बुधवार, 6 जनवरी 2021

ऐमोनियम कार्बोनिकम ( AMMONIUM CARBONICUM ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदे

ऐमोनियम कार्बोनिकम को ऐमोनिया कार्ब भी कहा जाता हैं, इस औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग तथा फायदों को विस्तार से जानते हैं-

  • स्थूलकाय स्त्रियों को ऐमोनिया कार्ब सूंघने की आदत पड़ना 
  • दमे जैसा श्वास कष्ट , दमे में भी ठंडी हवा की इच्छा 
  • कफ से श्वास कष्ट 
  • इन्फ़्लुएन्ज़ा के बाद  बची खांसी 
  • ऐमोनिया कार्ब के स्राव तीखे लगना 
  • मासिक धर्म में जननांगों के भीतर दर्द 
  • मासिक धर्म जल्दी, अधिक खून, काला खून तथा खून के थक्के होना 
  • मासिक धर्म से पहले दिन हैजे जैसे दस्त 
  • प्रात: काल 3 बजे रोग का बढ़ना 
  • ऐमोनियम कार्बोनिकम व लैकेसिस औषधि की तुलना

ऐमोनियम कार्बोनिकम की प्रकृति -  दबाने, पेट के बल लेटने और पीड़ा ग्रस्त अंग की तरफ लेटने से रोग व लक्षणों में कमी आती हैं। ठंड , नमी वाले बादल के दिन, खुली हवा से, प्रात काल लगभग तीन चार बजे, मासिक धर्म के दिनों में, स्नान से व सोने के बाद रोग व लक्षणों में वृद्धी होती हैं।

स्थूलकाय स्त्रियों को ऐमोनिया कार्ब सूंघने की आदत पड़ना - जिन स्त्रियों को हृदय रोगों के कारण श्वास कष्ट होता हैं, उन्हें ऐमोनिया कार्ब सूंघने के आदत पड़ जाती हैं । वे प्राय ऐमोनिया कार्ब अपने पास रखती हैं और श्वास कष्ट में इसे सूंघती हैं । अधिक कमजोरी, श्वास लेने में कठिनाई, ऐसा लगना कि हृदय काम नहीं कर रहा । रोगी हृदय की धड़कन से बिस्तर पर लेटा रहता हैं और हिलने - डुलने से उसे सांस लेने में कष्ट होता हैं। यह रोगी की शारीरिक कमज़ोरी होती हैं। अत: उसे किसी दवा से लाभ नही होता । और ऐसे रोगियों को आराम करने को कहा जाता हैं । यह औषधि उन स्त्रियों के लिये बहुत उपयोगी हैं, जो कफ़ प्रकृति की होती हैं, स्थूलकाय, कमजोर और बार-बार में बेहोश हो जाती हैं ।  जिन्हें सचेत रहने के लिये ऐमोनिया कार्ब सूंघना पड़ता हैं। 

दमे जैसा श्वास कष्ट - इस औषधि में शीत प्रधान दमे का रोगी स्वास कष्ट में भी ठंडी हवा पसंद करता हैं।  दमे के ऐसे रोगी का विलक्षण यह होता हैं कि अगर वह गर्म कमरे में हो तो भी उसका श्वास कष्ट बढ़ जाता हैं , दम घुटने लगता हैं और वह शान्ति के लिये ठंडी हवा में जाना चाहता हैं। परन्तु रोगी अपनी प्रकृति व शारीरिक अनुभूति में ठंड से डरता हैं। परन्तु दमे में गर्मी से डरता हैं ।

कफ से स्वास कष्ट - इस औषधि में कफ के लक्षण अधिक पाये जाते हैं । छाती में और श्वास - प्रणालियों मे कफ खड़कता है । इसी कफ के अटके रहने के कारण सास लेने में कष्ट व भारीपन अनुभव होता हैं। छाती में इतना कफ भर जाता हैं कि निकलता ही नहीं । क्षय रोग की अंतिम अवस्था में जब फेफड़े कफ से भर जाते हैं, तो यह औषधि स्वास कष्ट को कम कर देती है । 

इन्फ़्लुएन्ज़ा के बाद  बची खांसी - इन्फ्लुएन्ज़ा के बाद जो खांसी रह जाती हैं, वह किसी दवा से आसानी से ठीक नही होती हैं । लेकिन एमोनियम कार्बोनिकम 200 की एक मात्रा से यह एकदम ठीक हो जाती हैं ।

ऐमोनिया कार्ब के स्राव तीखे लगना - ऐमोनिया कार्ब में सब प्रकार के स्राव तीखे होते हैं । नाक से जो पानी बहता हैं उससे होंठ छिल जाते हैं, मुख का सेलाइवा होंठ को बीच में से काट डालता हैं, होठों के दोनो सिरे छिल जाते हैं। रोगी होठों की त्वचा को छीलता रहता हैं । आँख के पानी से आँखें जलती रहती हैं । स्त्री के गुह्याग भी दुखने लगते हैं , मानो पक रहे हो । यह भी वहा के स्राव के लगने के कारण होता है । अगर शरीर पर कोई घाव हो जाता है तो उसमें से भी लगने वाला स्राव बहता है । यह लगना , त्वचा को छील देना  इस औषधि के स्रावो की विशेषता है । 

मासिक धर्म में जननांगों के भीतर दर्द - स्त्री का  आन्तरिक जननांगों दर्द रहता हैं , ऐसे लगता है जैसे जननांगों के भीतर यह दर्द बहुत गहरा हो। इस दर्द से अभिप्राय सिर्फ स्पर्श से ही नही है , बिना स्पर्श के भी दर्द बना रहता हैं । मासिक धर्म काल में यह आन्तरिक दर्द बढ़ जाता हैं और जब तक मासिक धर्म होता रहता है तबतक भीतर के जननांगों में दर्द रहता हैं । 

मासिक धर्म जल्दी, अधिक खून, काला खून तथा खून के थक्के होना - इस औषधि में लगने वाला प्रदर , जननांगों की दुखन , लगाने वाले स्राव से जननांगों में सूजन आ जाती हैं । मासिक धर्म बहुत जल्दी हो जाता हैं, समय से पहले, अधिक खून, काला खून और खून के थक्के के थक्के होते हैं, तो यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 

मासिक धर्म से पहले दिन हैजे जैसे दस्त - इस औषधि का विशेष लक्षण यह है कि रजोधर्म होने से पहले दिन हैजे जैसे दस्त होते हैं और मासिक धर्म के दिनो में भी दस्त बने रहते हैं ।  

प्रात: काल 3 बजे रोग का बढ़ना - वृद्ध पुरुषों में ज्यादातर प्रात काल 3 बजे खांसी की शिकायत रहती हैं, और जब खांसी आती हैं, तो खासते - खासते पसीना आ जाता हैं और साथ ही दम घुटता है । तो यह औषधि कारगर होती हैं।

लैकेसिस तथा ऐमोनिया कार्ब का सम्बन्ध - लैकेसिस का प्रभाव बाई तरफ रहता हैं और ऐमोनिया कार्ब का प्रभाव दाई तरफ होता हैं। इस अन्तर के बाद भी इन दोनों औषधियों काफी सम्बन्ध हैं । जैसे - 

( क ) दोनो औषधियो में काले खून का बहना पाया जाता हैं । 

( ख ) दोनो औषधियों में सोने के बाद लक्षणों में वृद्धी होती हैं । 

ऐमोनियम कार्बोनिकम के अन्य लक्षण - बालों का झड़ना इस का प्रधान लक्षण हैं । नख पीले पड़ जाते हैं । प्रात: काल मुख धोते समय नकसीर आना । स्नान के बाद त्वचा पर लाल धब्बे उभर आना । स्नान के बाद त्वचा पर खून लहरें मारने लगता है । हड्डियों, दांतो और जबड़ो में दर्द रहता हैं । 

ऐमोनिया कार्ब की शक्ति तथा प्रकृति - यह औषधि 6, 30, 200 शक्ति में उपलब्ध हैं । यह दीर्घकालिक एन्टी सोरिक और शीत प्रधान औषधि हैं।


सोमवार, 21 दिसंबर 2020

एम्ब्रा ग्रीसिया ( AMBRA GRISEA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग और फायदें

एम्ब्रा ग्रीसिया दवा के लक्षण, मुख्य रोग व फायदों को विस्तार से जानते हैं -

  • जवानी में वृद्धावस्था के लक्षण 
  • चक्कर आना
  • घरेलू विपत्ति या व्यापार में हानि से स्नायु दुर्बलता तथा अनिद्रा 
  • गाना बजाना सहन न होना व सुनने से खांसी आ जाना 
  • शरीर के पीड़ित अंग में शिकायत

एम्ब्रा ग्रीसिया की प्रकृति - भोजन करने के बाद  ठंडी हवा में व ठंडा खाने पीने से लक्षणों में कमी आती हैं। दूसरों की उपस्थिति से, चिन्ता , व्यावसायिक चिन्ता, घरेलु विपत्ति, वृद्धावस्था में और  प्रातःकाल तथा सायंकाल को रोग में वृद्धि होती हैं।

