे पहर के 3 बजे से रात के 10 बजे तक एक दिन का अन्तर देकर , दो घंटे आगे बढ़कर ज्वर आता हैं । इसी दौरान रोगी को ठंड लगती हैं ।  

इसके रोगी को शीत अवस्था , उत्ताप की अवस्था और स्वेद की अवस्था, ज्वर की इन तीनों अवस्थाओं में रोगी प्यास रहती हैं ।


सोमवार, 24 मई 2021

सिक्यूटा वाइरोसा ( CICUTA VIROSA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदें

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सिक्यूटा वाइरोसा ( CICUTA VIROSA ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदों का वर्णन -

  • ऐंठन में फायदेंमंद
  • मानसिक कमज़ोरी
  • एग्जीमा जैसे फोड़े - फुंसी

" ऐंठन में फायदेंमंद "

मिर्गी, हिस्टीरिया और फुंसी रोगों के दब जाने से मानसिक रोग जो ऐंठन का रूप ले लेते हैं । 

बच्चों के दांत निकलते समय ऐंठन होना सिक्यूटा वाइरोसा के ही लक्षण हैं । यह ऐंठन सिर , आँख और गले से शुरु होकर पीठ के नीचे से होती हुई हाथ - पांव की तरफ फैलती हैं ।  

" मानसिक कमज़ोरी "

याद्दास्त की कमी इस औषधि का अद्भुत लक्षण हैं । रोगी से डॉ द्वारा जो कुछ पूछा जाता हैं, वह उसका सही - सही उत्तर देता हैं ।  परन्तु बाद में उसे कुछ याद नहीं रहता कि क्या हुआ हैं और उसने क्या जवाब दिया हैं ।  

सिक्यूटा वाइरोसा का रोगी कोयला आदि जैसे चीजे खाता हैं क्योकि उसे इस बात का भी पता नहीं रहता कि क्या खाने की वस्तु है और क्या नहीं है । वह बच्चो की तरह हरकते करता है। जैसे - नाचता हैं , गाता हैं , चिल्लाता हैं और शोर मचाता हैं क्योकि उसे अपने - आप का यथार्थ ज्ञान नहीं रहता । 

वृद्ध पुरुष भी बच्चों की तरह बरताव करने लगते हैं ।  अपने मित्रों और परिचित व्यक्तियों को भी नहीं पहचानता और उन्हे अजनबी की तरह देखता हैं । उन्हें देख कर आश्चर्य करने लगता हैं कि क्या ये वही व्यक्ति हैं जिन्हें वह कभी जानता था । अपने विषय में भी वह सब कुछ भूल जाता हैं । उसे याद नहीं रहता कि उसकी क्या आयु है । 

स्त्री को जब दौरा पड़ता हैं और उसमे से निकलने के बाद वह बच्चों की तरह हरकते करने लगती हैं । 

ऐसी कई घटनाए होती हैं जैसे - बचपन में सिर पर चोट लगने से व्यक्ति भी अपंग हो गया और युवा अवस्था तक वह बच्चा ही बना रहा हो, तो उन्हें सिक्यूटा वाइरोसा 200 की मात्रा कुछ समय देने से उसका मस्तिष्क ठीक हो जाता हैं। अर्थात उसके मस्तिष्क का विकास होना शुरू हो जाता हैं ।

" एग्जीमा जैसे फोड़े - फुंसी "

यह औषधि एग्जीमा जैसे फोड़े - फुंसी को भी ठीक कर देती हैं , जो एक साथ  मिलकर एक पीली पपड़ी तक बना देते हैं । 

जैसे - किसी रोगी का सिर पर इस प्रकार एग्जीमा से भरा जैसे कोई टोपी रखी हो तो ऐसे रोगी को सिक्यूटा वाइरोसा की 200 शक्ति की एक मात्रा से वह बिल्कुल ठीक हो जाता हैं । 

खोपड़ी और दाढ़ी के बालो के अंदर होने वाली फुंसियों को भी यह औषधि ठीक कर देती हैं ।


 


रविवार, 23 मई 2021

चेलिडोनियम ( CHELIDONIUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

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चेलिडोनियम ( CHELIDONIUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक वर्णन -

  • दाहिने स्कन्ध फलक के निचले भाग में लगातार दर्द
  • चेलिडोनियम और लाइकोपोडियम की तुलना 
  • पित्त की पथरी का दर्द
  • दायीं तरफ का न्यूमोनिया
  • आँख के रोगों में लाभप्रद 

" दाहिने स्कन्ध फलक के निचले भाग में लगातार दर्द "

चेलिडोनियम का  जिगर के रोगों  पर विशेष प्रभाव है और यही  इसका मुख्य लक्षण है। पीठ के पीछे दाहिने कंधे की तरफ जो अस्थि फलक है, उसके नीचे लगातार दर्द होते रहना भी इसका मुख्य लक्षण हैं । यह औषधि मुख्य रूप से  शरीर के दांए  हिस्से पर ही प्रभाव करती है । 

यह दर्द जिगर की बीमारी के कारण होता है । यह दर्द हल्का व तेज़ दोनों भी हो सकता है। इस लक्षण के साथ पीलिया , खांसी , अतिसार , न्यूमोनिया , रजोधर्म व  थकावट आदि में से  कोई भी रोग हो सकता है। यदि  इन रोगों के साथ उक्त लक्षण मौजूद हो तो यह औषधि विशेष लाभ पहुँचती है । 

रोगी का मुख का स्वाद कड़वा हो , जीभ पीली हो , आँखों पीलापन  व  चेहरा , हाथ , त्वचा पीली पड जाए , मल सफेद या पीला हो , पेशाब पीला हो , भूख न लगे , जी घबराए , पित्त की उल्टी हो तो ऐसी हालत में यदि  दाहिने कंधे के अस्थि फलक के निचले हिस्से में  दर्द न भी हो , तो भी  जिगर की बीमारी होने के कारण चेलिडोनियम अच्छा फायदा करती है। 

" चेलिडोनियम और लाइकोपोडियम की तुलना "

चेलिडोनियम और लाइकोपोडियम दोनों ही शरीर के दायीं तरफ की औषधियाँ  हैं । लेकिन  अनेक लक्षणों में इनमें  समानता भी पायी जाती है । चेलिडोनियम स्वल्पकालिक औषधि  है , इसका असर उतना गहरा नहीं होता । अगर इस औषधि से जिगर के  रोग ठीक न हो तो  लाइकोपोडियम देने की जरूरत पड़ जाती है । जिगर के रोग को दूर करके जिस काम को चेलिडोनियम अधूरा छोड़ देती है , उसे लाइकोपोडियम पूरा कर देती है । लाइकोपोडियम की तरह चेलिडोनियम औषधि का रोगी तेज़ गर्म चीज खाना व पीना पसंद करता है । 