जवानी मे वृद्धावस्था के लक्षण -  कई दुबले - पतले युवक-युवतियाँ  जवानी में ही बुढ़ापे जैसी अवस्था में पहुंच जाते हैं , वे 50 से 60 वर्ष की आयु जैसे लगते हैं । ऐसे रोगियों के लिये यह उत्तम औषधि हैं । रोगी के अंगों में कमजोरी के कारण कंपन , चलने में लड़खड़ाहट , स्मरण शक्ति की कमी - ये सभी लक्षण दिखाई देते हैं । वे बात करते हुए भूल जाते हैं कि क्या कहा था , प्रश्न करेंगे और उत्तर सुने बिना दूसरा प्रश्न कर डालेंगे । कई नवयुवकों में ऐसी मानसिक कमजोरी आ जाती हैं , वे पागल तो नहीं होते , परन्तु पागल जैसी प्रवृति करते हैं । 

वृद्ध लोगों में स्नायु - दुर्बलता का यह लक्षण पाया जाता हैं कि वे क्षण में तो बिल्कुल हतोत्साह , निराश दीख पड़ते हैं , फिर कुछ देर बाद , स्वभाव की उग्रता दर्शाते हैं । इस प्रकार के स्नायु - दुर्बलता में वृद्ध - पुरुषों को इस दवा से लाभ होता हैं । कभी - कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्ति सुख - दुख , शुभ - अशुभ सब बातों के प्रति उदासीन हो जाता हैं । जिन बातों से दूसरों का दिल टूट जाए उन बातों का उन पर कोई असर नहीं होता हैं। ऐसा इसलिए होता हैं, क्योंकि उनकी सोच विचार की शक्ति क्षीण हो जाती हैं । प्रात: काल उठने पर इन लोगों की मानसिक स्थिति सजग नहीं होती, वे स्वप्न की अवस्था में ही रहते हैं । अगर यह अवस्था बढ़ जाए , तो सायंकाल तक पागल से पाये जाते हैं । 

चक्कर आना - जिन लोगों में युवावस्था में ही वृद्धावस्था के लक्षण प्रकट हो जाते हैं, उनकों चक्कर आना स्वाभाविक हैं । वह अकेला बाहर नहीं निकल सकता, जिस विषय पर विचार-विमर्श हो रहा हैं, उस पर ध्यान केंद्रित नही कर पाता हैं। चक्करों की इस अवस्था में एम्ब्रा ग्रीसिया बहुत ही अच्छी औषधि हैं।

घरेलू विपत्ति या व्यापार में हानि से स्नायु दुर्बलता तथा अनिद्रा - एक स्वस्थ आदमी को व्यापार में एकदम से नुकसान हो जाए या फिर घरेलू विपत्ति आ जाए , परिवार में लगातार मौतें होने से मन में ऐसा आघात लगता हैं, कि उसे संसार निस्सार दिखने लगता हैं । और इन दुर्घटनाओं को देखकर उसे जीने का कुछ लक्ष्य नहीं दिखता , वह जीवन से निराश हो जाता हैं । इन्ही विचारों से उसकी निद्रा नष्ट हो जाती हैं । ऐसे रोगी की यह ठीक कर देती हैं । 

गाना बजाना सहन न होना व गाने से खांसी आ जाना - रोगी को गाना सुनने व बजने से अनेक कष्ट होते हैं, खांसी आने लगती हैं । गाने के स्वरों को वह भौतिक वस्तु समझता है , और उसे ऐसी अनुभूति होती हैं, कि स्वर उसे जकड़े हुए हैं । ऐसे में  एम्ब्रा ग्रीसिया औषधि लाभप्रद होती हैं।

शरीर के पीड़ित अंग में शिकायत - एम्ब्रा ग्रीसिया में शरीर के एक अंग में ही शिकायत होती है । जैसे रोगी के शरीर के उसी अंग में पसीना आता है जो अंग पीड़ित व रोग ग्रस्त हैं , दूसरे में नहीं आता ।  

इस औषधि के कुछ अन्य लक्षण भी होते हैं। जैसे- स्त्री प्रसंग के समय दमे का दौरा पड़ना , मेरुदण्ड के प्रदाह से जो लोग रोग ग्रस्त हैं उनकी स्नायविक खांसी , डकार , उंगली व बाह में से किसी एक अंग में सुन्नपन और  भीड़ से परेशानी जैसे लक्षणों में लाभ करती हैं ।  यह स्नायु प्रधान दवा हैं । 

एम्ब्रा ग्रीसिया औषधि की शक्ति व उपयोग -2 या 3 शक्तियों का बार - बार प्रयोग किया जा सकता हैं । सांयकाल इस औषधि को नही देना चाहिये , इससे रोग बढ़ सकता हैं । यह व्हेल मछली से निकलता हैं और यह नोसोड ( Nosode ) होता हैं ।


रविवार, 20 दिसंबर 2020

एलूमिना ( एलूमीनियम ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

एलूमिना ( एलूमीनियम ) औषधि के व्यापक  लक्षण, मुख्य रोग व फायदों का विश्लेषण विस्तार से जानते है,

  • एलूमिना के मानसिक लक्षण 
  • चाकू या खून देखकर स्वयं या दूसरे  को मारने का ख्याल आना 
  • प्रात: काल उठने के बाद उदासी 
  • स्नायु - सस्थान के लक्षण ( मेरुदण्ड में जलन व शिथिलता )
  • मूत्राशय तथा मलाशय में शिथिलता 
  • बुढ़ापे में चक्कर आना  
  • बच्चा सो कर घबराहट में उठना  
  • नाक तथा गले में कटार ( जुकाम )
  • खुजली होने के बाद फोड़े फुन्सी होना 
  • बेहद खुश्की ( चेहरे व हाथों पर जाले  सा अनुभव, बालों का झड़ना ) 
  • आवाज का बैठना 
  • स्त्रियों में पानी की तरह बहने वाला प्रदर 
  • मासिक धर्म बन्द होने की आयु में 
  • गर्भवती स्त्री तथा शिशु का कब्ज 
  • स्त्रियों तथा पुरूषों का गोनोरिया

एलूमिना की प्रकृति -  सांयकाल के समय, खुली व नम हवा में रहने, हल्के फुल्के चलने - फिरने और  ठंडे पानी के स्नान से रोगी लक्षणों में कमी आती हैं। और,  गर्मी में, बन्द कमरे में रहने से, आलू खाने से, बातचीत करने से, खुश्क ऋतु में, प्रात: काल उठने से, बैठे रहने से , स्त्रियों में रजोधर्म के बाद लक्षणों में वृद्धी होती हैं। और अकारण भी समय - समय पर रोग के लक्षणों में कमी - वृद्धि होती रहती हैं।

एलूमिना के मानसिक लक्षण - मानसिक शिथिलता, जड़ता, निर्णय शक्ति का अभाव अर्थात  शिथिलता  इसका मुख्य लक्षण है । यह शिथिलता शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की होती है । रोगी हमेशा भ्रम में रहता हैं, जिसके कारण वह निर्णय लेने में असमर्थ होता हैं ।  जिन चीजों को वह पहले वास्तविक रूप में जानता था , वे अब उसे वास्तविक नही लगती । जब वह कुछ कहता हैम या देखता हैं , तो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि कोई दूसरा कह रहा हैं या दूसरा देख रहा हैं। उसे अपने व्यक्तित्व के विषय में संदेह होता हैं , वह यह निश्चय नहीं कर पाता कि वह कौन हैं। पढ़ने लिखने में गलतियां करता हैं, गलत शब्दो का प्रयोग करता हैं। मन शिथिल व भ्रम में हो तो एलूमिना दी जाती हैं । 

समय धीरे धीरे बीतता मालूम होना - एलूमिना का दूसरा मानसिक लक्षण यह हैं कि उसे लगता हैं कि समय बहुत धीरे बीत रहा हैं । वह समझता है कि चीजें जिस तेजी से होनी चाहिये उस तेज़ी से नहीं हो रही , सब कार्यों में देर हो रही है , जिस काम में आधा घंटा लगना चाहिये उसमे पूरा दिन लग रहा हैं । तो ऐसे में एलूमिना कारगर होती हैं।

चाकू या खून को देखकर स्वयं व दूसरे को मारने का ख्याल आना - इस औषधि के रोगी का मन इतना अधिक प्रभावित हो जाता हैं कि रोगी अगर चाकू या खून को देखता है , तो उसके भीतर दूसरे को या स्वयं को मारने की भावना प्रबल हो उठती हैं, वह आत्महत्या करना चाहता हैं । 

प्रात काल उठने के बाद उदासी ( चित वृत्ति का बदलते रहना ) - इस औषधि का रोगी प्रात काल  उठने के बाद उदास होता हैं और रोने लगता हैं। अपनी परिस्थितियों से दूर भागना चाहता हैं और भयभीत रहता हैं। समझता है कि जिन परिस्थितियों से घिरा हैं, उनके हटने से उसका दुख दूर हो जाएगा ।  जब वह अपनी मानसिक दशा के बारे में सोचता हैं तो डरता हैं कि कहीं वह पागल तो नहीं हो गया । अपना नाम तक भूल जाता हैं, सोचने लगता हैं, मन घबराया रहता हैं । उसे वास्तव में लगता हैं, कि वह सचमुच पागल हो गया हैं । प्रात: काल सोकर उठने के बाद उसके मन में ऐसे विचार आते - जाते रहते हैं, परन्तु चित्त वृत्ति बदलती रहती है । कभी निराशा की मनोवृत्ति से निकल कर वह आशाभरी , शांत मनोवृत्ति में आ जाता हैं , इसके बाद फिर उसी निराशा में चला जाता है । इस औषधि की प्रकृति में समय - समय पर रोग का बढ़ना - घटना चलता रहता हैं । 

स्नायु संस्थान  के लक्षण ( मेरुदण्ड में जलन व शिथिलता ) - जो स्नायु  मेरूदण्ड से निकलते हैं, उन पर इस औषधि का विशेष प्रभाव होता हैं । इन स्नायु संस्थान में शिथिलता आने से भोजन नली में निगलने में कठिनाई होती हैं, हाथ उठाने हिलाने में कठिनाई होती हैं ।  टांगों में, मलद्वार, मूत्रद्वार में शिथिलता, जड़ता अनुभव होती है । सबसे पहले  इन अंगों की क्रियाशीलता नष्ट होती हैं, फिर अंत में पूरा अर्धाग हो जाता हैं । पाव में कांटा लगे , कोई चूटी मारे तो एकदम अनुभव नहीं होता । सिर्फ बाह्य अनुभव होता हैं, चेतना तक धीरे - धीरे पहुंचता हैं । 

मेरुदंड में जलन होती हैं और पीठ में दर्द होता हैं । रोगी को लगता हैं, पीठ में  मेरुदण्ड के नीचे की कशेरुका में गर्म लोहा घुसा दिया गया हो । मेरुदण्ड के प्रदाह में जब पीठ की मांसपेशियों में ऐंठन  अनुभव हो , और मेरुदण्ड की उपझिल्ली  का शोथ हो तो वहां एलुमिना आश्चर्य जनक कार्य करती हैं । 

मूत्राशय की शिथिलता - स्त्री या पुरुष दोनों को देर तक पेशाब के लिये बैठे रहना, पेशाब नहीं आता, देर से आता है , धीरे - धीरे निकलता हैं। कभी - कभी धार की जगह बूंद - बूंद कर पेशाब निकलता हैं। कभी - कभी भरा रहता है और अपने आप  बूँद - बूँद कर टपकता रहता हैं । यह इस अंग की शिथिलता के कारण होता हैं, जो इस औषधि का व्यापक लक्षण हैं । इसका विलक्षण लक्षण यह हैं कि पेशाब करने के लिए भी मलाशय अर्थात् गुदा पर जोर लगाना पड़ता है । 

मलाशय की शिथिलता - मलाशय इतना शिथिल हो जाता है कि भरा रहने पर भी मल नहीं निकलता, मल कठोर न होकर तरल ही क्यो न हो , वह नहीं निकलता । जब गुदाद्वार में इस प्रकार की जड़ता , शिथिलता हो कि दस्त भी न निकले , ऐसी कब्ज हो , तब यह औषधि उत्तम कार्य करती है । रोगी को अनुभव होता है कि मलद्वार मल से भरा हैं और ज़ोर लगाने पर भी मल नही निकल रहा, तो रोगी को पेट की मांसपेशियों से ज़ोर लगाना पडता हैं, परन्तु गुदाद्वार की मांसपेशियां मल को धकेलने में कोई सहायता नहीं करती । कठिनाई से मल निकालने पर प्रोस्टेट ग्लैंड का स्राव निकल पड़ता है क्योकि मल के लिये जोर लगाने पर इस ग्रंथि पर जोर पड़ता है । अगर ऊपर लिखे गये मानसिक लक्षण मौजूद हो , तब कठोर मल और कठिन कब्ज होने पर भी इस औषधि से बड़ा लाभ होता है । 

परन्तु इस आधार पर ही एलूमिना दे देना उचित नही हैं कि पतला मल भी जोर लगाने से ही निकलता हैं । होम्योपैथिक में एक ही लक्षण पर दवा नहीं दी जाती , रोगी की लक्षण समष्टि पर ध्यान दिया जाता है । उदाहरणार्थ , पतले मल के लिये भी जोर लगाना पड़ना नक्स मौस्केटा और चायना में भी होता हैं। 

रोगी को पतले मल के लिये भी जोर लगाना पड़ता है , परन्तु उसकी प्रकृति ऐसी हो कि वह जगा नहीं रह सकता, पढ़ने पर झट से सो जाता हैं, हमेशा सोना पसंद करता हैं। देर तक खड़ा नहीं रह सकता है , बंद कमरे में परेशान हो जाता हैं और खुली ठंडी हवा में भी परेशान हो जाता हैं। तो ऐसे रोगी को एलूमिना की जगह नक्स मौस्केटा देने से उसकी कब्ज की शिकायत दूर हो जाती हैं। 

रोगी को पतले मल के लिये जोर लगाना पड़ता हैं, परन्तु उसका पेट हवा से भरा रहता हो, चेहरा खून की कमी से पीला पड़ गया हो, कमजोर हो, ऊपर से डकारे आती हो , नीचे से हवा खारिज होती रहती है , जितनी हवा ऊपर - नीचे से निकलती हैं , उसकी परेशानी भी बढ़ती जाती है तो ऐसी कब्ज़ के लिए चायना दी जाती हैं । 

बुढ़ापे में चक्कर आना - जैसा की हमने पहले ही बता दिया हैं कि एलूमिना के रोगों का उद्भव स्नायु संस्थान या मेरुदंड की विकृति से होता हैं। इसी कारण इस औषधि का व्यापक लक्षण जडता, शिथिलता और अपंगता हैं । और इसी कारण बुढ़ापे में चक्कर आने पर यह दवा दी जाती हैं । रोगी को यह भी लगता हैं कि चीजें लगातार घूम रही हैं,  वृद्ध व्यक्तियों को शिथिलता के कारण चक्कर आना संभव हैं, और चलने में व्यक्ति डिगमिगाता हैं । इसी कारण पैरों और हाथों की अंगुलियों में सुन्नपन आ जाता है । रोग की प्रारमिक अवस्था में एलूमिना इन रोगों को ठीक कर देती है । 

बच्चा सोकर घबराहट में उठना - इसकी प्रकृति में हमने बताया था कि इसके रोग प्रात: काल सोकर उठने के बाद बढ़ते हैं । एलूमिना के मानसिक लक्षणों में शिथिलता , जड़ता के कारण बच्चा प्रात: काल जब सोकर उठता हैं, तब घबराया हुआ होता हैं । उसकी शारीरिक तथा मानसिक स्थिति शिथिल होती है । ज्यों - ज्यों दिन बढ़ता हैं , अंगों में जान आने लगती हैं। सोकर उठने पर सभी चीजे अपरिचित लगती हैं।

नाक तथा गले में कटार ( जुकाम ) - सब अंगों की शिथिलता का असर नाक तथा गले पर भी पड़ता हैं । नाक तथा गले की झिल्ली खुश्क हो जाती है ।  ज्यादातर बायी नाक बंद रहती हैं । नाक में  बदबूदार , सूखी पपड़ी जमती हैं । रोगी हर समय खांसता और नाक साफ करता रहता हैं । गले में लसदार बलगम चिपका रहता हैं और अत्यन्त खुश्की अनुभव होती हैं । रोगी को न्गलने में कठिनाई होती हैं। अर्जेन्टम नाइट्रिकम , नाइट्रिक एसिड तथा हिपर में भी यह लक्षण पाए जाते हैं ।  

खुजली होने के बाद फोड़े फुन्सी होना -  त्वचा में इतनी खुजली होती हैं, कि खुजलाते - खुजलाते त्वचा छिल जाती हैं और फिर फोड़े - फुंसी हो जाते हैं । कई बार फोड़े फुंसी पहले होते हैं और उन्हें खुजली चलती हैं ।  एलूमिना में त्वचा सूख जाती हैं , उसमें दरारें पड़ जाती हैं और सख्त पड़ जाती हैं । इसका कारण शिथिलता और जड़ता हैं । अगर खुजली पहले और खुजलाने के बाद फोड़े - फुंसी होते हैं, तब एलूमिना , मेजेरियम , आर्सनिक आदि दवा दी जाती हैं। अगर फोड़ा - फुन्सी पहले हो और खुजली में खुजली हो तो हिपर दवा दी जाती हैं । 

बेहद खुश्की ( चेहरे तथा हाथों पर जाले जैसा अनुभव, बाल झड़ना ) - बेहद खुश्की एलूमिना का व्यापक लक्षण हैं । चेहरे की रुधिर प्रणालिकाए सूख जाती हैं, जिनके कारण चेहरे  पर मकड़ी का जाल लिपटा हुआ प्रतीत होता हैं । यह अनुभूति इतनी कष्टदायक होती हैं, कि रोगी बैठा - बैठा चेहरा रगड़ता रहता हैं । हाथों की पीठ पर भी ऐसा ही अनुभव होता है । रोगी मुह पर बार - बार इस तरह हाथ फेरता है जैसे चेहरे से कुछ हटा रहा हो । 