" पित्त की  पथरी का दर्द "

पित्ताशय से पित्त की छोटी सी पथरी जब मूत्र प्रणाली में फंस जाती है। जिसके कारण रोगी को अत्यंत पीड़ा होती हैं। चेलिडोनियम मूत्र  प्रणालिका को खोल देती है।  और पित्त की  पथरी बिना दर्द किए आगे बढ़ जाती है । 

" दायीं तरफ का न्यूमोनिया "

हम यह जान चुके है की यह औषधि दायीं तरफ विशेष प्रभाव करती है । दाई आँख , दायां फेफड़ा , दाई टाँग , दाई जांघ , न्यूमोनिया में भी इसका दायें फेफड़े में अच्छा लाभ होता है । चेलिडोनियम का न्यूमोनिया की औषधियों मे विशेष स्थान है । न्यूमोनिया का जिगर की विकृति से कोई संबंध होता है । न्यूमोनिया में भी दायें स्कन्ध फलक के निचले हिस्से में दर्द हो सकता है । तो चेलिडोनियम अच्छा लाभ करती है। 

" आँख के रोगों में लाभप्रद "

चेलिडोनियम से आँख रोगों  में जैसे मोतियाबिंद, आँखों में पीलापन , धुंधलापन आदि में विशेष लाभ पहुँचती हैं। 

" चेलिडोनियम की  शक्ति तथा प्रकृति "

चेलिडोनियम मूल अर्क व अन्य सभी शक्तियों में उपलब्ध है।  इसका रोगी ठंडा पानी नही पी सकता । उबलता गर्म पेय ही  पेट में ठहरता है । चेलिडोनियम शीत प्रकृति की औषधि है । 


शनिवार, 22 मई 2021

चिनिनम आर्सेनिकम ( CHININUM ARSENICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

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चिनिनम आर्सेनिकम ( CHININUM ARSENICUM  ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों को जानते है

  • थकावट तथा कमजोरी
  • दमा 
  • अनिंद्रा 

" थकावट तथा कमजोरी "

चिनिनम आर्सेनिकम दवा कुनीन और आर्सेनिक के मिश्रण से बनी है । थकावट तथा कमजोरी इस औषधि का विशेष लक्षण है । वैसे तो होम्योपैथिक में टॉनिक नाम की कोई चीज नहीं होती। व्यक्ति की जो ' धातुगत औषधि ' हैं, जीवनी - शक्ति को जगाती है । टॉनिक का काम जीवन शक्ति को जागृत करना है। परन्तु थकावट तथा कमजोरी के लक्षणो में चिनिनम आर्सेनिकम का प्रयोग टॉनिक के रूप  में ही किया जाता है । 

डिफ्थीरिया, मलेरिया, स्नायु शूल आदि रोगों में जब रोगी लम्बा बीमार होता है, रोगी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ नहीं होता, उस समय चिनिनम आर्सेनिकम औषधि से लाभ होता है । 

" दमा में लाभप्रद "

दमे में जब रोगी को समय - समय पर दौरे पड़ते हैं। जिस कारण से रोगी नितान्त असमर्थ तथा बलहीन हो जाता है, तब चिनिनम आर्सेनिकम औषधि से लाभ मिलता है । 

" अनिद्रा को दूर करना "

स्नायु संबंधी कमजोरियों के  कारण रोगी को  नींद  नहीं  आती हो , तो चिनिनम आर्सेनिकम से लाभ  होता है । यह अनिद्रा की शिकायत  विशेषकर मध्य  रात्रि से पहले होती है । 


कॉस्टिकम ( CAUSTICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

कॉस्टिकम ( CAUSTICUM ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विश्लेषण -

  • बेहद कमजोरी 
  • सायंकाल में मानसिक लक्षणों का बढ़ना 
  • दुख , शोक , भय व रात्रि जागरण से रोगों की उत्पत्ति 
  • स्पर्श सहन नहीं कर पाना   
  • गठिये में पुठ्ठों और नसों का छोटा पड़ जाना और ठंडी हवा में आराम 
  • खांसी में ठंडे पानी के घूंट से आराम तथा कूल्हे के जोड़ में दर्द 
  • मोतियाबिंद में फायदेमंद 
  • मस्सों में लाभप्रद 
  • दिन में होने वाले मासिक धर्म में आराम

" कॉस्टिकम की प्रकृति " 

ठंडा पानी पीने से, बिस्तर की गर्मी से, हल्की हरकत से, गठिये में नमीदार हवा से रोगी को आराम मिलता हैं । जबकि खुश्क व ठंडी हवा से, त्वचा रोग के दब जाने से रोगों से तथा सायंकाल को रोगी के रोग में वृद्धि होती हैं । 

" बेहद कमजोरी - गला, जीभ, चेहरा, आँख, मलाशय, मूत्राशय, जरायु, हाथ - पैर आदि का पक्षाघात " 

इस औषधि का मेरूदंड पर विशेष क्रिया होती हैं। क्योंकि वहीं से ज्ञान - तंतु भिन्न -भिन्न अंगों में जाते हैं इसलिये मेरुदंड के ज्ञान तंतुओं पर ठंड आदि के कारण या चिरस्थायी दुख , शोक , भय , प्रसन्नता , क्रोध , खिजलाहट आदि के कारण जिन्हें रोगी सह नहीं सकता, उसको भिन्न - भिन्न अंगों में से किसी भी अंग में पक्षाघात हो सकता हैं । 

पक्षाघात किसी एक अंग का होता हैं। ठंड लगने या भय आदि से जब शुरु - शुरु मे किसी अंग में यह रोग होता हैं तो इसे एकोनाइट ठीक कर देती हैं। परन्तु जब एकोनाइट काम नहीं करती, तब कॉस्टिकम देने की जरूरत पड़ती हैं।

कॉस्टिकम में रोग का प्रारंभ बेहद कमजोरी के कारण शुरु होता हैं । हाथ - पैर या शरीर के अंग कापने लगते हैं , रोगी बलहीनता में डूबता जाता हैं ।  मांसपेशियों की शक्ति धीरे धीरे क्षीण होती जाती हैं । गले में पक्षाघात , भोजन प्रणाली  में पक्षाघात , डिफ्थीरिया के बाद इन अंगों में पक्षाघात , आँख की पाठक का पक्षाघात हो सकता हैं।