आवाज़ का बैठ जाना - लकवे जैसी शिथिलता इस औषधि का व्यापक लक्षण हैं । इसी कारण गला भी बैठ जाता हैं और गायक थोडी देर ही गा पाता हैं । धीरे - धीरे यह शिथिलता इतनी बढ़ जाती हैं कि बोलना ही बंद हो जाता हैं ।  जब तक आवाज़ के बैठने को ठीक करने के लिये एलूमिना औषधि नहीं बनी थी, तब तक  गले बैठने पर गायकों और व्याख्याताओं को अर्जेन्टम नाइट्रिकम दिया जाता था, परन्तु गला बैठने पर  एलूमिना अच्छा काम करती हैं। 

स्त्रियों में पानी की तरह बहने वाला प्रदर - स्त्रियों के रोगों में भी एलूमिना की शिथिलता का लक्षण पाया जाता है । रोगी के जननांग इतने शिथिल हो जाते हैं कि प्रदर का पानी टांगों पर  बहने लगता है । यह पानी पीला, तीखा और त्वचा को काटने वाला होता हैं । यह अंडे जैसा सफेद भी हो सकता हैं । इस प्रदर के साथ रोगी के जननांगों में निम्न लक्षण भी प्रकट हो सकते हैं - जरायु के मुख पर जख्म, जननांगों में शिथिलता, शिथिलता के कारण जननांगों भारीपन,  जननांग की मांसपेशियों में ढीलापन आदि में एलूमिना लाभप्रद होती हैं।

मासिक धर्म बन्द होने की आयु में - लगभग 45-50 वर्ष के आस - पास स्त्रियों का मासिक धर्म बन्द होने का समय होता हैं। माहवारी में कमी से  शिथिलता आ जाती हैं । और रोगिणी अपने को निहायत कमजोर महसूस करती हैं । और जितनी भी माहवारी होती है वह स्त्री को परेशान करती हैं । उस अवस्था में एलूमिना बहुत लाभ करती हैं । 

गर्भवती स्त्री तथा शिशु का कब्ज - अक्सर स्त्रियाँ गर्भावस्था में कब्ज की शिकार हो जाती हैं । उनका मलद्वार काम नहीं करता, उसमें मल निस्काशन की शक्ति नही रहती और पेट से दबाव डालने पर शौच उतरता हैं । ऐसा ही नवजात शिशु के साथ भी होता हैं । ऐसी हालत में यह औषधि लाभप्रद होती हैं । 

स्त्रियों तथा पुरुषों का गोनोरिया - जब किसी स्त्री-पुरूष को गोनोरिया रोग हो जाता हैं  और उसे पल्सेटिला तथा थूजा दी जाती हैं । जिससे रोग में तो कमी आती हैं, परन्तु जड़ से खत्म नही होता और रोग बार - बार पलट कर आ जाता हैं । इस अवस्था में एलूमिना का उपयोग किया जाता हैं । 

एलूमिना औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - एलूमिना औषधि 30,200 व इससे अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । यह शीत व गरम प्रधान औषधि हैं।


एलूमेन - फिटकरी ( ALUMEN ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदें

एलूमेन - फिटकरी ( ALUMEN ) औषधि के व्यापक  लक्षण, मुख्य  रोग व फायदों का विस्तार से विश्लेषण

  • मलद्वार में लकवे जैसी कमजोरी होना
  • मूत्राशय में पक्षाघात जैसी कमजोरी 
  • शोथग्रस्त त्वचा , जिह्वा , गुह्यद्वार , जरायु या फोड़े का कड़ा पड़ जाना 
  • टाँसिल व स्तन ग्रंथियों का कड़ा पड़ जाना 
  • वृद्ध पुरुषों में खाँसी

एलूमेन औषधि की प्रकृति -  सिर दर्द में गर्मी से रोग व लक्षणों में कमी आती हैं। और ठंड से रोग में वृद्धि ( सिर दर्द को छोड़ कर क्योंकि सिर दर्द गर्मी से कम हो जाती है ), और निद्रा व दाई तरफ लेटने से रोग व लक्षणों में वृद्धि होती हैं।

मलद्वार में लकवे जैसी कमजोरी - एलूमेन औषधि में मलद्वार में ऐसी कमजोरी हो जाती है मानो पक्षाघात या लकवा हो गया हो । गुदा की क्रियाशीलता समाप्त हो जाती हैं, और मल गुदा में चिपकने लगता हैं । कोलन में से मल निकलता ही नहीं । जो मल निकलता है वह अत्यंत कठोर , सूखा व पत्थर की तरह गांठोवाला होता हैं । मल सप्ताह में एक बार या दो बार ही निकलता है । 

मूत्राशय में लकवा, पक्षाघात जैसी कमजोरी - जिस तरह मलद्वार शिथिल पड़ जाता है , उसी तरह मूत्राशय में भी  शिथिलता आ जाती है । मूत्र बड़ी कठिनाई से निकलता है । पेशाब कर लेने के बाद भी मूत्राशय भरा हुआ लगता है । शुरूआत में मूत्र निकलने में बहुत देर लगती हैं , और जब मूत्र  प्रारंभ होता हैं , तो मूत्र धार मूत्रनली से सीधे नीचे गिरता है , मूत्र में वेग बिलकुल भी नही होता । इस का कारण मूत्राशय की प्रणाली का पक्षाघात में यह औषधि कारगर होती हैं।

शोथग्रस्त त्वचा , जिह्वा , गुह्यद्वार , जरायु या फोड़े का कड़ा पड़ जाना  -इस औषधि में त्वचा के कड़ा पड़ जाने की प्रवृत्ति है । जहाँ त्वचा में शोथ होगी वहाँ  कड़ी पड़ जाएगी । जिन औषधियों में भी त्वचा में कड़ा पड़ जाने की प्रवृत्ति पायी जाती हैं , वहां कैंसर होने की संभावना  हो जाती हैं।  जब जख्म कड़ा पड़ने लगे तो समझ लेना चाहिये कि वह कैंसर में परिवर्तित हो रहा है । याद रखे कड़ापन बढ़ता - बढ़ता कैंसर बन जाता है । ऐसे जख्म त्वचा पर कही भी हो सकते है और जिह्वा , गुह्यद्वार , जरायु में भी हो सकते हैं । कड़ेपन का  शुरु में ही एलूमेन द्वारा उपचार कर लेने से रोगी कैंसर से बच सकता हैं । 

टाँसिल व स्तन ग्रंथियों का कड़ा पड़ जाना - शरीर की ग्रंथियों में  टाँसिल व स्तन आदि में गोली की तरह कड़ी पड़ जाती हैं तो यह औषधि लाभप्रद होती हैं । यह प्रवृत्ति विशेष रूप से टाँसिल में भी पायी जाती है । जिन लोगों में ठंड  टाँसिल में बैठ जाती है , तो वह टाँसिल को कड़ा कर देती हैं , तो ऐसे में एलूमेन लाभप्रद होती हैं।  टाँसिल के कड़ा होने की प्रवृत्ति बैराइटा कार्ब में भी पायी जाती हैं। और टाँसिल के कड़ापन में बैराइटा कार्ब भी उत्तम औषधि हैं । 

वृद्ध पुरुषों की खांसी - जिन वृद्ध पुरूषों की छाती में कफ जम जाता हैं और आसानी से नहीं निकलता हैं, लम्बी - लम्बी तार के रूप में निकलता हैं , तो यह औषधि उसे ठीक कर देती हैं । यह लक्षण एन्टिम टार्ट में भी पाया जाती हैं । 

एलूमेन औषधि की शक्ति व प्रकृति - यह औषधि 30, 200 व इससे अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं । यह दीर्घकालिक एन्टी  सोरिक औषधि हैं । यह शीत प्रधान औषधि  हैं।


रविवार, 18 अक्तूबर 2020

ऐलो - धी - क्वार ( ALOE )औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें

ऐलो - धी - क्वार ( ALOE )औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें- पेट व आंत्र रोग में लाभप्रद होती है।

  • खाने के तुरत बाद शौच की इच्छा या वेग  
  • गुदा प्रदेश में भारीपन अनुभव होना 
  • वायु ( गैस ) या मूत्र के साथ शौच निकलना 
  • कठिन मल का स्वंय निकल पड़ना 
  • गाढ़ी आंव का निकलना तथा बवासीर
  • डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट होना 
  • बीयर पीने से डायरिया होना 
  • यह जिगर के रोगों की मुख्य औषधि हैं 
  • एलो, नक्स वोमिका व सलफर की तुलना 

एलो औषधि की प्रकृति- इस औषधि में खुली हवा में रहने से, ठंड में रहने से और पाखाने के बाद लक्षणों में कमी आती हैं। जबकि खाने पीने के बाद, गर्मी से, गर्म मौसम से, नम मौसम से, प्रात काल 2 बजे से 9 बजे तक और सवेरे बिस्तर से उठने पर रोग के लक्षणों में वृद्धी होती हैं । 

खाना खाने के तुरत बाद शौच की इच्छा अथवा वेग- गुदा प्रदेश में ऐसी मांसपेशियाँ होती हैं, जिन्हें सकोचक मांसपेशियाँ कहते हैं । सकोचक मांसपेशियों का काम मल को बाहर निकलने से रोकना हैं । ऐलो औषधि के रोगी की सकोचक मासपेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। इसलिए रोगी खाना खाते ही या पानी पीते ही शौच का वेग बनता हैं । और नह शौच का वेग धारण नही कर सकता और शौचालय जाना पसंद करता हैं। प्राय: देखा जाता हैं कि शौचालय में पहुंचने से पहले ही शौच निकल पड़ता हैं। इस लक्षण में यह औषधि लाभ पहुँचाती है।