मलाशय , मूत्राशय , जरायु का पक्षाघात , हाथ - पैर का शक्तिहीन हो जाना , बेहद सुस्ती , थकान , अंगों का भारीपन ये सब पक्षाघात की तरफ धीरे - धीरे बढ़ने के लक्षण हैं । कॉस्टिकम का पक्षाघात प्राय दाई तरफ होता हैं । जिनमें कॉस्टिकम का प्रयोग लाभप्रद हैं । 

>> एक - एक अंग का पक्षाघात - पक्षाघात इस औषधि का चरित्रगत लक्षण हैं । शरीर के किसी एक अंग पर इस रोग का आक्रमण होता हैं । उदाहरणार्थ , अगर ठंडी , खुश्क हवा में लम्बा सफर करने निकले और हवा के झोके आते जाये , तो किसी एक अंग पर इस हवा का असर पड़ जाता हैं और वह अंग सुन्न हो जाता हैं , काम नहीं करता । ठंड से चेहरा टेढ़ा हो जाता हैं , आवाज़ बैठ जाती हैं , भोजन निगलने की मांसपेशियां काम नहीं करती हैं, जीभ लड़खड़ाने लगती हैं , आँख की पलक झपकना बंद कर देती हैं , पेशाब नहीं आता , शरीर भारी लगता हैं । इन सब लक्षणों पर कॉस्टिकम बहुत अच्छा काम करती हैं ।

>> मलाशय से मल अपने - आप निकल जाना या कब्ज होना - मलाशय पर पक्षाघात का असर दो तरह का हो सकता हैं । इसमें मलाशय काम नहीं करता इसलिये या मल अपने - आप निकल जाता हैं , या फिर कब्ज के कारण मल निकलेगा ही नहीं । दोनों अवस्थाए पक्षाघात का परिणाम हैं । 

>> मूत्राशय से अपने - आप मूत्र निकल जाना या बन्द हो जाना - मलाशय की तरह ही मूत्राशय के पक्षाघात का भी यह स्वाभाविक परिणाम है कि या तो मूत्र अपने - आप निकल जाता है या फिर बंद हो जाता है।  क्योंकि उसे रोकने वाली पेशियां काम नहीं करती, जिससे कोशिश करने पर भी पेशाब नहीं आता है । ये दोनों अवस्थाएं भी पक्षाघात का ही परिणाम होती हैं । 

>> बच्चों का नींद में पेशाब निकल जाना - प्राय : देखा जाता है की बच्चे सोने के बाद पेशाब कर देते हैं , या जागते हुए भी अनजाने में पेशाब कर देते है । बच्चा इस प्रकार पेशाब पहली नींद में ही कर दे , तो कॉस्टिकम अच्छा लाभ करती हैं । बच्चे को पता ही नहीं चलता कि उसने पेशाब कर दिया है । जब वह हाथ लगाकर देखता है तो  पता चलता है की उसका कच्छा गीला हो गया है तब वह समझता जाता  है कि उसका पेशाब अपने - आप ही निकल गया है ।

" सायंकाल मानसिक लक्षणों का बढ़ना "

कॉस्टिकम औषधि का रोगी हर समय उदास रहता है । मन की यह अवस्था उस समय बहुत बढ़ जाती है जब दिन का उजाला घटने लगता है। रोगी उस समय डरा हआ ,और घबराया हुआ रहता है । उसके मन की एकाग्रता भंग हो जाती है और उसे कैसे भी शान्ति नहीं मिलती  । उसे ऐसा लगता है कि कोई संकट आ खड़ा हुआ है । उसकी अंतर आत्मा से आवाज आती है कि उसने कोई अपराध किया है । 

इस घबराहट में उसे बार - बार पाखाने की हाजत होती है । घबराहट में चेहरा लाल हो जाता है  और उस समय बार - बार पाखाने की हाजत होना कॉस्टिकम का विशेष लक्षण होता  है । रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा , संदेहशील तथा दूसरों के दोष दूंढने वाला हो जाता हैं।  चिड़चिड़ा होना और दूसरों के प्रति सहानुभूति प्रकट करना कॉस्टिकम ही एक अद्भुत लक्षण है ।

" दुख, शोक, भय व रात्रि जागरण से रोगों की उत्पत्ति "

यह  औषधि विशेषकर उन मानसिक रोगियों  के लिए अत्यन्त उपयोगी व लाभप्रद होती है, जो दीर्घकालीन दुख , शोक व भय  से ग्रसित होते है । 

>> रात्रि जागरण से उत्पन्न रोग - कई दिनों तक रात्रि जागरण में जो रोग हो जाते है उनके लिये भी यह लाभप्रद है । इन रोगों की उत्पत्ति भी जीवन शक्ति के निम्न स्तर पर पहुच जाने के कारण होती हैं । इन रोगों में  जब रोगी सोचने लगता है तब उसकी तबीयत और बिगड़ लगती है । 

>> भय या त्वचा  रोग के दब जाने से मृगी , तांडव , ऐंठन होना - कभी - कभी मृगी , तांडव तथा ऐंठन का रोग व्यक्ति के भीतर किसी भय के कारण उत्पन्न होते है । भय के कारण उत्पन्न इन  रोगों को कॉस्टिकम दूर कर देती है । भय के अतिरिक्त किसी त्वचा के रोग को लेप आदि से दवा देने से भी इस प्रकार के मानसिक - लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं । 

>> यौवन काल में मासिक धर्म की गड़बड़ी - यौवन काल में लड़कियों में मासिक धर्म की गड़बड़ी इस औषधि के  लक्षण हैं । मन में भय के बैठ जाने , दानों के दब जाने या मासिक धर्म के अनियमित होने परयदि मृगी , तांडव या ऐंठन हो और रोगी अनजाने में अपने हाथ - पैर हिलाता रहे या सोते हुए हाथों या पैरों को झटकता हो  , तो कॉस्टिकम उपयोगी औषधि होती है । 

>> मस्तिष्क के पक्षाघात से  पागलपन - ज्यादा  पागलपन के रोग लिए  तो बेलाडोना अधिक कारगर होती हैं , परन्तु जब रोग पुराना हो  जाता है और मस्तिष्क के पक्षाघात के कारण रोग ठीक नहीं होता, रोगी हमेशा  चुपचाप रहता हो  , किसी से बात नहीं करता , अपने दिल मे निराश रहता है , तब पक्षाघात के कारण उत्पन्न इस  पागलपन को  कॉस्टिकम ठीक कर देती है । 