गुदा प्रदेश में भारीपन अनुभव करना - गुदा प्रदेश की सकोचक मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, इस कारण ज़रा सा भी मल इकट्ठा हो जाने पर रोगी को भारीपन अनुभव होता हैं। और उसका घ्यान उधर ही अटका रहता हैं, क्योकि उसे डर रहता हैं, कि कही मल अपने आप बाहर न निकल पड़े। तो यह औषधि दी जाती हैं ।

वायु या मूत्र के साथ शौच का निकलना - रोगी के पेट से जब अपान वायु का अपसरण होता हैं, या जब भी पेशाब करते वक्त या पेट से हवा निकलने के साथ शौच भी निकल पड़ता है । इसका मुख्य का कारण गुदा की सकोचक मांसपेशियों की कमजोरी हैं। इस अवस्था में यह औषधि कारगर साबित होती हैं ।

कठिन मल का अनायास या स्वंय ही निकल पड़ना - कभी - कभी बच्चों को पता ही नहीं चलता कि उसका कठिन मल अनायास ही बिस्तर में निकल पड़ा हैं । इस लक्षण में बच्चों को 200 शक्ति की ऐलो दी जाती हैं । और उसका कब्ज़ का रोग ठीक हो जाता हैं । 

गाढ़ी आव का निकल पडना तथा बवासीर - इस औषधि का रोगी जब शौच जाता हैं , तो कभी - कभी शौच से पहले एक जेली के समान गाढ़ी आव निकलती हैं । यह आव आंत के निचले हिस्से में जमा होती रहती है और या तो शौच इस आव से लिपटा रहता हैं, या सिर्फ़ आव ही निकलती है । आव निकलने के बाद गुदा में जलन होती हैं । 

बवासीर - गुदा प्रदेश मे भारीपन का अनुभव होना ऐलो के हर रोग मे पाया जाता हैं । यह भारीपन शौच के एकत्रित हो जाने से हो जाता हैं, या गुदा प्रदेश में आव के इकट्ठा हो जाने से हो सकता हैं, या बवासीर से भी हो सकता हैं । ऐलो में बवासीर के मस्से आव से सने रहते हैं क्योकि गुदा प्रदेश में एकत्रित आव सकोचक पेशियो की शिथिलता के कारण बाहर रिसती रहती हैं। और इन मस्सों को भिगोती रहती है । इस बवासीर मे खुजली बहुत रहती है , इन मस्सों में स्पर्श असहिष्णुता होती हैं , और ठंडे पानी से मस्सों को धोने पर रोगी को आराम मिलता है । 

बवासीर के मामले में ऐलो, ब्रोमियम और म्यूरियेटिक एसिड से तुलना-  ब्रोमियम के मस्सों पर मुख का सेलाइवा लगाने से आराम मिलता हैं।  और म्यूरियेटिक एसिड की बवासीर में गरम पानी से आराम मिलता हैं जबकि ऐलो में ठंडे पानी से आराम मिलता हैं। 

बवासीर के रोग में अन्य मुख्य औषधियाँ 

>> नक्स वोमिका व सलफर - प्रात: काल में सलफर 30 और सूर्यास्त के समय सोने से 3 घंटे पहले नक्स वोमिका 30 देने से प्राय बवासीर का रोग दूर हो जाता है । जैसे मेहनत न करना , बैठे रहना , घी तथा चटपटे पदार्थ खाने से बवासीर होती हैं, तो नक्स वोमिका ज्यादा फायदा करती हैं। और पुरानी बवासीर ( खून रहे या न रहे ) में सलफ़र ज्यादा फायदा करती है । 

>> एकोनाइट तथा हैमेमेलिस- बवासीर में केवल खून निकलने के लक्षण में ऐकोनाइट अथवा हैमेमेलिस दिया जाता है । 

>> एसक्यूलस-  बादी बवासीर में जब अशुद्ध रक्त से यानि शिरा शोथ से मस्से बन जायें तो एसक्यूलस दी जाती हैं।

>> कोलिनसोनिया - एसक्यूलस की तरह इसमें भी गुदा में तिनके चुभने जैसा अनुभव होता हैं, परन्तु एसक्यूलस बादी में और कोलिनसोनिया खूनी बवासीर में दी जाती हैं । एसक्यूलस में कब्ज कम रहती, कोलिनसोनिया में बवासीर के साथ कब्ज़ भी होती हैं । 

>> म्यूरियेटिक एसिड - इसके लक्षणों में मस्से नीले रंग के होते हैं,और उनमें इतनी स्पर्श असहिष्णुता होती हैं, कि बिस्तर की चादर का स्पर्श भी सहन नहीं होता और गरम पानी से धोने पर आराम मिलता हैं। ऐलो में ठंडे पानी से धोने पर आराम मिलता हैं । 

>> आर्सनिक - तेज जलन और बवासीर के मस्सों में से गर्म सूई निकल रही हो । मस्से बाहर निकलना और सैक करने से आराम मिलता हैं । 

>> रेटनहिया - पाखाना फिरने के बाद पूरे मलद्वार में असहनीय जलन और पाखाना शिथिल होने पर भी जलन होती हैं और मस्से बाहर आ जाते हैं। उक्त लक्षणों के साथ अन्य लक्षणों को मिलाकर यह औषधि दी जाती हैं । 

डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट होना- अगर डिसेन्ट्री में पेट में गड़गड़ाहट के जैसा लक्षण जैसे बोतल में से पानी गड़गड़ कर रहा हैं, तो यह ऐलो का विशेष लक्षण हैं। यदि दस्त के साथ गड़गड़ाहट न रहे, तो ऐलो कारगर लाभप्रद होती हैं । पोड़ोफाइलम में मी गड़गड़ाहट रहती हैं, परन्तु उसमें दस्त मध्याह्न से पूर्व बन्द हो जाते हैं। 

बीयर पीने से डायरिया होना- जो लोग बीयर पीने के आदी होते हैं, उन्हें प्राय डायरिया हो जाता हैं । तो ऐसे व्यक्तियों को ऐलो बहुत लाभ पहुंचाती है । कभी - कभी ऐलो से लाभ न हो तो केली बाईक्रोम इस अवस्था मे उपयोगी सिद्ध होती है । 

जब डायरिया के रोगी को जिसे कैलेकेरिया , नक्स वोमिका, ब्रायोनिया और आर्सनिक आदि से कोई लाभ नही हुआ हो । उसके सभी लक्षणों को ध्यान में रखते हुए पता करे कि उसे जब दस्त आता था तब पेट में जोर से गड़गड़ाहट तो नही होती और दस्त का वेग प्रबल तो नही । जिससे वह सवेरे तीन बजे निद्रा से उठ बैठता हो । तीन बजे से नौ बजे तक उसे चार से पाँच बार पतले दस्त गड़गड़ाहट के साथ आते हो और दिन या रात के किसी अन्य समय दस्त नही आते हो। जब दस्त की हाजत होती हो तभी उसे शौचालय में भागना पड़ता हो । उसे ऐसा प्रतीत होता हो कि वह दस्त को रोक ही नही सकता । इन सभी लक्षणों के होने पर उसे 10 बजे ऐलो 200 की एक खुराक दी जाती हैं । यह खुराक तब दी जाती हैं, जब रोग का वेग शान्त हो । 

यह जिगर के रोग की मुख्य औषधि हैं - होम्योपैथिक में ऐलो को जिगर के रोग की मुख्य औषधि माना गया हैं । यह औषधि लिवर के रोगों की तीव्रता को कम कर देती हैं, और इसके बाद इसकी अनुपूरक औषधि सलफर , कैली बाईक्रोम या सीपिया देने से रोग जड से खत्म हो जाता हैं । ऐलो , सलफर की तरह गहरी औषधि नही है , परन्तु एकोनाइट और बैलेडोना की तरह बिल्कुल अल्पकालिक भी नही है । यह दोनो के बीच की दवा है । 

ऐलो व नक्स वोमिका की तुलना – नक्स वोमिका में शौच जाने की बार - बार इच्छा होती हैं, क्योंकि आंते शौच को एक बार में नहीं निकाल सकती , ऐलो में इसके विपरीत आंते शौच को रोक नही सकती।  नक्स मे गुदा की सकोचक मांसपेशिया उत्तेजित रहती हैं, इसलिए शौच बार-बार आता हैं। ऐलो में यह मांसपेशिया शिथिल होती हैं । जो शौच को रोक नही पाती हैं। 

ऐलो और सलफर में तुलना - ऐलो तथा सलफर में गहरा सम्बन्ध हैं । दोनों में प्रात: बिस्तर से उठते ही शौच के लिये भागना पड़ता है , दोनों में पेर जलते हैं और दोनों में त्वचा में गर्मी होती हैं। दोनों में अंतर यह हैं, कि ऐलो का रोगी खाना खाते ही शौच के लिए दौड़ता हैं, जबकि सलफर का रोगी उठते ही शौचालय के लिए दौड़ता हैं । 