" स्पर्श सहन नहीं कर पाना "

स्पर्श सहन नहीं कर पाना इस औषधि का  चरित्रगत लक्षण है । इसमें  खांसते हुए छाती में, गले में, पेट की शोथ में तथा  दस्त के समय कपड़ों के स्पर्श से फोड़े जैसा दर्द होता है। मलद्वार में लाली पड़ जाती है जिसे  छूने पर दर्द होता है।  स्पर्श के प्रति इस प्रकार की असहिष्णुता कॉस्टिकम का एक व्यापक लक्षण है । कॉस्टिकम में  स्पर्श न सह सकने का दर्द श्लेष्मिक स्तर का होता है , जिसमे अघपके फोड़े जैसा  दर्द होता हैं। 

" गठिये में पुठ्ठों और नसों का छोटा पड़ जाना " 

गठिये के इलाज में प्राय अनेक प्रकार के तेलों से मालिश की जाती हैं। इनके परिणामस्वरूप जोड़ और अंग  विकृत हो जाते हैं और  पुठ्ठे  और नसें छोटी पड़ जाती है। रोगी  बाँहों व  पैरों को  सीधा नही कर पाता, उनको सीधा करने से वे अकड़  जाते हैं। 

" ठंडी हवा में आराम "

गठिये में  कॉस्टिकम का विशेष लक्षण यह है कि रोगी को ठंड या नम हवा में आराम मिलता है । जब नम या सर्द मौसम आता है तो गठिया ठीक  हो जाता है । साधारण तौर पर गठिये का रोग ठण्ड से बढ़ता है , परन्तु कॉस्टिकम में  उल्टा होता है । 

" खांसी में ठंडे पानी के घूंट से आराम तथा कूल्हे के जोड़ में दर्द "  

सूखी खांसी आती है , जिससे सारा शरीर हिल जाता है , रोगी कफ को बाहर निकालने की कोशिश  करता है , लेकिन निकाल नहीं पाता , वह इसे अन्दर ही निगल जाता है । रोगी को खांसते  हुए गले और  छाती में अधपके फोड़े के समान दर्द होता है । उसे  इस खांसी  में ठंडे पानी का घूंट पीने से आराम मिलता है। इस कफ में लेटने पर  खांसी बढ़ जाती है और जब रोगी खांसता है तो  उसके  कूल्हे के जोड़ों में  दर्द होता है । 

" मोतियाबिंद में फायदेमंद "

इस औषधि में रोगी  रोशनी को सहन नहीं पाता । आँखों के आगे काले गोल धब्बे उड़ते हुए दिखते हैं । होम्योपैथिक में इसे मोतियाबिंद की अत्युत्तम औषधि मानी  गई है । रोगी को धुंध जैसा दिखाई देता है और आँखों के सामने एक पर्दा सा आ जाता है।  

" मस्सों में लाभप्रद "

इस औषधि में शरीर पर मस्से पैदा करने की शक्ति होती  है । यह  शरीर , आँखों की पलको , चेहरे व  नाक पर मस्से पैदा कर सकती है।  लेकिन यह  मस्सों  को दूर भी करती है । 

" दिन में होने वाले मासिक धर्म में आराम "

जब  मासिक धर्म सिर्फ दिन में होता हो और  लेटने से बंद हो जाता हो तो यह इसका विचित्र लक्षण है । 

" कॉस्टिकम के अन्य लक्षण "

>> रोगी आग से जलने के बाद ठीक नहीं हो रहा हो तो व कॉस्टिकम से ठीक हो जाता है । 

>> पुराना घाव ठीक होकर  यदि बार - बार उत्पन्न हो जाता है तो यह अतिउत्तम औषधि  है । 

>> मोतियाबिंद में कुछ दिन तक  प्रतिदिन 30  शक्ति की  एक मात्रा देने से लाभ होता है । 

>> यदि  यह देखा जाए  कि रोगी दवा देने के बाद  कुछ देर तक ही ठीक रहता है और  फिर वही हालत हो जाती है तो कॉस्टिकम बहुत ही उत्तम औषधि है । 

>> यदि सुबह के समय  आवाज बंद रहे तो कॉस्टिकम देने से आराम मिलता है । 

" कॉस्टिकम की  शक्ति तथा  प्रकृति "

कॉस्टिकम प्रमुख तोर से सभी शक्तियों में उपलब्ध है।  पुराने रोगों में उच्च शक्ति एक या दो बार दी जाती है  | यह औषधि शीत  प्रकृति के लिए है । औषधि के प्रयोग से पहले  अपने चिकित्सक की सलाह जरूर करे।  


गुरुवार, 20 मई 2021

सिएनोथस ( CEANOTHUS ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदें

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सिएनोथस ( CEANOTHUS ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदें विस्तार पूर्वक वर्णन -

 " पेट में बाईं तरफ तिल्ली में दर्द "

होम्योपैथिक में सिएनोथस का तिल्ली पर विशेष प्रभाव होता हैं ।  मलेरिया के निरन्तर  आक्रमण से तिल्ली बढ़ जाती हैं । लेकिन सिएनोथस औषधि से बढ़ी हुई तिल्ली ठीक हो जाती हैं ।  तिल्ली बढ़ जाने से पेट के बाईं तरफ के नीचे के हिस्से में दर्द होता हैं । यह दर्द अन्दर गहराई में होता हैं । और इसका कारण तिल्ली का बढ़ जाना होता हैं ।  


सिड्रन ( CEDRON ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदें

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सिड्रन ( CEDRON ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदें विस्तार पूर्वक विश्लेषण -

  • नियत समय पर रोग का प्रकट होना
  • रोग प्रकट होने में सिड्रन व अरेनिया की तुलना
  • एक दिन छोड़कर 11 बजे सिरदर्द होना
  • संभोग के बाद तांडव या स्नायु शूल का आक्रमण
  • मासिक धर्म के पाँच दिन पूर्व प्रदर स्राव

" नियत समय पर रोग का प्रकट होना "

अगर कोई रोग घडी के अनुसार ठीक नियत समय पर प्रकट होता हैं और समय नहीं टालता तो वह  सिड्रन का रोगी हैं, इसे सिड्रन से शान्त कर देती हैं । ऐसा रोग किसी भी प्रकार का स्नायु शूल हो सकता हैं। 

जैसे - सविराम ज्वर , मृगी , मासिक स्राव तथा प्रदर से संबंध रखने वाले रोग हो सकते हैं , मलेरिया - ज्वर हो सकता है । 

" रोग प्रकट होने में सिड्रन व अरेनिया की तुलना "

इस प्रकार रोग का नियत समय पर प्रकट होना अरेनिया में भी होता हैं । परन्तु अरेनिया का प्रयोग गर्मी में ठीक रहता हैं और इसका रोग सर्दी या बरसात मे रोग प्रकट होता हैं । जबकि सिड्रन का रोग सभी ऋतुओं में प्रकट होता हैं । इसके अतिरिक्त अरेनिया में ज्वर तो ठीक घड़ी के समय पर आता हैं , परन्तु शीत की अधिकता होती हैं । उत्ताप नाम मात्र होता हैं , सिड्रन में शीत के बाद उत्ताप की भी तेज़ी होती हैं । सिड्रन का बुखार दलदल वाली नीची जगहों पर ज्यादा पाया जाता हैं। और रोगी गर्म पानी की ज्यादा मांग करता हैं ।

" एक दिन छोड़कर 11 बजे सिरदर्द होना "

एक दिन छोड़कर 11 बजे सिरदर्द होना सिड्रन का लक्षण हैं । खासकर यह सिरदर्द बाईं आंख के ऊपर की नसो में होता हैं । 

" संभोग के बाद तांडव या स्नायु शूल का आक्रमण "

स्त्री को संभोग के बाद अगर तांडव का आक्रमण होता हैं, तो इस औषधि से दूर हो जाता हैं । पुरुष को भी अगर संभोग के बाद स्नायु शूल होता हैं , तो भी यह औषधि अधिक लाभप्रद होती हैं । 

" मासिक धर्म के पाँच दिन पूर्व प्रदर स्राव "

स्त्रियों के संबंध में मासिक धर्म से पाँच छ: दिन पहले प्रदर स्राव का होना सिड्रन का लक्षण हैं । 


मंगलवार, 18 मई 2021

कार्बो वेज ( CARBO VEG ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

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कार्बो वेज ( CARBO VEG ) के  व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें विस्तार से जानते हैं-

  • पेट के ऊपरी भाग में वायु का प्रकोप- 
  • किसी कठिन रोग के बाद फायदेमंद 
  • गर्म हालत से जुकाम , गर्म एकदम ठंड में आने से उत्पन्न रोग  
  • हवा की लगातार इच्छा ( न्यूमोनिया , दमा , हैजा आदि में ) 
  • जलन , ठंडक तथा पसीना ( भीतर जलन बाहर ठडक )
  • शरीर तथा मन को शिथिलता ( रुधिर का विषैला फोड़ा , सड़ने वाला जख्म , वेरीकोज वेन्ज , थकान आदि ) 
  • कार्बो वेज मृत संजीवनी दवा 

" कार्बो वेज की प्रकृति "

ठंडी हवा से, पंखे की हवा से, डकार आने से रोग में कमी आती हैं। जबकि पांव ऊपर करके लेटने से , गर्मी से , रुधिर स्राव से , वृद्धावस्था की कमजोरी और गारिष्ट भोजन से पेट में वायु का बढ़ जाने से रोग में वृद्धि होती हैं।

" पेट के ऊपरी भाग मे वायु का प्रकोप "

कार्बो वेज औषधि वानस्पतिक कोयले से निर्मित की जाती हैं । वानस्पतिक कोयले में रासायनिक तत्व होते हैं, जो बदबू को समाप्त करने में सहायक होते हैं । यह फोड़ो और मुख की बदबू दूर कर देता हैं। कार्बो वेज पेट की गैस को भी दूर करती हैं , विषैले , सड़ने वाले जख्म को भी ठीक करती हैं । 

" किसी कठिन रोग के बाद फायदेमंद "

किसी पुराने रोग के बाद किसी भी रोग के चले आने का अभिप्राय यह हैं, कि जीवन शक्ति की कमजोरी दूर नहीं हुई , और यदि पुराना रोग ठीक हो गया हो , तो भी जीवनी शक्ति अभी अपने स्वस्थ रूप में नही आयी । 

उदाहरणार्थ - यदि जब बचपन में कुकर खांसी हुई हो और तब से दमा चला आ रहा हो , सालो से शराब के दौर से गुजरने से अजीर्ण रोग से पीड़ित हो , सामर्थ्य से ज्यादा परिश्रम करने के बाद तबीयत गिरी - गिरी रहती हो , जब से चोट लगी हो और चोट तो ठीक हो गई किन्तु मौजूदा शिकायत की शुरुआत हो गई , ऐसी हालत में कार्बो वेज लाभप्रद होती हैं । 

इस समय रोगी मे जो लक्षण मौजूद हो वे काबों वेज में पाये जाते हो क्योंकि इस रोग का मुख्य कारण जीवनी शक्ति का अस्वस्थ और ह्रासमय होना हैं । इस जीवन शक्ति के ह्रासमय होने के कारण ही रोग पीछा नहीं छोड़ते । 

" गर्म हालत से जुकाम , गर्म एकदम ठंड में आने से उत्पन्न रोग "

कार्बो वेज औषधि जुकाम, खांसी और सिरदर्द आदि के लिए मुख्य औषधि हैं, जिसमें रोगी जुकाम से पीड़ित रहता हैं । 

>> कार्बो वेज की जुकाम, खांसी और सिरदर्द की शुरुआत - रोगी गर्म कमरे में यह सोच कर जाता हैं कि उसे कुछ देर गर्म कमरे मे रहना हैं । शीघ्र ही उसे गर्मी महसूस होने लगती हैं , और फिर यह सोचकर कि अभी तो बाहर जा रहा हूं और गर्म कोट को नही उतारता । 

इस प्रकार इस गर्मी का उस पर असर हो जाता है और उसे छीकें आने लगती है और जुकाम हो जाती हैं । नाक से पनीला पानी बहने लगता है और दिन रात  छीकता रहता हैं । 

कार्बो वेज का जुकाम नाक से शुरु होता हैं , फिर गले की तरफ जाता हैं , फिर श्वास नलिका की तरफ जाता हैं और अंत में छाती में पहुँचता है । 

जब तक कार्बो वेज के रोगी का नाक बहता रहता हैं , तब तक उसे आराम रहता हैं , परन्तु यदि गर्मी से होने वाले इस जुकाम में वह ठंड मे चला जाए, तो जुकाम एकदम बंद हो जाती है और सिरदर्द शुरु हो जाता हैं । बहते हुए जुकाम में ठंड लग जाने से , नम हवा में या अन्य किसी प्रकार से जुकाम का स्राव रुक जाने से सिर के पीछे के भाग मे दर्द , आँख के ऊपर दर्द , सारे सिर में दर्द , हथौड़े के लगने के समान दर्द होने लगता हैं । 