एलो औषधि के अन्य लक्षण- जब किसी रोग में औषधि की अधिक मात्रा देने से औपधि के लक्षण रोग में घुल  मिल जाए और समझ न आए कि ये लक्षण किस औषधि के हैं । तो वहाँ ऐलो से उपचार करने पर लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं । नक्स और सलफ़र भी इस दिशा मे उपयुक्त काम ककती हैं । 

एलो औषधि की शक्ति व प्रकृति - गुदा प्रदेश के रोग में 3 शक्ति की कुछ मात्रा देकर इन्तिज़ार करना चाहिये। अन्य रोगों मे 30 , 200 शक्ति की दवा दी जाती हैं । यह औषधि उष्ण प्रधान प्रकृति की हैं। 


शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

एलियम सीपा ( ALLIUM SEPA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदें

एलियम सीपा  ( ALLIUM SEPA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, उपयोग व फायदों का विश्लेषण-

  • शरीर की आन्तरिक झिल्ली का नवीन प्रदाह, जुकाम, नाक और आँख से पानी बहना 
  • जुकाम के कारण सिरदर्द 
  • ठंडे पानी से भीगने, कच्ची सब्जी व सलाद खाने से पेट दर्द 
  • कान का दर्द 
  • लम्बे डोरे की तरह होने वाला शियाटिका का दर्द 
  • किसी अंग के कटने के बाद नसों में दर्द होना

एलियम सीपा की प्रकृति- इस औषधि में ठंडे कमरे व खुली हवा मे रहने से रोग में कमी होती है। और बंद गरम कमरे व सांयकाल को रोग में वृद्धी होती है। 

शरीर के अगों की आन्तरिक झिल्ली का नवीन प्रदाह, जुकाम, नाक और आंख से पानी बहना - एलियम सीपा प्याज से बनी औषधि हैं। जब भी कच्चा प्याज को काटा जाता हैं, तब उसके रस से नाक तथा आँख से जुकाम की तरह पानी बहने लगता हैं। होम्योपैथिक के अनुसार जो औषधि जिन लक्षणों को स्वस्थ मनुष्य मे उत्पन्न करती हैं, उसी रोग में उन लक्षणों के विद्यमान होने पर सूक्ष्म मात्रा में देने से उन लक्षणों को दूर कर देती हैं। 

>> नाक से बहने वाला पानी, जिस स्थान पर बहे वही पर लगना इसका मुख्य लक्षण हैं- इसके जुकाम का मुख्य लक्षण यह हैं, कि नाक का पानी होटों पर बहता है वही लग जाता हैं, जलन पैदा करता हैं, और उस जगह को लाल कर देता हैं। इसमे आँख से भी पानी निकलता हैं, परन्तु नाक का पानी लगता हैं, आँख से निकलने वाला पानी गाल पर लगता नहीं। जुकाम में इसकी तुलना युफ्रेशिया से की जा सकती हैं। 

>> एलियम सीपा का जुकाम नाक पर लगता हैं, आँख पर नहीं, जबकि युफ्रेशिया का जुकाम आँख पर लगता हैं, नाक पर नहीं - एलियम सीपा और युफ्रेशिया दोनो के जुकाम मे आँख तथा नाक दोनो से पानी बहता हैं, परन्तु दोनो में यह प्रक्रिया विपरीत होती हैं। एलियम सीपा के जुकाम का पानी नाक पर चिरमिराता हैं, आँख का पानी आँख को नहीं चिरमिराता, जबकि युफ्रेशिया के जुकाम का पानी आँख को चिरमिराता हैं, नाक को नहीं । 

>> जुकाम का बाई नाक से शुरू होकर दाई तरफ जाना - एलियम सीपा का जुकाम बाई नाक की तरफ से शुरु होता हैं और उसमें चिरमिराने वाला पानी बहता हैं, नाक भर जाती हैं, और लगभग 24 घंटों के भीतर यह हालत दायी तरफ हो जाती हैं। 

जुकाम के कारण सिर दर्द -  इसका रोगी खुली हवा और ठंड पसन्द करता हैं। जबकि बन्द कमरे में उसकी शिकायतें बढ़ जाती हैं, और सांयकाल में भी उसके रोग में वृद्धि होती हैं। इसके कारण एलियम सीपा के रोगी को जुकाम के साथ सिर दर्द भी होता हैं। इसी सिर दर्द के कारण रोगी ठंडी हवा पसन्द करता हैं। और गरम कमरे में आते ही उसका सिर दर्द फिर से शुरू हो जाता हैं । युफ्रेशिया और पल्सेटिला में भी गरम कमरे में तकलीफे बढ़ जाती हैं। परन्तु युफ्रेशिया के जुकाम में पनीला जुकाम और आँख में चिरमिराहट होती हैं, जबकि पल्सेटिला के जुकाम में पीला, गाढ़ा जुकाम होता हैं । 

मासिक धर्म के शुरुआत में सिर दर्द में आराम और अंत में वापिस सिर दर्द शुरू होना- स्त्रियों में  मासिक धर्म शुरु होने पर सिर दर्द बन्द हो जाता हैं, और मासिक धर्म बन्द होने पर सिर दर्द फिर शुरु हो जाना एलियम सीपा का लक्षण हैं। लैकेसिस और जिंकम में भी यह लक्षण पाया जाता हैं। लैकेसिस का इस लक्षण के साथ मुख्य लक्षण सोने के बाद तकलीफ़ का बढ़ जाना हैं, और जिंकम का मुख्य लक्षण स्नायु रोग और मेरुदण्ड के रोगों से पीड़ित होना हैं । वैसे लैकेसिस तथा जिंकम मेटेलिकम में रजोधर्म शुरु होने पर सिर दर्द या अन्य दर्द ठीक हो जाते हैं । सिर्फ इस एक लक्षण पर औषधि का निर्णय कर देना उचित नही हैं । होम्योपैथिक में रोगी के अधिक से अधिक लक्षण, औषधि के अधिक से अधिक लक्षणों के साथ मिलने चाहिए, यही औषधि के चुनने का उचित प्रकार है । 

ठंडे पानी से भीगने, अधिक खाने , कच्ची सब्जी या सलाद खाने से पेट दर्द - पैर के भीग जाने से कभी - कभी ठंड लग जाने पर पेट दर्द हो जाता हैं,और अधिक खाने से या खीरा तथा अन्य कच्ची सब्जी खाने से पेट दर्द हो जाता हैं। यदि बैठे रहने से यह दर्द बढ़ता हैं, और घूमने - फिरने से घटता हैं , तो एलियम सीपा उत्तम व कारगर औषधि हैं। 

कान का दर्द - कान के दर्द में तीन प्रकार की औषधि जैसे- एलियम सीपा, पल्सेटिला , कैमोमिला । यदि जुकाम की वजह से कान में दर्द हो, तो एलियम सीपा इस दर्द को शान्त कर देती हैं । यह औषधि कान के दर्द में अति लाभप्रद मानी जाती हैं । पल्सेटिला कर्ण शूल की प्रसिद्ध औषधि हैं, इसका कान के साथ विशेष महत्व हैं। जब बच्चा तेज कान के दर्द से कराह रहा हो, तो ऐसे कोमल स्वभाव वाले बच्चों के कान के दर्द में पल्सेटिला अद्भुत काम करती हैं । जो बच्चे में कान के दर्द से चिड़चिड़ापन हो, तो उनके लिये  कैमोमिला उपयुक्त औषधि मानी गई हैं।  

लम्बे डोरे की तरह होनेवाला शियाटिका का दर्द - चेहरा , सिर , गर्दन और छाती में कभी - कभी स्नायु ( नस ) में दर्द होता हैं, जो लम्बे डोरे की नस की तरह प्रतीत होता हैं। इस तरह का दर्द शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है । 

किसी अंग के कटने के बाद नसों में दर्द -यदि किसी कारणवस शरीर का कोई अंग कट जाता हैं या काटना पड़ जाता हैं , तो कभी - कभी किसी भी नस में भयंकर शूल हो जाता है, असहनीय वेदना होती हैं। यह औषधि ऐसे दर्द में लाभप्रद होती अर्थात दर्द को शान्त कर देती है । 

एलियम सीपा औषधि के अन्य लक्षण -

>> यदि रोगी को कच्चा प्याज खाने की तीव्र इच्छा हो, दूसरा कोई पौष्टिक आहार न ले सके, तो यह भी इस औषधि का एक लक्षण हैं । 

>> ऐसी खाँसी जिसमे रोगी खाँसते - खाँसते गला पकड़ लेता हैं और महसूस करता हो कि गला अन्दर से पका पडा है। तो यह औषधि लाभ पहुँचाती है।

एलियम सीपा औषधि की शक्ति तथा प्रकृति - यह एकोनाइट की तरह थोड़ी देर काम करने वाली ' स्वल्प कालिक ' औषधि है । यह 3, 6, 30 और अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं और यह उष्ण प्रधान प्रकृति की औषधि हैं।


सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा ( AILANTHUS GLANDULOSA ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग, गुण व फायदें

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा ( AILANTIIUS GLANDULOSA )  व्यापक - लक्षण तथा मुख्य - रोग तथा गुण व फायदों का विस्तार से विश्लेषण-