पहले जो जुकाम गर्मी के कारण हुआ था उसमें कार्बो वेज उपयुक्त दवा होती हैं । और जुकाम के रुक जाने  के बाद कैलि बाईक्रोम , कैलि आयोडाइड , सीपिया उपयुक्त होती हैं । 

" हवा को लगातार इच्छा ( न्यूमोनिया , दमा , हैजा आदि ) "

कार्बो वेज गर्म उष्ण प्रकृति की औषधि हैं। यह गर्म प्रकृति की होने के कारण रोगी को ठंडी और पंखे की हवा की ज़रूरत पड़ती हैं । 

कोई भी रोग हो जैसे - बुखार , न्यूमोनिया , दमा , हैजा आदि में रोगी कहे - हवा करो , हवा करो तो कार्बो वेज की मानी जाती हैं । अगर रोगी कहे कि मुंह के सामने पंखे की हवा करो तो कार्बो वेज  और यदि मुंह से दूर पंखे को रख कर हवा करो तो लैकेसिस औषधि उपयुक्त होती हैं । कार्बो वेज में जीवन शक्ति अत्यंत शिथिल हो जाती हैं, इसलिए रोगी को हवा की बहुत इच्छा होती हैं । 

>> न्यूमोनिया - यदि न्यूमोनिया में रोगी इतना निर्बल हो जाए कि कफ जम जाए और ऐन्टिम टार्ट से भी कफ न निकले तो जीवन शक्ति की शिथिलता के कारण कफ नहीं निकल रहा । उस हालत मे अगर रोगी हवा के लिए भी बेताब हो तो कार्बो वेज से लाभ होता हैं । 

>> दमा - दमे के रोगी को सांस लेने में परेशानी होती हैं । उसकी छाती मे इतनी कमजोरी हो जाती हैं कि उसे लगता है कि अगला सांस शायद ही ले पाए । रोगी के हाथ पैर ठंडे होते हैं , मृत्यु की छाया उसके चेहरे पर दिखने लगती हैं , छाती से साय - साय की आवाज़ आती हैं, रोगी सांस लेने के लिए व्याकुल होता हैं तो कार्बो वेज लाभप्रद होती हैं।

>> हैजा - न्यूमोनिया और दमे की तरह हैजे में भी कार्यों वेज के लक्षण होते हैं, जब रोगी हवा के लिए व्याकुल हो जाता हैं ।  हैजे में जब रोगी चरम अवस्था में पहुच जाता हैं तो हाथ पैरों में ऐंठन नहीं रहती , रोगी का शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ जाए , शरीर से ठंडा पसीना आने लगे , सांस ठंडी लगे, शरीर नीला पड़ने लगे , रोगी मुर्दे की तरह हो जाए, ठंडी हवा से आराम मिले और कुछ भी कहने कि हालत में न हो तो कार्बो वेज रोगी को मृत्यु से बाहर निकाल देती हैं।

" जलन , ठंडक तथा पसीना "

भीतर जलन बाहर ठंडा कार्बो वेज औषधि का विशेष लक्षण हैं।  रोगी भीतर से गर्मी तथा जलन अनुभव करता हैं , परन्तु बाहर त्वचा पर वह ठंड अनुभव करता हैं । 

जलन कार्बो वेज का व्यापक लक्षण हैं शिराओं  में जलन , बारीक रक्त वाहिनियों में जलन , सिर में जलन , त्वचा में जलन , शोथ में जलन , सब जगह जलन होती हैं। परन्तु इस भीतरी जलन के साथ जीवन शक्ति की शिथिलता के कारण हाथ पैर ठंडे , खुश्क या चिपचिपे , घुटने ठंडे , नाक ठंडी , कान ठंडे , जीभ ठंडी पड़ जाती हैं । क्योंकि शिथिलावस्था में हृदय का कार्य शिथिल पड़ जाता हैं, इसलिये रक्त संचार के शिथिल हो जाने से सारा शरीर ठंडा हो जाता हैं । यह शरीर की पतनावस्था है ।

इस समय भीतर से गर्मी अनुभव कर रहे , बाहर से ठंडे हो रहे शरीर को ठंडी हवा की जरूरत पड़ती है । इस प्रकार की अवस्था प्राय हैजे आदि रोग में होती हैं, जब कार्बो वेज लाभ करती हैं । 

" शरीर तथा मन को शिथिलता ( रुधिर का रिसते रहना, विषला फोड़ा, सड़ने वाला जख्म, गैंग्रीन, वेरीकोज वेन्ज ) " 

शिथिलता इस औषधि का चरित्रगत लक्षण हैं । प्रत्येक लक्षण के आधार मे शिथिलता , कमजोरी , असमर्थता होती हैं । इस शिथिलता का प्रभाव रुधिर पर जब पड़ता हैं तब हाथ पैर फूल जाते हैं क्योंकि रुधिर की गति धीमी पड़ जाती हैं , रक्त शिराएं उभर आती हैं, रक्त संचार अपनी स्वाभाविक गति से नहीं होता ओर वैरीकोज वेन्ज़ रोग हो जाता हैं।

रक्त का संचार सुचारु रूप से चले इसके लिए टांगें ऊपर करके लेटना पड़ता हैं । रक्त सचार की शिथिलता के कारण अंग सूकने लगते हैं और अंगों में सुन्नपन आने लगती हैं । रोगी दायीं तरफ लेटता हैं , तो दाया हाथ सुन्न हो जाता है और अगर बायी तरफ लेटता है तो वाया हाथ सुन्न हो जाता हैं । रक्त संचार इतना शिथिल हो जाता है कि अगर किसी अंग पर दबाव पड़े , तो उस जगह का रक्त संचार रुक जाता हैं । रक्त संचार की इस शिथिलता के कारण विषैले फोड़े , सड़ने वाले फोड़े , गैग्रीन आदि हो जाते हैं। 

रुधिर का नाक , जरायु , फेफड़े , मूत्राशय आदि से रिसते रहना - रुधिर का बहते रहना इस औषधि का लक्षण हैं । नाक से हफ्तो तक प्रतिदिन नकसीर बहती हैं । जहा शोथ हुई वहा से रुधिर रिसता हैं । जरायु से , फेफड़ों से , मूत्राशय से रुधिर रिसता रहता हैं , रुधिर की कय भी हो जाती हैं । रूधिर बारीक रक्त  वाहिनियों द्वारा धीमे - धीमे रिसता है । 

रोगिणी का ऋतु स्राव के समय जो रुधिर चलना शुरु होता है वह रिसता रहता है और उसका ऋतु काल लम्बा हो जाता है । एक ऋतु काल से दूसरे ऋतु काल तक रुधिर रिसता रहता हैं । बच्चा जनने के बाद रुधिर बन्द हो जाना चाहिए , परन्तु इस औषधि में रुधिर वाहिनियाँ शिथिल पड़ जाती हैं , इसलिए रुधिर बंद होने की बजाय रिसता रहता हैं । ऋतु काल , प्रजनन आदि की इन शिकायतों को तथा इन शिकायतों से उत्पन्न होने वाली कमजोरी को कार्बो वेज दूर कर देती हैं । 

कभी - कभी बच्चा जनने के बाद प्लेसेन्टा नहीं निकलता और धीरे - धीरे रुधिर रिसने लगता हैं , जरायु में वेग से रुधिर का प्रवाह छोड़कर प्लेसेन्टा को बाहर धकेलने की शक्ति नही होती । अगर इस हालत मे रुधिर धीरे - धीरे रिस रहा हो , तो कार्बो वेज की कुछ मात्राएँ देने से प्लेसेन्टा बाहर आ जाता हैं और शल्य क्रिया करने की जरूरत नही पड़ती । 

अगर जच्चा अत्यत कमजोर हो जाए , पेट मे हवा भरती रहे , उसकी शिराए फूल जाए , तो कार्बो वेज की कुछ मात्राए देने से वह प्रजनन के कष्ट को बर्दाश्त करने की क्षमता पा जाती हैं , परन्तु इस औषधि का प्रयोग तभी हो जब पूर्ण लक्षण मौजूद हो । हृष्ट पुष्ट व ताकतवर स्त्री इस कष्ट को आसानी से बर्दाश्त कर सकती हैं , उसे कार्बो वेज देने की जरूरत नहीं । 

बच्चे को दूध पिलाने में माता को अत्यंत कमजोरी व शिथिलता अनुभव हो तो उसे कार्बो वेज दिया जा सकता है । 

" विषेला फोड़ा , सड़ने वाला जख्म , गैग्रीन " 

जब रक्त वाहिनियां शिथिल पड़ जाती हैं और कोई चोट लगती हैं , तो वह ठीक होने के स्थान में सड़ने लगती हैं । फोड़े ठीक नही होते , उनमे से हल्का - हल्का रुधिर रिसता रहता हैं और विषैले हो जाते हैं , और जब फोड़े ठीक न होकर विषैला रूप धारण कर लेते हैं , तो गैग्रीन बन जाती हैं । 

जब भी कोई रोग शिथिलता की अवस्था में आ जाता है , ठीक होने मे नही आता , तब कार्बो वेज जीवन शक्ति को सचेष्ट करने का काम करता है । 

>> वेरीकोज वेन्ज - रुधिर की शिथिलता के कारण हृदय की तरफ जाने वाला नीलिमायुक्त अशुद्ध - रक्त बहुत धीमी चाल से जाता हैं , इसलिए शिराओं में रक्त एकत्रित हो जाता है और शिराएँ फूल जाती हैं । इस रक्त के वेग को बढाने के लिए रोगी को अपनी टागे ऊपर करके लेटना पड़ता हैं । रक्त की इस शिथिलता को कार्बो वेज दूर कर देती है क्योंकि इसका काम रक्त संचार की कमजोरी को दूर करना है । 

>> शारीरिक तथा मानसिक थकान - शारीरिक थकान तो इस औषधि का चरित्रगत लक्षण हैं, क्योंकि शिथिलता इसके हर रोग में जाती हैं । शारीरिक शिथिलता के साथ रोगी मानसिक शिथिल भी हो जाता हैं । विचार में शिथिल, सुस्त, शारीरिक व मानसिक कार्य के लिए अपने को तत्पर नहीं कर पाता । 

" कार्बो वेज मृत सजीवनी दवा " 

कार्बो वेज औषधि को मृत संजीवनी दवा कहा जाता हैं। जब रोगी ठंडा पड़ जाता हैं, नब्ज भी कठिनाई से मिलती हैं, शरीर पर ठंडा पसीना आने लगता हैं , चेहरे पर मृत्यु छाई रहती हैं , इस अवस्था में रोगी बच सकता हैं तो इस औषधि से बच सकता हैं । कार्बो वेज जैसी कमजोरी अन्य किसी औषधि में नही हैं , इसलिए मरणासन्न व्यक्ति की कमज़ोर हालत में यह मृत संजीवनी का काम करती हैं । उस समय 200 या उच्च शक्ति की मात्रा देने से रोगी के जी उठने की उम्मीद हो सकती हैं । 

" कार्बो वेज के अन्य लक्षण "

>> ज्वर में प्यास - ज्वर की शीतावस्था में प्यास व ऊष्णावस्था में प्यास का अभाव यह एक विचित्र  लक्षण हैं। 

>> तपेदिक की अन्तिम अवस्था - तपेदिक की अन्तिम अवस्था में जब रोगी सूक जाता हैं , तो खांसी से परेशान रहता हैं , रात को पसीने से तर रहता हैं , साधारण खाना खाने पर भी पतले दस्त आते हैं , तब इस औषधि से रोगी को कुछ लाभ होता हैं।

>> वृद्धावस्था की कमजोरी - युवकों को जब वृद्धावस्था के लक्षण सताने लगते हैं या वृद्ध व्यक्ति जब कमज़ोर होने लगते हैं , हाथ - पैर ठंडे रहते हैं , नसें फूलने लगती है , तब कार्बो वेज लाभप्रद होती हैं । रोगी वृद्ध हो या युवा , जब उसके चेहरे की चमक चली जाती है , जब वह काम करने की जगह लेटे रहना चाहता है , अकेला रहना पसन्द करता है , दिन के काम से इतना थक जाता है कि किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक श्रम उसे भारी लगता है , तब इस औषधि से लाभ होता हैं । 

" कार्बो वेज की शक्ति तथा प्रकृति " 

यह गहरी तथा दीर्घकालिक प्रभाव करने वाली औषधि हैं । यह  6, 30, 200 व अधिक शक्तियों में उपलब्ध हैं । यह  गर्म प्रकृति की औषधि  हैं ।


सोमवार, 17 मई 2021

कार्बो एनीमैलिस ( CARBO ANIMALIS ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

CARBO ANIMALIS uses in hindi

कार्बो एनीमैलिस ( CARBO ANIMALIS ) के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें विस्तार से जानते हैं-