  1. स्कारलेटीना- गले के रोगों व दाने न उभरने के रोगों में 
  2. मीजल्स ( छोटी चेचक ) या डिफ्थीरिया रोग में 

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा प्रकृति - इस औषधि की प्रकृति यह हैं कि गर्म पानी या गर्म पेय पीने पर रोग के कमी लक्षणों में और होती हैं । और दाने न उभरने की स्थिति में रोग में वृद्धि होती हैं ।

स्कारलेटीना- गले के रोगों में व दाने न उभरने के रोगों में - स्कारलेटीना एक संक्रामक फैलने वाला रोग हैं । स्कारलेटीना रोग में त्वचा पर नारंगी रंग के दाने उभर आते हैं, और साथ ही हल्का या गंभीर ज्वर भी होता हैं। रोगी तन्द्रा में रहता है , डिलीरियम भी हो जाता हैं, गला सूज जाता हैं, और अन्दर से काला और नीला दिखता हैं, टाँसिल बढ़ जाते हैं और उनमे से बदबूदार पतला पस निकलता है । तो रोगी को यह औषधि दी जाती हैं ।

स्कारलेट - ज्वर तीन प्रकार का होता है । 

पहला -रोग के प्रथम प्रकार को ' Scarlatina Simplex ' कहते है , क्योंकि यह रोग की साधारण अवस्था है। कभी यह  बहुत हल्का होता हैं, दाने आसानी से निकल आते हैं और ज्वर भी अधिक नहीं होता हैं। रोगी की अच्छी देखभाल करने व उसे गर्म कमरे में रखने से वह बिना औषधि के स्वयं ठीक हो जाता है । 

दूसरा - रोग के दूसरे प्रकार को ' Scarlatina Anginosa ' कहते है , क्योंकि यह विशेषकर गले पर आक्रमण करता है ,इसमें त्वचा लाल , कोमल और चमकदार होती हैं । यह रोग भयंकर रुप धारण नहीं करता हैं। इसमें ज्वर न होकर भी अधिक कष्टकर होता है । इममें कष्ट गले में होता हैं, और गला अन्दर से  सूज जाता हैं और दर्द करता हैं। इसके साथ ही दाने बहुत कम निकलते हैं, मेरुदण्ड के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, कमर और गर्दन में दर्द होता हैं।

तीसरा - रोग के तीसरे प्रकार को ' Scarlatina Maligna ' कहते हैं, जिसमें गला भीतर से गंभीर  रूप से सूज जाता है , और रूधिर के विषाक्त होने के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, टाँसिल सूज जाते हैं , त्वचा फूल जाती है , दुर्गन्ध आने लगती है और दाने बहुत कम या न के बराबर होते हैं । अगर तीसरे प्रकार के स्कारलेट - ज्वर का उपचार ठीक से न हो सके तो रोगी मर भी सकता है । यह रोग की अत्यन्त भयकर अवस्था है । 

तीसरे प्रकार के स्कारलेटीना की अन्य औषधि ( एलेन्यस ) - अगर त्वचा पर स्कारलेटीना के दाने हो, तो त्वचा को अँगुली से दबा कर देखे । और दबा कर अँगुली हटाने के बाद त्वचा सफेद बनी रहे, और वह स्थान रूधिर से भरने में  बहुत समय लगाये, तो वह तीसरे प्रकार का भयंकर स्कारलेटीना हैं। इस अवस्था में एलेन्यस का प्रयोग अत्यन्त लाभप्रद होता हैं । त्वचा पर दाने न उभरना , गले में भयंकर रूप से टाँसिल का सूज जाना, उसका रंग नीला हो जाना, रोग का डिफथीरिया जैसा रूप हो जाना, रोगी का अत्यंत कमजोर हो जाना । ये सभी लक्षण एलेन्यस औषधि के है, चाहे वह स्कारलेटीना हो या नही।

स्कारलेटीना में अन्य औषधियों में तुलना - रोगीं के लक्षणों को देखकर यह नही समझना चाहिये कि उसे स्कारलेटीना है ।  रोगी के दाने एकोनाइट के हो सकते हैं , परन्तु एकोनाइट मे इतनी अधिक सड़न नही होती ।  ये दाने बैलेडोना के हो सकते हैं, परन्तु बैलेडोना  के दाने चमकदार और चिकने होते हैं। ये दाने एलेन्यस के हो सकते हैं, एलेन्यस का प्रयोग उस हालत में किया जाता हैं। जब दाने न उभर कर गले मे भयंकर टाँसिल हो, मस्तिष्क में डिलोरियम हो और अत्यधिक ज्वर हो ये सभी इस रोग की तीसरी अवस्था को उत्पन्न कर देते हैं । 

मीजल्स ( छोटी चेचक ) या डिफयोरिया -  छोटी चेचक में जब रोग बिगड जाता है , दाने नहीं निकलते या निकल कर एकदम दब जाते हैं या नीले पड़ जाते हैं, तब एलेन्यस अच्छा काम करती है । डिफथीरिया या अन्य गले की बीमारियो में इसको दिया जाता है । इसका उपयोग मुख्य रूप से उन बीमारियों में होता हैं, जिनमे दाने देर से निकलते हो या दाने न निकलें या निकल कर दब जायें, रोगी बेसुद पड़ा रहे, डिलीरियम में आ जाए, बैचेन रहे, चक्कर आते हो, जी मिचलना , उल्टी करे - इन सभी लक्षणों में यह औषधि लाभप्रद व कारगर होती है । 

एलेन्थस ग्लेंडुलोसा औषधि की प्रकृति व शक्ति - यह औषधि 1,3,6,30 व अधिक शक्ति में उपलब्ध हैं और यह शीत प्रधान औषधि हैं।


एब्रोटेनम ( ABROTANUM ) औषधी के व्यापक लक्षण , मुख्य रोग और उपयोग व फायदें

एब्रोटेनम ( ABROTANUM ) औषधी के व्यापक - लक्षण , मुख्य - रोग और फायदो को विस्तार से जानते है । 

बच्चे के सूके के रोग मे नीचे से सूकना - बच्चे के सूके के रोग मे इस औषधी की बहुत अधिक उपयोगिता है । इस औषधि के सूके में सब से पहले नीचे के अंगो मे दुबलापन आना शुरू होता है , सूकापन नीचे से ऊपर की तरफ बड़ता है । चेहरा सब से बाद में सूकने लगता है । और एब्रोटेनम में सबसे पहले टांगे सूकनी शुरू हैं , ऊपर का धड़ बाद मे सूकता है।

एक बीमारी के दबने से दूसरी बीमारी का हो जाना  - प्राय देखा जाता है कि जब एक बीमारी हटती है तब दूसरी बीमारी उठ खडी होती है । ऐसी स्थिति में  एब्रोटेनम औषधी लाभकारी होती है । इसे कुछ उदाहरणों से समझते हैं- 

  1. गठिये के रोगी को यदि पतले दस्त आते रहें तो दर्द कम हो जाता है और अगर कब्ज हो जाती हैं तो दर्द बढ़ जाता है। 
  2. कर्णमूल ( Mumps ) की सूजन दब जाने से पुरुषो मे पोते तथा स्त्रियो मे स्तन की सूजन हो जाती है । 
  3. मालिश द्वारा गठिये के दब जाने से दिल की तकलीफ हो सकती है । 
  4. गठिया या दस्त के ठीक होने पर बवासीर के लक्षण उभरने लगते हैं । 
  5. दस्त एकदम बन्द हो जानेे पर गठिया की शिकायत हो जाती है । 

एब्रोटेनम और पल्सेटिला मे भेद की पहचान - एक रोग के हटने पर दूसरे रोग के प्रकट हो जाने मे एब्रोटेनम और पल्सेटिला दोनो काम आते हैं , परन्तु इन दोनो मे भेद यह है कि जहा एब्रोटेनम मे एक रोग के दबने से दूसरा जो रोग पैदा होता है उसका पहले रोग से कोई सम्बन्ध नही होता , वहा पल्सेटिला से जो रोग दबा है वो दूसरे स्थान मे चला जाता है । उदाहरणार्थ - 

एब्रोटेनम मे दस्त दब कर गठिया हो सकता है , बवासीर हो सकती है , कर्णमूल की सूजन दब कर पोते बढ सकते हैं । इस प्रकार जो रोग पैदा हो जाता है उसे एलोपैथीक का एक नया रोग कहते हैं , परन्तु होम्योपैथीक  मे इसे नया रोग न कह कर पुराने रोग का ही रूपान्तर मानते हैं । पल्सेटिला मे गठिये का दर्द जब अपना स्थान बदलता है , तब एक जोड से दूसरे जोड मे चला जाता है , अगर सूजन है तो एक गिल्टी से दूसरी गिल्टी मे चली जाती है , अगर दर्द है तो एक अंग से दूसरे अंग मे चला जाता है । पल्सेटिला मे रोग वही रहता है , केवल स्थान बदलता है , एब्रोटेनम मे रोग अपना रूप ही बदल देता है , एलोपैथिक परिभाषा में पहला रोग दब कर एक नया रोग बन जाता है , यद्यपि होम्योपैथी के अनुसार वह नया रोग न होकर पुराने रोग का ही रूपान्तर होता है । 