  • ग्रन्थियों का कड़ापन - प्लेग , कैंसर , ट्यूमर
  • ग्रंथि शोथ में कार्बो एनीमैलिस तथा बेलाडोना की तुलना  
  • मासिक धर्म तथा प्रदर में मरणासन जैसी अवस्था 
  • थोड़ा सा बोझ उठाने से पैर में मोच आ जाना
  • त्वचा पर तांबे के रंग जैसी फुंसियां

" कार्बो एनीमैलिस की प्रकृति "

रोगी के गर्म कमरे में रहने से और हाथ से दबाने पर आराम मिलता हैं। जबकि ठंडी हवा से , हजामत के बाद और रजोधर्म के बाद रोग में वृद्धि होती हैं।

" प्रन्थियों का कड़ापन - प्लेग, कैंसर, ट्यूमर "

कार्बो एनीमैलिस एक गहन क्रिया करने वाली औषधि हैं । इसकी शिकायतें रोग को लेकर चुपके - चुपके आती है , धीरे - धीरे बढ़ती हैं , और जब प्रकट होती हैं, तब तक घातक रूप धारण कर लेती हैं । शरीर की ग्रंथियों पर इसका विशेष प्रभाव होता हैं । शरीर के जिन अंगों में भी ग्रन्थियों में कड़ापन होता हैं, उसे कार्बो एनीमैलिस दूर कर देती हैं । जांघ , सीने आदि मे गिल्टियों के सूज जाने और उनके कड़ा पड़ जाने में यह औषधि खास उपयोगी हैं । सुज़ाक और आतशक की गिल्टिया जब कड़ी पड़ जाती हैं, तब भी इस औषधि से लाभ होता हैं । 

कैंसर और ट्यूमर में भी गिल्टियों का कड़ापन होता हैं, इसलिए उन्हें भी कार्बो एनीमैलिस ठीक कर देती हैं । स्त्रियों के स्तन कैंसर में स्तन की गिल्टियाँ सूज जाती हैं , गर्भाशय के कैंसर में गर्भाशय का मुख अत्यन्त कड़ा पड़ जाता हैं, दर्द होता हैं और खून भी जाता हैं । इन सब गिल्टियो के कड़ेपन में कार्बो एनीमैलिस लाभप्रद होती हैं । कार्बो एनीमैलिस आँख के असाध्य ट्यूमर को भी ठीक कर देती हैं ।  

" ग्रंथि शोथ में कार्बो एनीमैलिस तथा बेलाडोना की तुलना "

बेलाडोना में ग्रंथियां सूज जाती हैं, छूने पर गर्म लगती हैं, जिन्हें स्पर्श नहीं किया जा सकता । पहले चमकदार लाली दिखाई देती हैं , फिर नीला पड़ जाता हैं और अगर इलाज न किया जाए तो फूट जाता हैं और पस पड़ जाती हैं । परन्तु कार्बों एनीमैलिस में ऐसा नहीं होता । इसमें ग्रन्थि का शोथ धीरे - धीरे होता हैं और पकने के बजाय कड़ी पड़ जाती है । 

" मासिक धर्म तथा प्रदर में मरणासन जैसी अवस्था "

स्त्रियों को मासिक धर्म बहुत जल्दी होता हैं, देर तक रहता हैं और बहुत ज्यादा खून आता हैं । इस औषधि की रोगी स्त्री प्रत्येक मासिक धर्म के समय इतनी कमजोर हो जाती हैं कि मरने के समान हो जाती हैं । ऐसी मरणावस्था जैसी कमजोरी प्रदर में भी होती हैं । 

" थोड़ा सा बोझ उठाने से पैर में मोच आ जाना "

थोडा सा भी बोझ उठाने पर रोगी के पांव में मोच पड़ जाती हैं । अत्यधिक कमज़ोरी  होने के कारण पैर के गिट्टे चलते हुए मूड जाते हैं । जोड़ो में अत्यधिक कमज़ोरी आ जाती हैं । रीढ़ की अन्त वाली हड्डी पर जोर पड़ने से उसमें दर्द होता हैं । 

" त्वचा पर तांबे के रंग जैसी फुंसियां "

चेहरे और शरीर पर तांबे के रंग की बेशुमार फुंसियां हो जाती हैं, जो कार्बो एनीमैलिस के इस्तेमाल से दूर हो जाती हैं। 

" कार्बो एनीमैलिस की शक्ति तथा प्रकृति "

कार्बो एनीमैलिस 6, 30 , 200 व अधिक शक्तियों में उपलब्ध हैं । यह शीत प्रकृति की औषधि हैं । होम्योपैथिक दवा का प्रयोग चिकित्सक की सलाह  से करें।


रविवार, 18 अप्रैल 2021

कारडुअस मेरियेनस ( CARDUUS MARIANUS ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदें

कारडुअस मेरियेनस ( CARDUUS MARIANUS ) के व्यापक लक्षण, रोग व फायदों का विस्तार पूर्वक विश्लेषण

" लिवर में फायदेमंद औषधि " 

होम्योपैथिक में इस औषधि के विषय में कहा जाए तो यह लिवर के रोगों की दवा हैं । इस औषधि का केन्द्र बिन्दु जिगर हैं । रोगी को नियमित या अनियमित समय पर पित्त की उल्टियां होती रहती हैं । 

डा ० कैन्ट का कथन है कि उन्होंने अनेक ऐसे रोगियों को इस दवा से ठीक किया हैं जिनको ऐसा सिर दर्द होता था जिसका अन्त पित्त की उल्टी में होता था , जो कैलोमेल लेने के आदी थे , जिनके अंगों में जिगर की खराबी के कारण पानी पड़ गया था। पीलिया में भी इस औषधि से लाभ होता हैं 

इसका सबसे मुख्य लक्षण यह है कि जब रोगी बायीं करवट लेटता है तब पेट की दायीं तरफ दर्द होता है । इस औषधि से पित्त का स्वस्थ निर्माण होता हैं, और पित्ताश्मरी बनना बन्द हो जाता हैं । कई बार पित्ताश्मरी के बार - बार दर्द के दौर को भी रोक देती हैं । 

इसका एक लक्षण यह भी है कि पीठ मे दायें अस्थि फलक के नीचे दर्द होता हैं । इस दर्द का कारण भी जिगर का दोष होता हैं। इस में भी यह औषधि लाभप्रद होती हैं।

डा ० नैश लिखते हैं कि बायें अस्थिफलक के नीचे का दर्द चैनोपोडियम ग्लाउसाई या सैग्विनेरिया से भी दूर हो जाता है ।