इस औषधि का अन्य लक्षणों मे भी प्रयोग किया जाता है । 

बच्चों की अण्ड - वृद्धि मे यह औषधि लाभ देती है । बच्चो की नाक  से खून बहने को यह रोकती है मतलब बच्चो की नकसीर मे यह लाभप्रद औषधि है । 

एब्रोटेनम औषधि की प्रकृति व शक्ति - यह औषधि लगभग सभी शक्तीयों में उपलब्ध है, दवा का इस्तेमाल चिकित्सक की सलाह मे ही करे और और उचित शक्ति का सेवन करे ।    


एबिस नाइग्रा ( ABIES NIGRA ) के फायदे , व्यापक लक्षण तथा मुख्य रोग व फायदें

एबिस नाइग्रा  ( ABIES NIGRA ) के फायदे , व्यापक - लक्षण तथा मुख्य - रोग को विस्तार से जानते है ।  

खाने के बाद पेट दर्द का बढ़ना - जिन व्यक्तियो का खाने के बाद पेट - दर्द बढ जाता है, उनके लिये यह अति उत्तम औषधि है । इसके विपरित एनाकाडियम औषधी मे खाने के बाद पेट - दर्द कम होता है । 

पेंट के ऊपरी हिस्से मे उबले हुए अंडे जैसा अनुभव  - रोगी अनुभव करता है कि पेट के ऊपरी हिस्से में कोई अंडे जैसी चीज़ अटकी हुई है जो दर्द उत्पन्न करती है । ऐसा अनुभव होता है कि जो न तो बाहर आती है , न नीचे उतरती है , वही अटकी हुई है और भरीपन  का अहसास होता है । ' वक्षोस्थि ' ( Sternum ) के नीचे के भाग मे इस प्रकार की कोई चीज अटकी अनुभव हो , तो चायना औषधि से लाभ होता है । अगर ऐसा अनुभव हो कि जो - कुछ खाया है वह पेट के ऊपर के हिस्से मे अटका हुआ है , तो पल्सेटिला या ब्रायोनिया से लाभ होता है । 

वृद्ध व्यक्तियो की कमजोर पाचन क्रिया - वृद्ध - व्यक्तियो की कमजोर पाचन क्रिया की बीमारी के साथ हृदय रोग के लक्षण भी दिखाई देते है , तो इस औषधि का प्रयोग किया जाता है । इनकी बदहज़मी का कारण चाय अथवा तम्बाकू का अधिक सेवन हो सकता है । 

चाय तथा तम्बाकू के दुष्प्रभाव के लिए  - जो लोग चाय अथवा तम्बाकू का अधिक सेवन करते है वे  फलस्वरूप पेट की बीमारियो के शिकार हो जाते हैं , उन लोगों में अक्सर देखा जाता है कि वे उत्साहहीन रहते है , वे रात को ठीक से सो नहीं पाते । उन रोगियों के लिये यह औषधि बहुत ही उपयोगी होती है । 

प्रात काल भूख बिल्कुल न लगना और दोपहर या रात को तेज भूख लगना - जिन लोगो को प्रात काल के समय बिल्कुल भूख नही लगती , परन्तु दोपहर और रात को अधिक भूख लगती है और भोजन की अधिक खाने की इच्छा होती है , तो उन रोगियों लिये यह औषधी बहुत ही उपयोगी है । 

छाती मे जकडन व अटका हुआ अनुभव होना — छाती मे दर्द अनुभव होना , ऐसा प्रतीत होना कि छाती मे कुछ अटका हुआ है जो खासने से निकल जाना चाहिये । जैसे पेट में कुछ अटका - सा अनुभव होता है , वैसे छाती मे भी कफ - जैसी कोई चीज अटकी हुई अनुभव होती है । 

इस औषधि के अन्य लक्षण पीठ के नीचे के भाग मे दर्द, हड्डियो मे वात - रोग का दर्द ( Rheumatic bone pains ), पुराना मलेरिया , ज्वर मे गर्मी - सर्दी का एक - दूसरे के बाद आना - जाना, रात को नीद न आना और साथ ही भूख लगना आदि लक्षणों में भी यह औषधी बहुत कारगर होती है।

एबिस नाइग्रा औषधि की शक्ति व प्रकृति - यह औषधी -1,6,30 पावर में उपलब्ध है। चिकित्सक इस औषधी में रोग की गम्भीरता को ध्यान में रखकर सही पावर की औषधि का इस्तेमाल करने की सलाह देते है। सही पावर की औषधी के लिए चिकित्सक की सलाह में औषधी का सेवन करे।


एबिस कैनेडेनसिस ( ABIES CANADENSIS ) औषधि के व्यापक लक्षण, मुख्य रोग व फायदे

एबिस कैनेडेनसिस ( ABIES CANADENSIS )  व्यापक - लक्षण तथा मुख्य - रोग व फायदों का विस्तार से विश्लेषण जाने -

  1. अजीर्ण , पाचन - क्रिया की गडबड़ , खरोच जैसी भूख लगना  , भूख से ज्यादा खा जाना 
  2. कमजोरी मे एबिस को जेलसी मियम से तुलना  
  3. दायें कंधे की फलकास्थि मे दर्द होना 
  4. जरायु का अपने स्थान से हटना 
  5. ज्वर मे ठंड और कंपन , कन्धो के बीच ठंड जैसा एहसास 
  6. बेहद कमजोरी होना 
  7. आचार व सलाद, गाजर , शलजम आदि खाने की तीव्र इच्छा 

एबिस कैनेडेनसिस औषधि के व्यापक - लक्षण तथा मुख्य - रोगों और फ़ायदों को विस्तार से जानते है । 

अजीर्ण , पाचन - क्रिया की गडबडी , खरोचने जैसी भूख लगना , भूख से ज्यादा खा जाना - पाचन - क्रिया पर इस औषधी का विशेष प्रभाव है । पेट मे खरोचने जैसी भूख लगती है और रोगी भूख से ज्यादा खा जाता है , उसे पता नहीं लगता कि उसने कितना खा लिया है । रोगी इतना खा जाता है कि पेट फूलने लगता  है । जिसके दबाव से हृदय की धड़कन तेज़ होने लगती है और पेट की गैस बनाने लगती है । जिससे  हृदय की गति क्रिया बाधा उत्पन्न होती है और हृदय - स्पदन होने लगता है । 

जरायु का अपने स्थान से हटना - जरायु के अपने स्थान से हटने पर इसका उपयोग लाभकारी होता है । जरायु मे अग्रभाग मे हल्का - हल्का सा दर्द अनुभव होता है जो दबाने से या चलने  के कारण   दबाव पडने पर कम हो जाता है । गर्भाशय कोमल तथा कमजोर अनुभव होता है । 

बेहद कमजोरी - रोगी बेहद कमजोरी अनुभव करता है । हर समय लेटे रहना पसंद करता है । इस प्रकार की कमजोरी के कारण रोगी सुस्त रहता है । यह सुस्ती जेलसीमियम मे भी पायी जाती है, परन्तु दोनो की कमजोरी तथा सुस्ती मे भेद होता है ।   

कमजोरी मे एबिस की जेलसीमियम से तुलना - इसकी कमजोरी तथा सुस्ती का कारण अधिक खाना और उसका शरीर मे न लगना है। जेलसी मियम की सुस्ती का कारण मास - पेशियो की कमजोरी और उनकी शिथिलता होती है।

दायें कन्धे की फलकास्थि मे दर्द होना - इस औषधी का एक लक्षण यह भी है, कि दायें कन्धे की फलकास्थि मे दर्द होता है। चैलोडोनियम मे भी दायें कन्धे की फलकास्थि मे दर्द होता है। अगर दायें कन्धे की फलकास्थि के नीचे के बिन्दु मे दर्द का रोग पुराना है, तो लाइकोपोडियम से लाभ मिलता है । इस प्रकार का दर्द बायी फलकास्थि मे हो तो औग्जेलिक एसिड पर ध्यान देना चाहिये ।  

ज्वर में ठंड से कापना - ज्वर मे रोगी को कंधो के बीच ठंडे पानी  जैसा अनुभव होता है मानो नाडियो में बर्फ - सा ठंडा रुधिर बह रहा है । रोगी सर्दी से कापता है , हाथ तथा त्वचा ठंडी हो जाती हैं । पीठ में ऊपर से नीचे की तरफ ठंड चलती है और कन्धो के बीच ठंडे पानी का - सा अनुमव होता है । 

आचार , गाजर , शलजम खाने की तीव्र इच्छा - रोगी को आचार , गाजर , शलजम तथा मोटे अन्न खाने की ज्यादा इच्छा होती है । अगर किसी रोग मे बेहद कमजोरी हो , रोगी को ठंड लगे , खरोचने - जैसी भूख लगे , आचार - चटनी , गाजर - शलजम के खाने की तीव्र इच्छा हो , तो इस औषधि से लाभ होगा । 

इन लक्षणो और रोगो मे एबिस कैनेडेनसिस औषधि का सेवन उचित माना जाता है और किस शक्ति क उपयोग करना है उसके लिए चिकित्सक की सलाह लें । 

एबिस कैनेडेनसिस औषधि की प्रकृति - यह औषधि 6 , 30 , 200 और अधिक शक्ति मे उपलब्ध है ।